बुधवार, 13 मार्च 2024

योगिनी दशा क्या होती है एवं कैसे निकालें ?

जिस नक्षत्र में जन्म हों, अश्विनी से गिनकर प्राप्त संख्या में तीन जोडकर आठ से भाग देने से जो शेष बचे उस शेष संख्या के तुल्य-संख्यक मंगला आदि योगिनी दशा समझें, उसी पर से मनुष्य का स्पष्ट शुभाशुभ फल होता हैं।

योगिनी दशाओं के नाम-:

मंगला पिंगला धान्या भ्रामरी भद्रिका तथा।
उल्का सिद्धा संकटा च एतासां नामवत्फलम्।।

१, मंगला, २, पिंगला, ३, धान्या, ४, भ्रामरी, ५, भद्रिका, ६, उल्का, ७, सिद्धा और ८, संकटा यह आठो योगिनी हैं। इनके नामवत् शुभाशुभ फल जानना चाहिए अर्थात् मंगला, धान्या, भद्रिका एवं सिद्धा इन चार विषम संख्यक योगिनियों की दशायें शुभ होती हैं और शेष चार सम संख्यक योगिनियों की दशायें अशुभ होती हैं।

योगिनी दशा वर्ष संख्या तथा अन्तर्दशा साधन-:

एकं द्वौ गुणवेदवाणरससप्ताष्टांकसंख्याः क्रमात्
स्वीयस्वीयदशा विपाकसमये ज्ञेयं शुभं वाऽशुभम्।
षट्त्रिंशैर्विभजेद्दिनीकृतमथैकद्वित्रिवेदेषुषट्
सप्ताष्टघ्नदशा भवेयुरिति ता एवं दशान्तर्दशाः।।

उक्त मंगला आदि आठ योगिनियों के क्रम से १,२,३,४,५,६,७,८ ये दशा वर्षमान हैं, इसी के अनुसार अपनी-अपनी दशा में उक्त योगिनियों के शुभ या अशुभ फल समझें। दशामान को दिनात्मक बनाकर पृथक् - पृथक् दशावर्ष संख्या से गुणाकर गुणनफल में ३६ के भाग देनें से लब्धि  दिनादि अन्तर्दशा होती हैं।

ज्योतिष सीखने या जानकारी के लिये आप मुझसे संपर्क करें। आचार्य सोहन वेदपाठी, लुधियाना व्हाट्सएप्प 9463405098 पर संपर्क करें।
उदाहरण-:१ किसी का जन्म नक्षत्र हस्त हैं तो अश्विनी से उसकी संख्या १३ में ३ जोडने से १६ हुई इसमें ८ के भाग से शेष शून्य हुआ, अर्थात् आठ ही शेष बचा, इसलिए मंगला आदि क्रम से आठवीं संकटा की दशा में जन्म हुआ।
उदाहरण-: २ किसी का जन्म नक्षत्र आर्द्रा हैं तो अश्विनी से आर्द्रा की संख्या ६ में ३ जोडने से ९ हुई, इसमें आठ के भाग से १ शेष बचा इसलिए मंगला की दशा में जन्म हुआ, अर्थात् आर्द्रा से जन्म नक्षत्र तक जो संख्या हो उसमें ८ से भाग देने से शेष तुल्य संख्यक मंगला आदि योगिनी दशा में जन्म जानें। इस प्रकार आर्द्रा से रेवती तक २२ नक्षत्रों में मंगलादिओं की दशा होगी, अश्विनी से मृगशिर्ष तक ५ नक्षत्रों में भ्रामरी से संकटा तक पाँच योगिनिओं की दशा होगी।

अंतर्दशा साधन के लिये एक अन्य सूत्र -

महादशा और अन्तर्दशा के वर्षों को गुना करके गुणनफल को १० से गुणा करने पर अंतर्दशा के दिनादि प्राप्त होंगे। ३० से ज्यादा होने पर ३० का भाग देकर महीना एवं शेष को दिन समझें।

शनिवार, 24 फ़रवरी 2024

घाघ के वचन अनुसार आहार एवं कृषि विज्ञान

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कृषि एवं मौसम वैज्ञानिक- घाघ की नीतिपरक दोहे - 
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1- चैते गुड़ बैसाखे तेल, जेठ में पंथ आषाढ़ में बेल।
सावन साग न भादों दही, क्वारें दूध न कातिक मही।
मगह न जारा पूष घना, माघे मिश्री फागुन चना। 

घाघ! कहते हैं, चैत में गुड़, वैशाख में तेल, ज्येष्ठ में यात्रा, आषाढ़ में बेल, सावन में हरड़ साग, भादों में दही, आश्विन में दूध, कार्तिक में मट्ठा (लस्सी), मार्गशीर्ष (अगहन) में जीरा, पौष (पूष) में धनियां, माघ में मिश्री, फाल्गुन में चने खाना हानिप्रद होता है।

 2-जाको मारा चाहिए बिन मारे बिन घाव। 
वाको  यही बताइये घुइया पूरी  खाव।।

घाघ! कहते हैं, यदि किसी से शत्रुता हो तो उसे अरबी की सब्जी व पुड़ी खाने की सलाह दो। इसके लगातार सेवन से उसे कब्ज की बीमारी हो जायेगी और वह शीघ्र ही मरने योग्य हो जायेगा।

3- पहिले जागै पहिले सौवे, जो वह सोचे वही होवै।

घाघ! कहते हैं, रात्रि मे जल्दी सोने से और प्रातःकाल जल्दी उठने से बुध्दि तीव्र होती है। यानि विचार शक्ति बढ़ जाती है।

4- प्रातःकाल खटिया से उठि के पिये तुरन्ते पानी। 
वाके घर मा वैद ना आवे बात घाघ के  जानी।। 

घाघ ! लिखते हैं, प्रातः काल उठते ही, जल पीकर शौच जाने वाले व्यक्ति का स्वास्थ्य ठीक रहता है, उसे डाक्टर के पास जाने की आवश्यकता नहीं पड़ती। 

5-सावन हर्रे भादों चीता, क्वार मास गुड़ खाहू मीता। कातिक मूली अगहन तेल, पूस में करे दूध सो मेल माघ।
मास घी खिचरी खाय, फागुन उठि के प्रातः नहाय। 
चैत मास में नीम सेवती, बैसाखहि में खाय बासमती। 
जैठ मास जो दिन में सोवे, ताको जुर अषाढ़ में रोवे।।

घाघ ! लिखते हैं, सावन में हरड़ का सेवन, भाद्रपद में चिरायता का सेवन, क्वार में गुड़, कार्तिक मास में मूली, अगहन में तेल, पूष में दूध, माघ में खिचड़ी, फाल्गुन में प्रातःकाल स्नान, चैत में नीम, वैशाख में चावल खाने और जेठ के महीने में दोपहर में सोने से स्वास्थ्य उत्तम रहता है, उसे ज्वर नहीं आता।

6- कांटा बुरा करील का, औ बदरी का घाम। 
सौत बुरी है चून को, और साझे का काम।। 

घाघ! कहते हैं, करील का कांटा, बदली (जब आकाश में बादल छाया हो एवं धूप भी निकला हो) की धूप, सौत ( सौतेला )चून की  (अर्थात चूना से सौतेला व्यवहार नहीं करना चाहिए। भावार्थ यह है कि चूना का नित्य सेवन करना चाहिए) और साझे (सांझेदारी) का काम बुरा होता है। 

7-बिन बैलन खेती करै, बिन भैयन के रार। 
बिन महरारू घर करै, चैदह साख गवांर।। 

भड्डरी! लिखते हैं, जो मनुष्य बिना बैलों के खेती करता है, बिना भाइयों के झगड़ा या कोर्ट कचहरी करता है और बिना स्त्री के गृहस्थी का सुख पाना चाहता है, वह वज्र मूर्ख है। 

8-ताका भैंसा गादरबैल, नारि कुलच्छनि बालक छैल। 
इनसे बांचे चातुर लौग, राजहि त्याग करत हं जौग।। 

घाघ! लिखते हैं, तिरछी दृष्टि से देखने वाला भैंसा, बैठने वाला बैल, कुलक्षणी स्त्री और विलासी पुत्र दुखदाई हैं। चतुर मनुष्य राज्य त्याग कर सन्यास लेना पसन्द करते हैं, परन्तु इनके साथ रहना पसन्द नहीं करते। 

9-जाकी छाती न एकौ बार, उनसे सब रहियौ हुशियार।

घाघ! कहते हैं, जिस मनुष्य की छाती पर एक भी बाल नहीं हो, उससे सावधान रहना चाहिए। क्योंकि वह कठोर हृदय, क्रोधी व कपटी हो सकता है। 

10- खेती  पाती  बीनती, और घोड़े की तंग। 
अपने हाथ संभारिये, लाख लोग हो संग।।

घाघ! कहते हैं, खेती, प्रार्थना पत्र, तथा घोड़े के तंग को अपने हाथ से ठीक करना चाहिए किसी दूसरे पर विश्वास नहीं करना चाहिए। 

11- जबहि तबहि डंडै करै, ताल नहाय, ओस में परै।
दैव न मारै आपै मरैं। 

भड्डरी! लिखते हैं, जो पुरूष कभी-कभी व्यायाम करता हैं, ताल में स्नान करता हैं और ओस में सोता है, उसे भगवान नहीं मारता, वह तो स्वयं मरने की तैयारी कर रहा है।

12- विप्र टहलुआ अजा धन और कन्या की बाढि। 
इतने से न धन घटे तो करैं बड़ेन सों रारि।।

घाघ! कहते हैं, ब्राह्मण को सेवक रखना, बकरियों का धन, अधिक कन्यायें उत्पन्न होने पर भी, यदि धन न घट सकें तो बड़े लोगों से झगड़ा मोल ले, धन अवश्य घट जायेगा।

13- औझा कमिया, वैद किसान। 
आडू बैल और खेत मसान। 

भड्डरी! लिखते हैं, नौकरी करने वाला औझा, खेती का काम करने वाला वैद्य, बिना बधिया किया हुआ बैल और मरघट के पास का खेत हानिकारक है।।"
 

बुधवार, 14 फ़रवरी 2024

वसन्तपंचमी 14 फरवरी 2024

 

14 फरवरी 2024 को माघ शुक्ल पंचमी  पूर्वाह्न व्यापिनी होने से पूरे भारत में वसंतपंचमी का पावन त्यौहार मनाया जायेगा। सिद्धपीठ दण्डी स्वामी मंदिर, लुधियाना से आचार्य सोहन वेदपाठी ने बताया कि वसन्त पञ्चमी का दिन माँ सरस्वती को समर्पित है और इस दिन माँ सरस्वती की पूजा-अर्चना की जाती है। माता सरस्वती को ज्ञान, सँगीत, कला, विज्ञान और शिल्प-कला की देवी माना जाता है। इस दिन को श्री पञ्चमी और सरस्वती पूजा के नाम से भी जाना जाता है।

भक्त लोग, ज्ञान प्राप्ति और सुस्ती, आलस्य एवं अज्ञानता से छुटकारा पाने के लिये, आज के दिन देवी सरस्वती की उपासना करते हैं। कुछ प्रदेशों में आज के दिन शिशुओं को पहला अक्षर लिखना सिखाया जाता है। दूसरे शब्दों में वसन्त पञ्चमी का दिन विद्या आरम्भ या अक्षर अभ्यास के लिये काफी शुभ माना जाता है। इसीलिये माता-पिता आज के दिन शिशु को माता सरस्वती के आशीर्वाद के साथ विद्या आरम्भ कराते हैं। सभी विद्यालयों में आज के दिन सुबह के समय माता सरस्वती की पूजा की जाती है। वसन्त पञ्चमी वाले दिन सरस्वती पूजा विद्यार्थी अपने घर में ही अपने पुस्तकों को साफ-सफाई करके स्वच्छ वस्त्र पर रखकर माता सरस्वती का ध्यान करते हुये धूप-दीप, नैवेद्यादि से पूजन करें।

यह स्वयंसिद्ध मुहूर्तों में शामिल है। इस दिन कोई भी शुभ कार्य किया जा सकता है। विवाहादि संस्कारों को छोड़कर।

आइये इसके बारे में कुछ खास जानकारी आपके साथ सांझा करता हूँ।

 वसंत ऋतु आते ही प्रकृति का कण-कण खिल उठता है। मानव तो क्या पशु-पक्षी तक उल्लास से भर जाते हैं। हर दिन नयी उमंग से सूर्योदय होता है और नयी चेतना प्रदान कर अगले दिन फिर आने का आश्वासन देकर चला जाता है। यों तो माघ का यह पूरा मास ही उत्साह देने वाला है, पर वसंत पंचमी (माघ शुक्ल पंचमी) का पर्व भारतीय जनजीवन को अनेक तरह से प्रभावित करता है। प्राचीनकाल से इसे ज्ञान और कला की देवी मां सरस्वती का जन्मदिवस माना जाता है। जो शिक्षाविद भारत और भारतीयता से प्रेम करते हैं, वे इस दिन मां शारदा की पूजा कर उनसे और अधिक ज्ञानवान होने की प्रार्थना करते हैं। कलाकारों का तो कहना ही क्या? जो महत्व सैनिकों के लिए अपने शस्त्रों और विजयादशमी का है, जो विद्वानों के लिए अपनी पुस्तकों और व्यास पूर्णिमा का है, जो व्यापारियों के लिए अपने तराजू, बाट, बहीखातों और दीपावली का है, वही महत्व कलाकारों के लिए वसंत पंचमी का है। चाहे वे कवि हों या लेखक, गायक हों या वादक, नाटककार हों या नृत्यकार, सब दिन का प्रारम्भ अपने उपकरणों की पूजा और मां सरस्वती की वंदना से करते हैं।

ऐतिहासिक महत्व - 

वसंत पंचमी का दिन हमें पृथ्वीराज चौहान की भी याद दिलाता है। उन्होंने विदेशी हमलावर मोहम्मद गौरी को 16 बार पराजित किया और उदारता दिखाते हुए हर बार जीवित छोड़ दिया, पर जब सत्रहवीं बार वे पराजित हुए, तो मोहम्मद गौरी ने उन्हें नहीं छोड़ा। वह उन्हें अपने साथ अफगानिस्तानले गया और उनकी आंखें फोड़ दीं।

इसके बाद की घटना तो जगप्रसिद्ध ही है। गौरी ने मृत्युदंड देने से पूर्व उनके शब्दभेदी बाण का कमाल देखना चाहा। पृथ्वीराज के साथी कवि चंदबरदाई के परामर्श पर गौरी ने ऊंचे स्थान पर बैठकर तवे पर चोट मारकर संकेत किया। तभी चंदबरदाई ने पृथ्वीराज को संदेश दिया।

चार बांस चौबीस गज, अंगुल अष्ट प्रमाण।

ता ऊपर सुल्तान है, मत चूको चौहान ॥

पृथ्वीराज चौहान ने इस बार भूल नहीं की। उन्होंने तवे पर हुई चोट और चंदबरदाई के संकेत से अनुमान लगाकर जो बाण मारा, वह गौरी के सीने में जा धंसा। इसके बाद चंदबरदाई और पृथ्वीराज ने भी एक दूसरे के पेट में छुरा भौंककर आत्मबलिदान दे दिया। (1192 ई) यह घटना भी वसंत पंचमी वाले दिन ही हुई थी।

वसंत पंचमी का लाहौर निवासी वीर हकीकत से भी गहरा संबंध है। एक दिन जब मुल्ला जी किसी काम से विद्यालय छोड़कर चले गये, तो सब बच्चे खेलने लगे, पर वह पढ़ता रहा। जब अन्य बच्चों ने उसे छेड़ा, तो दुर्गा मां की सौगंध दी। मुस्लिम बालकों ने दुर्गा मां की हंसी उड़ाई। हकीकत ने कहा कि यदि में तुम्हारी बीबी फातिमा के बारे में कुछ कहूं, तो तुम्हें कैसा लगेगा?

बस फिर क्या था, मुल्ला जी के आते ही उन शरारती छात्रों ने शिकायत कर दी कि इसने बीबी फातिमा को गाली दी है। फिर तो बात बढ़ते हुए काजी तक जा पहुंची। मुस्लिम शासन में वही निर्णय हुआ, जिसकी अपेक्षा थी। आदेश हो गया कि या तो हकीकत मुसलमान बन जाये, अन्यथा उसे मृत्युदंड दिया जायेगा। हकीकत ने यह स्वीकार नहीं किया। परिणामत: उसे तलवार के घाट उतारने का फरमान जारी हो गया।

कहते हैं उसके भोले मुख को देखकर जल्लाद के हाथ से तलवार गिर गयी। हकीकत ने तलवार उसके हाथ में दी और कहा कि जब मैं बच्चा होकर अपने धर्म का पालन कर रहा हूं, तो तुम बड़े होकर अपने धर्म से क्यों विमुख हो रहे हो? इस पर जल्लाद ने दिल मजबूत कर तलवार चला दी, पर उस वीर का शीश धरती पर नहीं गिरा। वह आकाशमार्ग से सीधा स्वर्ग चला गया। यह घटना वसंत पंचमी (23.2.1734) को ही हुई थी। पाकिस्तान यद्यपि मुस्लिम देश है, पर हकीकत के आकाशगामी शीश की याद में वहां वसंत पंचमी पर पतंगें उड़ाई जाती है। हकीकत लाहौर का निवासी था। अत: पतंगबाजी का सर्वाधिक जोर लाहौर में रहता है।

वसंत पंचमी हमें गुरू रामसिंह कूका की भी याद दिलाती है। उनका जन्म 1816 ई. में वसंत पंचमी पर लुधियाना के भैणी ग्राम में हुआ था। कुछ समय वे रणजीत सिंह की सेना में रहे, फिर घर आकर खेतीबाड़ी में लग गये, पर आध्यात्मिक प्रवृत्ति होने के कारण इनके प्रवचन सुनने लोग आने लगे। धीरे-धीरे इनके शिष्यों का एक अलग पंथ ही बन गया, जो कूका पंथ कहलाया।

गुरू रामसिंह गोरक्षा, स्वदेशी, नारी उध्दार, अंतरजातीय विवाह, सामूहिक विवाह आदि पर बहुत जोर देते थे। उन्होंने भी सर्वप्रथम अंग्रेजी शासन का बहिश्कार कर अपनी स्वतंत्र डाक और प्रशासन व्यवस्था चलायी थी। प्रतिवर्ष मकर संक्रांति पर भैणी गांव में मेला लगता था। 1872 में मेले में आते समय उनके एक शिष्य को मुसलमानों ने घेर लिया। उन्होंने उसे पीटा और गोवध कर उसके मुंह में गोमांस ठूंस दिया। यह सुनकर गुरू रामसिंह के शिष्य भड़क गये। उन्होंने उस गांव पर हमला बोल दिया, पर दूसरी ओर से अंग्रेज सेना आ गयी। अत: युध्द का पासा पलट गया।

इस संघर्ष में अनेक कूका वीर शहीद हुए और 68 पकड़ लिये गये। इनमें से 50 को सत्रह जनवरी 1872 को मलेरकोटलामें तोप के सामने खड़ाकर उड़ा दिया गया। शेष 18 को अगले दिन फांसी दी गयी। दो दिन बाद गुरू रामसिंह को भी पकड़कर बर्मा की मांडले जेल में भेज दिया गया। 14 साल तक वहां कठोर अत्याचार सहकर 1885 ई. में उन्होंने अपना शरीर त्याग दिया।

नक्षत्र ज्योतिष सीखने वाले व्हाट्सएप्प पर संपर्क करें wa.me/+919463405098


मंगलवार, 5 दिसंबर 2023

भृगु बिंदु की गणना, द्वादश भावों में फल एवं फलित करने की विधि-

उदाहरण हेतु - 

भृगु बिंदु की गणना करने की विधि-

चन्द्रमा के भोगांश में से राहु के भोगांश को घटायें। जो बचता है उसे 2 से भाग दें। प्राप्तांक में जन्म कुंडली के राहु के भोगान्शो को जोड़ दें। यह प्राप्तांक राहु-चन्द्रमा अक्ष का भृगु बिंदु होगा।

उदाहरण ....

जन्म तिथि : 11 फरवरी, 1971
जन्म समय : 06:45 सुबह
जन्म स्थान : पटना (बिहार)

लग्नकुंडली में देखें-
चंद्र स्पष्ट = 04:06:11:26
राहु स्पष्ट = 10:00:09:21 घटाने पर
------------------------------------
शेष        =06:06:02:05

(नोट- यदि चंद्रस्पष्ट की राशि संख्या राहुस्पष्ट से कम हो तो चंद्रस्पष्ट की राशि में 12 जोड़ लेना चाहिये।)

अब शेष में 2 का भाग देकर प्राप्तांक में राहुस्पष्ट को जोड़ने पर भृगुबिन्दु का स्पष्ट प्राप्त होगा।

शेष        =06:06:02:05
2 से भाग देने पर        ÷2
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प्राप्तांक =03:03:01:02:30 में
राहुस्पष्ट =10:00:09:21:00 को जोड़ने पर
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भृगुबिन्दु =13:03:10:23:30 प्राप्त हुआ।

(नोट- राशि यदि 12 से ज्यादा हो तो 12 घटाकर ही प्रयोग करें।)

भृगुबिन्दु की राशि 12 से ज्यादा होने के कारण 12 घटाने के बाद  01:03:10:23:30  भृगुबिन्दु प्राप्त हुआ।

अतः लग्नकुण्डली में भृगुबिन्दु वृष राशि में स्थित करेंगे।

गणितकर्ता : आचार्य सोहन वेदपाठी, मो. 9463405098

फलित में प्रयोग - "भृगुबिंदु" अर्थात जन्म चन्द्रमा और राहु के अक्ष के मध्य स्थित अत्यंत संवेदनशील बिंदु"!!
यह राहु-चन्द्रमा के अक्ष पर शीघ्र प्रभावित होने वाला एक संवेदनशील बिंदु है। जब राहु-केतु सहित कोई भी शुभाशुभ ग्रह गोचरवश इसको (भृगुविन्दु को) दृष्ट करता है या इस भृगु-बिंदु से युति करता है तो कुछ न कुछ शुभाशुभ घटनाएं अवश्य घटित होती हैं। चन्द्रमा इस बिंदु पर एक दृष्टि (7वीं दृष्टि) और एक युति बनाएगा और प्रत्येक महीने दो परिणाम देगा। इसी प्रकार सूर्य, बुध या शुक्र भी एक दृष्टि और एक युति बनायेंगे और प्रत्येक वर्ष दो-दो परिणाम देंगे। मंगल तीन दृष्टियाँ और एक युति बनाएगा तथा लगभग 18 महीनों में मात्र चार परिणाम देगा। बृहस्पति 12 वर्षों में पूरे भचक्र की एक परिक्रमा करने की अवधि में तीन दृष्टि और एक युति बनाकर मात्र चार परिणाम देगा। शनि लगभग 30 वर्षों में पूरे भचक्र की एक परिक्रमा करने की अवधि में तीन दृष्टि और एक युति बनाकर मात्र चार मुख्य परिणाम देगा। राहु और केतु 18 वर्षों की अवधि में तीन-तीन परिणाम देंगें। यद्यपि इसका सदैव ध्यान रखना चाहिए कि गोचर में दृष्टियों की अपेक्षा युति अधिक प्रभावशाली परिणाम देती है।
शुभ ग्रह गुरु गोचर में भृगु बिंदु को प्रभावित करेगा तो अनुकूल परिणाम देगा जैसे शिक्षा में उन्नति, रोज़गार की प्राप्ति, विवाह, संतान का जन्म, नौकरी में पदोन्नति, व्यवसाय में लाभ, कल कारखानों का विस्तार, तीर्थयात्रा, लम्बी बिमारियों से मुक्ति, बहुत समय से अधूरी पड़ी अभिलाषाओं की पूर्ती आदि।। शुभ ग्रह बुध एवं शुक्र शुभ परिणाम देंगे जैसे सम्बन्धियों से भेंट, धन संपत्ति का लाभ, छोटी तीर्थ यात्रायें, उत्सवों और आनंद का वातावरण, सम्बन्ध निकट होना आदि।

शनि प्रतिकूल परिणाम देगा जैसे लम्बी बीमारी, जीवनसाथी से असहमति, उसकी बीमारी या वियोग, धन-संपत्ति की आकस्मिक हानि, निकट सम्बन्धी की मृत्यु, स्वयं जातक की मृत्यु आदि।

अशुभ ग्रह मंगल और सूर्य प्रतिकूल परिणाम देंगें जैसे छोटी बीमारी या चोट, निकट सम्बन्धियों से अस्थायी वियोग, धन की हानि, झगडा या एक-दूसरे को गलत समझना आदि। राहु-केतु अत्यधिक मात्रा में और ऐसे स्रोतों से (जिनसे आशा नहीं होती) आकस्मिक शुभाशुभ परिणाम देंगे जैसे विषैले जीव जंतुओं का काटना, मानसिक पीड़ा, आयकर, बिक्रीकर या प्रवर्तन विभाग का छापा, बहुमूल्य वस्तुओं की चोरी, प्रताड़ना, नौकरी में पदावनति या बर्खास्त होना, परिवारवालों से या भार्या से मतभेद आदि। कभी-कभी ऐसा भी होता है की बृहस्पति और शुक्र, या बृहस्पति और बुध, या शुक्र और बुध, दोनों एक साथ या कभी-कभी ये तीनो ही ग्रह एक साथ भृगु बिंदु के ऊपर गोचर में युति या उसे दृष्ट करके अनुकूल परिणामों के प्रभावों को अत्यधिक उच्च स्तर तक बढ़ा देते हैं।

इसी प्रकार सूर्य और मंगल, या सूर्य और शनि, या शनि और मंगल, दोनों एक साथ या एक-एक करके तीनो ग्रह बारी-बारी से भृगुबिंदु के ऊपर गोचर में युति या इसे दृष्ट करके प्रतिकूल परिणामों के प्रभावों को अत्यधिक उच्च स्तर तक अशुभ बना देते हैं।
भृगु बिंदु की राशि का स्वामी सदैव ही अच्छे परिणाम देता है बशर्ते यह जन्मांग में अत्यधिक निर्बली न हो। यदि जन्म कुंडली में नैसर्गिक शुभ ग्रह और भृगु-बिंदु एक-दूसरे से केंद्र या त्रिकोण में होते हैं तो अच्छे एवं मंगलकारी परिणाम देते हैं।
एक निर्बली ग्रह जब भृगु बिंदु के ऊपर गोचर करता है तो अपने स्वामित्व वाले भाव से सम्बंधित अशुभ परिणाम देता है। अशुभ भावो के स्वामी यदि जन्मांग में निर्बली हों और भृगु बिंदु से छठे या आठवें भाव में हों तो अपने स्वामित्व के भाव सम्बन्धी अशुभ
परिणाम नहीं देते।।



अलग-अलग भावों में भृगुबिंदु का फल- 

 केंद्र (1,4,7,10) में भृगुबिंदु कम प्रयासों के साथ अस्तित्व में प्रारंभिक उपलब्धियों को दर्शाता है

 त्रिकोण (1,5,9) में भृगुबिंदु कर्म के जबरदस्त उपाय को प्रदर्शित करता है, ट्राइन भाव में भृगुबिन्दु प्रशिक्षण, सीखने और अंतर्दृष्टि का एक बड़ा सूचक है।

 दुःख स्थान (6,8,12) में भृगुबिंदु रोजमर्रा की जिंदगी में प्रयासों के जबरदस्त उपाय के साथ देर से सिद्धि का प्रदर्शन करते हैं।

 पहले भाव में भृगुबिंदु आत्म प्रयासों के बाद कर्म का प्रदर्शन करते हैं।

 दूसरे भाव में भृगुबिंदु परिवार, धन, शिक्षा, गायन, बैंकिंग और निधि के साथ कर्म के भागीदार को प्रदर्शित करता है।

 तीसरे भाव में भृगुबिंदु साथी, सिस्टम और सर्कल, व्यापार, लघु यात्रा, परिजन, चित्रकला, योग्यता, यात्रा, मीडिया, आईटी, पीसी, मीडिया और रचना के माध्यम से कर्म को दर्शाता है।

 चौथे भाव में भृगुबिन्दु कहते हैं कि कर्म घर, माता, संपत्ति, वाहन, प्रशिक्षण से जुड़ा हुआ है।

 पाँचवें घर में भृगुबिंदु कर्म को आविष्कार, अंतर्दृष्टि, काम, सीखने, ज्योतिष, विज्ञान, सरकार, सामान्य क्षमता, सरकारी मुद्दों, बच्चों, सामग्री रचना और अन्यता के माध्यम से बताता है।

 छठे घर में भृगुबिंदु प्रयासों, कड़ी मेहनत, काम, रोजमर्रा की गतिविधियों, सेवा कानूनन, मातृ पक्ष के रिश्तेदार, अदालत, अभियोजन और चिकित्सीय के साथ हैं।

 सातवें घर में भृगुबिंदु साथी, संबंध, संयुक्त प्रयास, व्यवसाय, विवाह, उन्नति और संघ के माध्यम से कर्म को दर्शाता है।

 आठवें भाव में भृगुबिंदु कठोर प्रयासों के साथ अपमानजनक प्रयासों, बीमा, उद्योग, विधायी मुद्दों, तनाव, औषधीय, अन्य धन, एकतरफा नकदी, रहस्यमय और ज्योतिष को प्रदर्शित करता है।

 नौवें भाव में भृगुबिंदु उच्च कर्म के माध्यम से कर्म प्राप्त करते हैं, शिक्षित, व्याख्यान, अन्य धर्म, धर्म, विधायी मुद्दे, कानून, न्याय, लंबी यात्रा और भाग्य को दर्शाता है।

 दसवें भाव में भृगुबिंदु अय्यूब, कुख्यात, विधायी मुद्दों, पिता, पिता के माध्यम से कर्म कहते हैं।

 ग्यारहवें भाव में भृगुबिंदु मित्र मंडली, अपेक्षाओं और इच्छाओं, नकदी, खरीद, वरिष्ठ परिजन, वेब, विज्ञान, अंतरिक्ष, नवाचार, उद्योग के साथ कर्म का प्रदर्शन करता है।

 बारहवें भाव में भृगुबिंदु विदेशी, अलगाव, मोक्ष, दूसरों की सेवा, उपहार के माध्यम से कर्म का प्रदर्शन करता है।

 बृहस्पति: यह मध्यम गति वाला लाभकारी ग्रह अच्छे परिणाम दे सकता है, उदाहरण के लिए, अध्ययन में अग्रिम;  काम मिल रहा है;  शादी;  बच्चों का जन्म;  प्रशासन में उन्नति;  व्यापार में लाभ;  उद्योग का विस्तार;  यात्रा;  लंबे समय तक बीमारी से भर्ती;  कुछ समय पहले से ही चाहने वालों की संतुष्टि और आगे की चाहत।  बृहस्पति हर समय साथियों से सहायता के माध्यम से असुविधाओं का निपटान करने में मदद करता है।

 बुध और शुक्र: ये त्वरित गति वाले लाभकारी ग्रह महान परिणाम दे सकते हैं, उदाहरण के लिए, लंबे समय तक खिंचाव के बाद संबंधों को पूरा करना;  धन का थोड़ा लाभ;  छोटी यात्राएँ;  मधुरता और करीबी संबंधों आदि के साथ जश्न मनाना।

 शनि: मालेफ़िक परिणाम जैसे चिकित्सा मुद्दे, संयुग्मित घर्षण (या उसके विकार, टुकड़ी और इतने पर);  कब्जे / व्यवसाय में दुर्भाग्य (काम खोने, अवांछनीय आदान-प्रदान, अचानक धन की हानि और आगे);  घनिष्ठ संबंधों।

 सूर्य और मंगल: विकार / क्षति जैसे मामूली पुरुष संबंधी परिणाम;  निकट संबंधियों से संक्षिप्त अलगाव;  नकदी की हानि।

 राहु / केतु: सकारात्मक या परेशान करने वाले दोनों परिणामों का कारण बन सकता है, नीले रंग से बाहर, बड़े पैमाने पर और अचानक स्रोतों से अचानक लाभ या पुरुष संबंधी परिणाम (राहु / केतु पर आकस्मिक या लाभकारी या सामान्य रूप से आश्चर्यजनक क्षेत्रों से;  साँप या विषाक्त कीड़े द्वारा नरसंहार के परिणाम  तनाव / उकसावा;  सरकार द्वारा आवश्यक आश्वासन;  संपत्ति की चोरी;  रोजगार / संयुग्मन संबंधों में दुर्भाग्य ।


शनिवार, 26 अगस्त 2023

रक्षाबंधन कब करें ?

रक्षाबन्धन 30 अगस्त 2023 को रात 9:01 के बाद एवं मध्यरात्रि से पहले तक रात में ही मनायें। 31 अगस्त को नहीं (शास्त्र सम्मत यही निर्णय है।)
इस वर्ष 30 अगस्त 2023 बुधवार को (भद्रा होने से रात्रि 9:01) भद्राशुद्धि बाद रक्षाबंधन पर्व मनाया जाएगा।
रक्षाबंधन में रात्रि दोष नहीं होता है- 

भद्रान्ते प्रदोषे रात्रौ वा कार्यम्।


पूर्णिमा 31 अगस्त को पूरे भारत में पूर्णिमा उदयकाल में त्रिमहूर्त से कम है अतः 31 अगस्त को रक्षाबंधन एवं श्रावणी नहीं करना चाहिए।
उदये त्रिमुहूर्त्तन्यूनत्वे पूर्वेद्यु: प्रदोषादिकाले कर्तव्यम्।


आचार्य सोहन वेदपाठी , लुधियाना wa.me/+919463405098
      रक्षाबंधन में भद्रादोष होता है। यथा -
भद्रायां द्वे न कर्तव्ये श्रावणी फाल्गुनी तथा।
भद्रा में दो कार्य नहीं करने चाहियें श्रावणी अर्थात् रक्षाबंधन और होलिका दहन। भद्रा में श्रावणी करने से राजा की मृत्यु होती है और होली जलाने से नगर में आग संबंधित उपद्रव होते हैं। अतः रक्षाबंधन पर्व में भद्रा पूर्णतः त्याज्य है। उसका कोई भी परिहार ग्राह्य नहीं है। रक्षाबंधन की पूर्णिमा में भद्रा मुख पुच्छ आदि ग्रहण करना शास्त्र मर्यादा के विरुद्ध है। रक्षाबंधन श्रावण पूर्णिमा के दिन ही कर्तव्य है। इस दिन ग्रहण या संक्रांति हो तो भी इसी दिन भद्रा रहित काल में रक्षार्थ रक्षापोटलिका युक्त रक्षासूत्र बांधना और बंधवाना  चाहिए।


       यदि पूरे दिन भद्रा हो तो रात्रि में प्रदोष काल में या भद्रा समाप्ति पर सभी रक्षाबंधन करें। रक्षाबंधन कर्म होलिका के समान सभी वर्णों के लिए कर्तव्य है। सूर्यास्त के साथ निशामुख से तीन मुहुर्त अर्थात् स्थूल रुप से छः घटी पर्यन्त अर्थात् सूर्यास्त से अढ़ाई घंटे तक "प्रदोष काल" रहता है।

 अतः अपने अपने क्षेत्र के पंचांगों के अनुसार भद्रा समाप्ति पर ही 30 अगस्त को ही रक्षाबंधन करें। उक्त प्रमाण  हेमाद्रिकृत चतुर्वर्गचिन्तामणि, पुराण ग्रंथ, स्मृति महार्णव, निर्णय सिंधु, धर्म सिंधु, जयसिंह कल्पद्रुम, संस्कार गणपति आदि धर्मग्रंथों से लिये गए हैं। शंका होने पर आप भी अवलोकन करें।

 
याजुषादियों को उपाकर्म (श्रावणी) भी 30 अगस्त को ही कर्तव्य है। उपाकर्म में भद्रा दोष नहीं होता है। वह संगवकाल में ही कर लेना चाहिये।


काशी के हृषिकेश पञ्चाङ्ग में लिखा भी है -
अद्यैव पौर्णमासीपरकमुख्यकालस्तेषां संगवकाले शुक्लयाजूषमापस्तम्ब शाखिनां तदनुषंगेन श्रावणीकर्म कर्तृणामन्येषां चोपाकर्मविधिः यजुर्वेदीनां उपाकर्म (श्रावणी)।