Tuesday 5 December 2023

भृगु बिंदु की गणना, द्वादश भावों में फल एवं फलित करने की विधि-

उदाहरण हेतु - 

भृगु बिंदु की गणना करने की विधि-

चन्द्रमा के भोगांश में से राहु के भोगांश को घटायें। जो बचता है उसे 2 से भाग दें। प्राप्तांक में जन्म कुंडली के राहु के भोगान्शो को जोड़ दें। यह प्राप्तांक राहु-चन्द्रमा अक्ष का भृगु बिंदु होगा।

उदाहरण ....

जन्म तिथि : 11 फरवरी, 1971
जन्म समय : 06:45 सुबह
जन्म स्थान : पटना (बिहार)

लग्नकुंडली में देखें-
चंद्र स्पष्ट = 04:06:11:26
राहु स्पष्ट = 10:00:09:21 घटाने पर
------------------------------------
शेष        =06:06:02:05

(नोट- यदि चंद्रस्पष्ट की राशि संख्या राहुस्पष्ट से कम हो तो चंद्रस्पष्ट की राशि में 12 जोड़ लेना चाहिये।)

अब शेष में 2 का भाग देकर प्राप्तांक में राहुस्पष्ट को जोड़ने पर भृगुबिन्दु का स्पष्ट प्राप्त होगा।

शेष        =06:06:02:05
2 से भाग देने पर        ÷2
----------------------------------
प्राप्तांक =03:03:01:02:30 में
राहुस्पष्ट =10:00:09:21:00 को जोड़ने पर
---------------------------------------
भृगुबिन्दु =13:03:10:23:30 प्राप्त हुआ।

(नोट- राशि यदि 12 से ज्यादा हो तो 12 घटाकर ही प्रयोग करें।)

भृगुबिन्दु की राशि 12 से ज्यादा होने के कारण 12 घटाने के बाद  01:03:10:23:30  भृगुबिन्दु प्राप्त हुआ।

अतः लग्नकुण्डली में भृगुबिन्दु वृष राशि में स्थित करेंगे।

गणितकर्ता : आचार्य सोहन वेदपाठी, मो. 9463405098

फलित में प्रयोग - "भृगुबिंदु" अर्थात जन्म चन्द्रमा और राहु के अक्ष के मध्य स्थित अत्यंत संवेदनशील बिंदु"!!
यह राहु-चन्द्रमा के अक्ष पर शीघ्र प्रभावित होने वाला एक संवेदनशील बिंदु है। जब राहु-केतु सहित कोई भी शुभाशुभ ग्रह गोचरवश इसको (भृगुविन्दु को) दृष्ट करता है या इस भृगु-बिंदु से युति करता है तो कुछ न कुछ शुभाशुभ घटनाएं अवश्य घटित होती हैं। चन्द्रमा इस बिंदु पर एक दृष्टि (7वीं दृष्टि) और एक युति बनाएगा और प्रत्येक महीने दो परिणाम देगा। इसी प्रकार सूर्य, बुध या शुक्र भी एक दृष्टि और एक युति बनायेंगे और प्रत्येक वर्ष दो-दो परिणाम देंगे। मंगल तीन दृष्टियाँ और एक युति बनाएगा तथा लगभग 18 महीनों में मात्र चार परिणाम देगा। बृहस्पति 12 वर्षों में पूरे भचक्र की एक परिक्रमा करने की अवधि में तीन दृष्टि और एक युति बनाकर मात्र चार परिणाम देगा। शनि लगभग 30 वर्षों में पूरे भचक्र की एक परिक्रमा करने की अवधि में तीन दृष्टि और एक युति बनाकर मात्र चार मुख्य परिणाम देगा। राहु और केतु 18 वर्षों की अवधि में तीन-तीन परिणाम देंगें। यद्यपि इसका सदैव ध्यान रखना चाहिए कि गोचर में दृष्टियों की अपेक्षा युति अधिक प्रभावशाली परिणाम देती है।
शुभ ग्रह गुरु गोचर में भृगु बिंदु को प्रभावित करेगा तो अनुकूल परिणाम देगा जैसे शिक्षा में उन्नति, रोज़गार की प्राप्ति, विवाह, संतान का जन्म, नौकरी में पदोन्नति, व्यवसाय में लाभ, कल कारखानों का विस्तार, तीर्थयात्रा, लम्बी बिमारियों से मुक्ति, बहुत समय से अधूरी पड़ी अभिलाषाओं की पूर्ती आदि।। शुभ ग्रह बुध एवं शुक्र शुभ परिणाम देंगे जैसे सम्बन्धियों से भेंट, धन संपत्ति का लाभ, छोटी तीर्थ यात्रायें, उत्सवों और आनंद का वातावरण, सम्बन्ध निकट होना आदि।

शनि प्रतिकूल परिणाम देगा जैसे लम्बी बीमारी, जीवनसाथी से असहमति, उसकी बीमारी या वियोग, धन-संपत्ति की आकस्मिक हानि, निकट सम्बन्धी की मृत्यु, स्वयं जातक की मृत्यु आदि।

अशुभ ग्रह मंगल और सूर्य प्रतिकूल परिणाम देंगें जैसे छोटी बीमारी या चोट, निकट सम्बन्धियों से अस्थायी वियोग, धन की हानि, झगडा या एक-दूसरे को गलत समझना आदि। राहु-केतु अत्यधिक मात्रा में और ऐसे स्रोतों से (जिनसे आशा नहीं होती) आकस्मिक शुभाशुभ परिणाम देंगे जैसे विषैले जीव जंतुओं का काटना, मानसिक पीड़ा, आयकर, बिक्रीकर या प्रवर्तन विभाग का छापा, बहुमूल्य वस्तुओं की चोरी, प्रताड़ना, नौकरी में पदावनति या बर्खास्त होना, परिवारवालों से या भार्या से मतभेद आदि। कभी-कभी ऐसा भी होता है की बृहस्पति और शुक्र, या बृहस्पति और बुध, या शुक्र और बुध, दोनों एक साथ या कभी-कभी ये तीनो ही ग्रह एक साथ भृगु बिंदु के ऊपर गोचर में युति या उसे दृष्ट करके अनुकूल परिणामों के प्रभावों को अत्यधिक उच्च स्तर तक बढ़ा देते हैं।

इसी प्रकार सूर्य और मंगल, या सूर्य और शनि, या शनि और मंगल, दोनों एक साथ या एक-एक करके तीनो ग्रह बारी-बारी से भृगुबिंदु के ऊपर गोचर में युति या इसे दृष्ट करके प्रतिकूल परिणामों के प्रभावों को अत्यधिक उच्च स्तर तक अशुभ बना देते हैं।
भृगु बिंदु की राशि का स्वामी सदैव ही अच्छे परिणाम देता है बशर्ते यह जन्मांग में अत्यधिक निर्बली न हो। यदि जन्म कुंडली में नैसर्गिक शुभ ग्रह और भृगु-बिंदु एक-दूसरे से केंद्र या त्रिकोण में होते हैं तो अच्छे एवं मंगलकारी परिणाम देते हैं।
एक निर्बली ग्रह जब भृगु बिंदु के ऊपर गोचर करता है तो अपने स्वामित्व वाले भाव से सम्बंधित अशुभ परिणाम देता है। अशुभ भावो के स्वामी यदि जन्मांग में निर्बली हों और भृगु बिंदु से छठे या आठवें भाव में हों तो अपने स्वामित्व के भाव सम्बन्धी अशुभ
परिणाम नहीं देते।।



अलग-अलग भावों में भृगुबिंदु का फल- 

 केंद्र (1,4,7,10) में भृगुबिंदु कम प्रयासों के साथ अस्तित्व में प्रारंभिक उपलब्धियों को दर्शाता है

 त्रिकोण (1,5,9) में भृगुबिंदु कर्म के जबरदस्त उपाय को प्रदर्शित करता है, ट्राइन भाव में भृगुबिन्दु प्रशिक्षण, सीखने और अंतर्दृष्टि का एक बड़ा सूचक है।

 दुःख स्थान (6,8,12) में भृगुबिंदु रोजमर्रा की जिंदगी में प्रयासों के जबरदस्त उपाय के साथ देर से सिद्धि का प्रदर्शन करते हैं।

 पहले भाव में भृगुबिंदु आत्म प्रयासों के बाद कर्म का प्रदर्शन करते हैं।

 दूसरे भाव में भृगुबिंदु परिवार, धन, शिक्षा, गायन, बैंकिंग और निधि के साथ कर्म के भागीदार को प्रदर्शित करता है।

 तीसरे भाव में भृगुबिंदु साथी, सिस्टम और सर्कल, व्यापार, लघु यात्रा, परिजन, चित्रकला, योग्यता, यात्रा, मीडिया, आईटी, पीसी, मीडिया और रचना के माध्यम से कर्म को दर्शाता है।

 चौथे भाव में भृगुबिन्दु कहते हैं कि कर्म घर, माता, संपत्ति, वाहन, प्रशिक्षण से जुड़ा हुआ है।

 पाँचवें घर में भृगुबिंदु कर्म को आविष्कार, अंतर्दृष्टि, काम, सीखने, ज्योतिष, विज्ञान, सरकार, सामान्य क्षमता, सरकारी मुद्दों, बच्चों, सामग्री रचना और अन्यता के माध्यम से बताता है।

 छठे घर में भृगुबिंदु प्रयासों, कड़ी मेहनत, काम, रोजमर्रा की गतिविधियों, सेवा कानूनन, मातृ पक्ष के रिश्तेदार, अदालत, अभियोजन और चिकित्सीय के साथ हैं।

 सातवें घर में भृगुबिंदु साथी, संबंध, संयुक्त प्रयास, व्यवसाय, विवाह, उन्नति और संघ के माध्यम से कर्म को दर्शाता है।

 आठवें भाव में भृगुबिंदु कठोर प्रयासों के साथ अपमानजनक प्रयासों, बीमा, उद्योग, विधायी मुद्दों, तनाव, औषधीय, अन्य धन, एकतरफा नकदी, रहस्यमय और ज्योतिष को प्रदर्शित करता है।

 नौवें भाव में भृगुबिंदु उच्च कर्म के माध्यम से कर्म प्राप्त करते हैं, शिक्षित, व्याख्यान, अन्य धर्म, धर्म, विधायी मुद्दे, कानून, न्याय, लंबी यात्रा और भाग्य को दर्शाता है।

 दसवें भाव में भृगुबिंदु अय्यूब, कुख्यात, विधायी मुद्दों, पिता, पिता के माध्यम से कर्म कहते हैं।

 ग्यारहवें भाव में भृगुबिंदु मित्र मंडली, अपेक्षाओं और इच्छाओं, नकदी, खरीद, वरिष्ठ परिजन, वेब, विज्ञान, अंतरिक्ष, नवाचार, उद्योग के साथ कर्म का प्रदर्शन करता है।

 बारहवें भाव में भृगुबिंदु विदेशी, अलगाव, मोक्ष, दूसरों की सेवा, उपहार के माध्यम से कर्म का प्रदर्शन करता है।

 बृहस्पति: यह मध्यम गति वाला लाभकारी ग्रह अच्छे परिणाम दे सकता है, उदाहरण के लिए, अध्ययन में अग्रिम;  काम मिल रहा है;  शादी;  बच्चों का जन्म;  प्रशासन में उन्नति;  व्यापार में लाभ;  उद्योग का विस्तार;  यात्रा;  लंबे समय तक बीमारी से भर्ती;  कुछ समय पहले से ही चाहने वालों की संतुष्टि और आगे की चाहत।  बृहस्पति हर समय साथियों से सहायता के माध्यम से असुविधाओं का निपटान करने में मदद करता है।

 बुध और शुक्र: ये त्वरित गति वाले लाभकारी ग्रह महान परिणाम दे सकते हैं, उदाहरण के लिए, लंबे समय तक खिंचाव के बाद संबंधों को पूरा करना;  धन का थोड़ा लाभ;  छोटी यात्राएँ;  मधुरता और करीबी संबंधों आदि के साथ जश्न मनाना।

 शनि: मालेफ़िक परिणाम जैसे चिकित्सा मुद्दे, संयुग्मित घर्षण (या उसके विकार, टुकड़ी और इतने पर);  कब्जे / व्यवसाय में दुर्भाग्य (काम खोने, अवांछनीय आदान-प्रदान, अचानक धन की हानि और आगे);  घनिष्ठ संबंधों।

 सूर्य और मंगल: विकार / क्षति जैसे मामूली पुरुष संबंधी परिणाम;  निकट संबंधियों से संक्षिप्त अलगाव;  नकदी की हानि।

 राहु / केतु: सकारात्मक या परेशान करने वाले दोनों परिणामों का कारण बन सकता है, नीले रंग से बाहर, बड़े पैमाने पर और अचानक स्रोतों से अचानक लाभ या पुरुष संबंधी परिणाम (राहु / केतु पर आकस्मिक या लाभकारी या सामान्य रूप से आश्चर्यजनक क्षेत्रों से;  साँप या विषाक्त कीड़े द्वारा नरसंहार के परिणाम  तनाव / उकसावा;  सरकार द्वारा आवश्यक आश्वासन;  संपत्ति की चोरी;  रोजगार / संयुग्मन संबंधों में दुर्भाग्य ।


Saturday 26 August 2023

रक्षाबंधन कब करें ?

रक्षाबन्धन 30 अगस्त 2023 को रात 9:01 के बाद एवं मध्यरात्रि से पहले तक रात में ही मनायें। 31 अगस्त को नहीं (शास्त्र सम्मत यही निर्णय है।)
इस वर्ष 30 अगस्त 2023 बुधवार को (भद्रा होने से रात्रि 9:01) भद्राशुद्धि बाद रक्षाबंधन पर्व मनाया जाएगा।
रक्षाबंधन में रात्रि दोष नहीं होता है- 

भद्रान्ते प्रदोषे रात्रौ वा कार्यम्।


पूर्णिमा 31 अगस्त को पूरे भारत में पूर्णिमा उदयकाल में त्रिमहूर्त से कम है अतः 31 अगस्त को रक्षाबंधन एवं श्रावणी नहीं करना चाहिए।
उदये त्रिमुहूर्त्तन्यूनत्वे पूर्वेद्यु: प्रदोषादिकाले कर्तव्यम्।


आचार्य सोहन वेदपाठी , लुधियाना wa.me/+919463405098
      रक्षाबंधन में भद्रादोष होता है। यथा -
भद्रायां द्वे न कर्तव्ये श्रावणी फाल्गुनी तथा।
भद्रा में दो कार्य नहीं करने चाहियें श्रावणी अर्थात् रक्षाबंधन और होलिका दहन। भद्रा में श्रावणी करने से राजा की मृत्यु होती है और होली जलाने से नगर में आग संबंधित उपद्रव होते हैं। अतः रक्षाबंधन पर्व में भद्रा पूर्णतः त्याज्य है। उसका कोई भी परिहार ग्राह्य नहीं है। रक्षाबंधन की पूर्णिमा में भद्रा मुख पुच्छ आदि ग्रहण करना शास्त्र मर्यादा के विरुद्ध है। रक्षाबंधन श्रावण पूर्णिमा के दिन ही कर्तव्य है। इस दिन ग्रहण या संक्रांति हो तो भी इसी दिन भद्रा रहित काल में रक्षार्थ रक्षापोटलिका युक्त रक्षासूत्र बांधना और बंधवाना  चाहिए।


       यदि पूरे दिन भद्रा हो तो रात्रि में प्रदोष काल में या भद्रा समाप्ति पर सभी रक्षाबंधन करें। रक्षाबंधन कर्म होलिका के समान सभी वर्णों के लिए कर्तव्य है। सूर्यास्त के साथ निशामुख से तीन मुहुर्त अर्थात् स्थूल रुप से छः घटी पर्यन्त अर्थात् सूर्यास्त से अढ़ाई घंटे तक "प्रदोष काल" रहता है।

 अतः अपने अपने क्षेत्र के पंचांगों के अनुसार भद्रा समाप्ति पर ही 30 अगस्त को ही रक्षाबंधन करें। उक्त प्रमाण  हेमाद्रिकृत चतुर्वर्गचिन्तामणि, पुराण ग्रंथ, स्मृति महार्णव, निर्णय सिंधु, धर्म सिंधु, जयसिंह कल्पद्रुम, संस्कार गणपति आदि धर्मग्रंथों से लिये गए हैं। शंका होने पर आप भी अवलोकन करें।

 
याजुषादियों को उपाकर्म (श्रावणी) भी 30 अगस्त को ही कर्तव्य है। उपाकर्म में भद्रा दोष नहीं होता है। वह संगवकाल में ही कर लेना चाहिये।


काशी के हृषिकेश पञ्चाङ्ग में लिखा भी है -
अद्यैव पौर्णमासीपरकमुख्यकालस्तेषां संगवकाले शुक्लयाजूषमापस्तम्ब शाखिनां तदनुषंगेन श्रावणीकर्म कर्तृणामन्येषां चोपाकर्मविधिः यजुर्वेदीनां उपाकर्म (श्रावणी)।

Monday 20 February 2023

सोमवती अमावस्या का महत्त्व

20 फरवरी 2023 को सोमवती अमावस्या है जो महान पुण्य देने वाला है , आइये इसके बारें में जानते हैं।
किसी भी मास की अमावस्या यदि सोमवार को हो तो उसे सोमवती अमावस्या कहा जाता है।
इस दिन  यमुनादि नदियों, मथुरा  आदि तीर्थों में स्नान, गौदान, अन्नदान, ब्राह्मण भोजन, वस्त्र, स्वर्ण आदि दान का विशेष महत्त्व माना गया है। इस दिन गंगा स्नान का भी विशिष्ट महत्त्व है। यही कारण है कि गंगा और अन्य पवित्र नदियों के तटों पर इतने श्रद्धालु एकत्रित हो जाते हैं कि वहां मेले ही लग जाते हैं। सोमवती अमावस्या को गंगा तथा अन्य पवित्र नदियों में स्नान पहले तो एक धार्मिक उत्सव का रूप ले लेता था।

निर्णय सिंधु में व्यास के वचनानुसार इस दिन मौन रहकर स्नान-ध्यान करने से सहस्र गोदान का पुण्य फल प्राप्त होता है। यह स्त्रियों का प्रमुख व्रत है। लेकिन पुरुष भी कर सकते हैं।
भानुसप्तमी एवं सोमवती अमावस्या का पुण्य ग्रहणतुल्य
होता है।
सोमवार चंद्रमा का दिन हैं। इस दिन (प्रत्येक अमावस्या को) सूर्य तथा चंद्र एक सीध में स्थित रहते हैं। इसलिए यह पर्व विशेष पुण्य देने वाला होता है।

सोमवार भगवान शिव जी का दिन माना जाता है और सोमवती अमावस्या तो पूर्णरूपेण शिव जी को समर्पित होती है।

इस दिन यदि गंगा जी जाना संभव न हो तो प्रात:काल किसी नदी या सरोवर आदि में स्नान करके भगवान शंकर, पार्वती और तुलसी की भक्तिपूर्वक पूजा करें। फिर पीपल के वृक्ष की 108 परिक्रमाएं करें और प्रत्येक परिक्रमा में कोई वस्तु चढ़ाए। प्रदक्षिणा के समय 108 फल अलग रखकर समापन के समय वे सभी वस्तुएं ब्राह्मणों और निर्धनों को दान करें।

सौजन्य - आचार्य सोहन वेदपाठी
मोबाइल : 9463405098 
http://www.acharyag.com

सोमवती अमावस्या व्रत की कथा

जब युद्ध के मैदान में सारे कौरव वंश का सर्वनाश हो गया, भीष्म पितामह शर-शैय्या पर पड़े हुए थे। उस समय युधिष्ठर भीष्म पितामह जी से पश्चाताप करने लगे, धर्मराज कहने लगे। हे पितामह! दुर्योधन की बुरी सलाह पर एवं हठ से भीम और अर्जुन के कोप से सारे कुरू वंश का नाश हो गया है। वंश का नाश देखकर मेरे हृदय में दिन रात संताप रहता है। हे पितामह! अब आप ही बताइये कि मैं क्या करू, कहाँ जाऊँ, जिससे हमें शीघ्र ही चिरंजीवी संतति प्राप्त हो। पितामह कहने लगे, हे! राजन् धर्मराज मैं तुम्हें व्रतों में शिरोमणि व्रत बतलाता हूँ जिसके करने एवं स्नान करने मात्र से चिरंजीवी संतान एवं मुक्ति प्राप्त होगी। वह है सोमवती अमावस्या का व्रत-हे राजन्! यह व्रतराज (सोमवती अमावस्या का व्रत) तुम उत्तरा से अवश्य कराओ जिससे तीनों लोकों में यश फैलाने वाला पुत्र रत्न प्राप्त होगा। धर्मराज ने कहा, कृपया पितामह इस व्रतराज के बारे में विस्तार से बताइये ये सोमवती कौन है? और इस व्रत को किसने शुरू किया। 
भीष्म जी ने कहा- हे बेटे! कांची नाम की महापुरी है, वहाँ महा पराक्रमी रत्नसेन नाम का राजा राज्य करता था। उसके राज्य में देवस्वामी नामक ब्राह्मण निवास करता था उसके सात पुत्र एवं गुणवती नाम की कन्या थी। एक दिन ब्राह्मण भिक्षुक भिक्षा माँगने आया। उसकी सातों बहुओं ने अलग-अलग भिक्षा दी और सौभाग्यवती का आर्शीवाद पाया। अंत में गुणवती ने भिक्षा दी। भिक्षुक ब्राह्मण ने उसे धर्मवती होने का आर्शीवाद दिया और कहा- यह कन्या विवाह के समय सप्तपदी के बीच ही विधवा हो जायेगी इसलिए इसे धर्माचरण ही करना चाहिए। गुणवती की माँ धनवती ने गिड़गिड़ाते दीन स्वर में कहा- हे ब्राह्मण! हमारी पुत्री के वैधव्य मिटाने का उपाय कहिए। तब वह भिक्षुक कहने लगा- हे पुत्री! यदि तेरे घर सौमा आ जाए तो उसके पूजन मात्र से ही तेरी पुत्री का वैधव्य मिट सकता है। गुणवती की माँ ने कहा कि पण्डित जी यह सौमा कौन है? कहाँ निवास करती है, क्या करती है? विस्तार से बताइये। भिक्षु कहने लगा- भारत के दक्षिण में समुद्र के बीच एक द्वीप है जिसका नाम सिंहल द्वीप है। वहाँ पर एक कीर्तिमान धोबी निवास करता है। उस धोबी के यहाँ सौमा नाम की स्त्री है, वह तीनों लोकों में अपने सत्य के कारण पतिव्रत धर्म से प्रकाश करने वाली सती है। उसके सामने भगवान एवं यमराज को भी झुकना पड़ता है जो जीव उसकी शरण में जाता है तो उसका क्षण मात्र में ही उद्धार हो जाता है। सारे दुष्कर्मों, पापों का विनाश हो जाता है, अथाह सुख वैभव की प्राप्ति हो जाती है। तुम उसे अपने घर ले आओ तो आपकी बेटी का वैधव्य मिट जाएगा।
देवस्वामी के सबसे छोटे पुत्र शिवस्वामी अपनी बहिन को साथ लेकर सिंघल द्वीप को गया। रास्ते में समुद्र के समीप रात्रि में गृद्धराज के यहाँ विश्राम किया। सुबह होते ही उस गृद्धराज ने उन्हें सिंघलद्वीप पहुँचा दिया और वे सौमा के घर के समीप ही ठहर गये। इसके बाद वह दोनों भाई बहिन प्रात: काल के समय उस धोबी की पत्नी सोमा के घर की चौक को साफ़ कर उसे प्रतिदिन लीप पोत कर सुन्दर बनाते थे और उसकी देहरी पर प्रतिदिन आटे का चौक पूजकर अरहैन डाला करते थे। उसी समय से आज भी देहरी पर अरहैन डालने की प्रथा चली आ रही है। इस प्रकार इसे करते करते उन्हें वहाँ एक साल बीत गया। इस प्रकार की स्वच्छता को देखकर सोमा ने विस्मित हो कर अपने पुत्रों एवं पुत्रवधुओं से पूछा कि यहाँ कौन झाडू लगाकर लीपा पोती करता है कौन अरहैन डालता है मुझे बताओ उन्होंने कहा हमें नहीं मालूम और न ही हमने किया है तब एक दिन उस धोबिन ने रात में छिपकर पता किया तो ज्ञात हुआ कि एक लड़की आँगन में झाडू लगा रही है और एक लड़का उसे लीप रहा है। सौमा ने उन दोनों को पूछा तुम कौन हो तो उन्होंने कहा हम दोनों भाई बहन ब्राह्मण हैं। सौमा ने कहा तुम्हारे इस कार्य से मैं जल गई, मैं बर्बाद हो गयी इस पाप से मेरी जाने क्या दशा होगी हे विप्र मैं धोबिन हूँ आप ब्राह्मण हैं फिर आप यह विपरीत कार्य क्यों कर रहे हो। शिवस्वामी ने कहा यह गुणवती मेरी बहिन है इसके विवाह के समय सप्तवदी के बीच वैधव्य योग पड़ा है। आप के पास रहने से वैधव्य योग का नाश हो सकता है इसलिए हम यह दास कर्म कर रहे हैं। सोमा ने कहा अब आगे से ऐसा मत करना मैं तुम्हारे साथ चलूँगी। 
सोमा ने अपनी वधुओं से कहा मैं इनके साथ जा रही हूँ यदि मेरे राज्य में मेरा व्यक्ति मर जाए जब तक मैं लौटकर न आ जाऊँ तब तक उसका क्रिया कर्म मत करना और उसके शरीर को सुरक्षित रखना किसी के कहने पर जला मत देना। ऐसा कह दोनों को लेकर समुद्र मार्ग से होकर कांची नगरी में पहुँच गयी। सोमा को देखकर धनवती ने प्रसन्न हो उसकी पूजा अर्चना की सोमा ने अपनी मौजूदगी में गुणवती का विवाह रुद्र शर्मा के साथ सम्पन्न करा दिया फिर वैवाहिक मंत्रों के साथ हवन करवा दिया। उसके बाद सप्तसदी के बीच रुद्र शर्मा की मृत्यु हो गयी अर्दना बहिन को विधवा जानकर सारे घरवाले रोने लगे किन्तु सोमा शांत रही। सोमा ने अति विलाप देखकर अपना व्रतराज सत्य समझाया और व्रतराज के प्रभाव से होने वाला मृत्यु विनाशक पुष्प विधि पूर्वक संकल्प करके दे दिया। रुद्र शर्मा व्रतराज के प्रभाव से शीघ्र जीवित हो गया। उसी बीच उस सोमा के घर में पहले उसके लड़के मरे फिर उसका पति मरा फिर उसका जमाता भी मर गया। सोमा ने अपने सत्य से सारी स्थिति जान ली वह घर चलने लगी। उस दिन सोमवार का दिन था अमावस्या की तिथिभी थी, रास्ते में सोमा ने नदी के किनारे स्थित एक पीपल  के पेड़ के पास जाकर नदी में स्नान किया और विष्णु भगवान की पूजा करके शक्कर हाथ में लेकर 108 प्रदाक्षिणाऐं पूरी की। भीष्म जी बोले जब सोमा ने हाथ में शक्कर लेकर 108वीं प्रदक्षणा पूरी की तभी उसके पति जमाता और पुत्र भी सभी जीवित हो गये और वह नगर लक्ष्मी से परिपूर्ण हो गया। विशेष कर उसका घर धन-धान्य से परिपूर्ण हो गया। चारों ओर हर्षोल्लास छा गया। भीष्म जी कहने लगे हमने यह वृतराज का फल विस्तार से कह सुनाया।
यदि सोमवार युक्त अमावस्या अर्थात सोमवती अमावस्या हो तो पुण्यकाल देवताओं को भी दुर्लभ है। तुम भी यह व्रत धारण करो तुम्हारा कल्याण हो जाएगा। हे अर्जुन कलियुग में जो सतिया सोमवती के चरित्र का अनुशरण करेंगी, सोमवती के गुणों का गुणवान करेंगी, वह संसार में सुयश प्राप्त करेगी। जो व्यक्ति सोम के आदर्शो का अनुसरण करेगा, धोबियों को धन देगा, सोमवती अमावस्या के दिन व्रतराज के समय धोबियों को यथा दक्षिणा देगा तथा भोज करायेगा, धोबी के बालक बालिकाओं को पुस्तक दान करेगा, वह सदा अनरता को प्राप्त करेगा। विवाह के समय कोई भी वर्ग की कन्या की माँग में सिन्दूर धोबी की सुहागिन स्त्री से भरवायेगा उसको स्वर्ण या रत्न दान करेगा तो उसकी कन्या का सुहाग दीर्घायु होता है तथा वैधव्य योग का प्रभाव नष्ट हो जाता है, जो धोबी की कन्याओं का अपमान करेगा चाहे वह ब्राह्मण ही क्यों न हो जन्म जन्म तक नरक में पड़ा रहेगा। 
जब उस ब्राह्मण ने अद्भुत चमत्कार देखा तो वह सोमा के चरणों में गिर गया धूप, दीप, पुष्प, कपूर से आरती की विभिन्न प्रकार से पूजा अर्चना की बार-बार जगत पूज्य, सर्वशक्तिमान हो युगों-युगों तक आपकी पूजा यह ब्राह्मण वंश करेगा जो उपकार आपने किया है वह भुलाने योग्य नहीं है आपके साथ-साथ आपके वंश की जो सतियां आपके चरित्र का अनुसरण करेंगी उसकी आपकी ही भाँति युगों-युगों तक पूजा होगी।