कभी आपने सोचा है कि जब भी हम ध्यान (Meditation) करने बैठते हैं, या प्रार्थना करते हैं, तो सबसे पहला काम क्या करते हैं? हम अपनी आँखें बंद कर लेते हैं। हम मौन हो जाते हैं।
लेकिन क्यों? क्या खुली आँखों से शांति नहीं मिल सकती? या क्या बाहरी शोर के बीच हम खुद को नहीं सुन सकते? इसका जवाब महर्षि पतंजलि के एक छोटे से सूत्र और गोपथ पद्धति' के एक बहुत गहरे ज्योतिषीय रहस्य में छिपा है।
महर्षि पतंजलि कहते हैं - "योगश्चित्तवृत्तिनिरोधः"। आसान भाषा में कहें तो मन (चित्त) के शोर का शांत हो जाना ही योग है।
अगर इसे ज्योतिष के नजरिए से देखें, तो हमारी जन्म कुंडली का चौथा भाव हमारा 'चित्त' या अंतर्मन है। जब तक हम खुली आँखों से यह दुनिया देखते हैं, कानों से लोगों की बातें सुनते हैं, तो हमारा चित्त दुनिया की माया, लालच और उलझनों में फँसा रहता है। गोपथ पद्धति में इसी माया और उलझन को कुंभ और राहु का प्रभाव माना गया है।
यह बाहरी शोर इतना ज्यादा होता है कि हम कभी अपने भीतर झाँक ही नहीं पाते। हम उस 5वें भाव तक पहुँच ही नहीं पाते—जो कि हमारी 'आत्मा' का स्थान है।
बिना सिर वाला रहस्यमयी ग्रह: केतु
यहीं पर एंट्री होती है ज्योतिष के सबसे रहस्यमयी ग्रह केतु की। हम सबने सुना है कि केतु के पास गर्दन के ऊपर का हिस्सा (सिर, आँख, कान, मुँह) नहीं है। यह सिर्फ एक कहानी नहीं है, बल्कि एक बहुत बड़ा विज्ञान है।
आँखें बाहरी दृश्य देखकर माया बनाती हैं। कान बातें सुनकर भ्रम पैदा करते हैं। मुँह स्वाद और शब्दों के जाल में हमें उलझाता है।
चूँकि केतु के पास ये बाहरी इंद्रियां हैं ही नहीं, इसलिए दुनिया का कोई भी शोर या कोई भी दिखावा उसे डिस्टर्ब नहीं कर सकता। वह भौतिक संवेदनाओं से पूरी तरह कटा हुआ है।
आँखें बंद करना मतलब केतु को जगाना - यही कारण है कि ध्यान और योग की पूरी प्रक्रिया असल में राहु (इंद्रियों के शोर) से दूर होकर केतु (अंतर्मन की शून्यता) की ओर जाने की यात्रा है।
जब आप अपनी आँखें बंद करते हैं और मौन होते हैं, तो आप जान-बूझकर अपनी इंद्रियों को स्विच-ऑफ कर रहे होते हैं और जैसे ही बाहरी दुनिया कटती है, आपके भीतर का 'केतु' जाग जाता है। केतु ही योग का असली जन्मदाता है।
क्या है मोक्ष और केतु की उच्चता का रहस्य ?
गोपथ पद्धति के अनुसार, केतु मोक्ष (12वें भाव - मीन राशि) का एकमात्र स्वामी (द्वादशेश) है।
अक्सर लोग सोचते हैं कि मोक्ष मरने के बाद मिलने वाली कोई जगह है। लेकिन सच तो यह है कि मोक्ष इसी जीवन में है। जब केतु जागता है, तो वह आपके चित्त के सारे शोर और सांसारिक बंधनों को काट देता है। और जैसे ही यह शोर कटता है, आपको सीधे अपनी 'आत्मा' का दर्शन हो जाता है।
गोपथ पद्धति का यह सबसे खूबसूरत नियम है: आपके भीतर के शोर को काटकर, आपको आपके ही असली रूप (आत्मा) से मिला देना—यही केतु की असली 'उच्चता' है।
तो आज रात, या कल सुबह... जब भी आपको वक्त मिले, सिर्फ कुछ मिनटों के लिए अपनी आँखें बंद करके शांत बैठिएगा। कोई मंत्र नहीं, कोई पूजा नहीं। बस मौन।
याद रखिएगा, उस पल आप सिर्फ रिलैक्स नहीं कर रहे होंगे, बल्कि अपने भीतर के उस 'केतु' को जगा रहे होंगे, जो आपको दुनिया की भीड़ से निकालकर सीधे आपसे ही मिलाने का इंतज़ार कर रहा है।
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