'इन आँखों की मस्ती के दीवाने हज़ारों हैं'- यह सिर्फ एक मशहूर फ़िल्मी गाना या शायरी की लाइन नहीं है, बल्कि अगर इसे गहराई से देखा जाए, तो यह इंसान की ज़िंदगी, उसकी चाहतों और उसकी दो अलग-अलग ताकतों के बीच के द्वंद्व को बयां करती है।
इस पंक्ति को यदि हम गोपथ ज्योतिष पद्धति से समझने की कोशिश करें, तो इसमें इंसानी चेतना और उसकी दो अलग-अलग तरह की 'आँखों' का एक बहुत ही सुंदर रहस्य छिपा हुआ मिलता है।
आइए इसे बेहद सरल शब्दों में समझते हैं। हमारी दो आँखें सिर्फ चेहरा पूरा नहीं करतीं, बल्कि ये दो अलग-अलग दिशाओं को दर्शाती हैं:
वृष अर्थात् द्वितीय भाव (बाहरी आँख) : यह वह आँख है जिससे हम इस खूबसूरत दुनिया को देखते हैं। रूप, रंग, पैसा, और सांसारिक आकर्षण यह सब इसी आँख के दायरे में आता है। इसका काम ही बाहर की चीज़ों की तरफ आकर्षित होना है।
मीन अर्थात् द्वादश भाव (भीतरी आँख) : यह वह आँख है जो बाहर नहीं, बल्कि हमारे अंदर की तरफ खुलती है। इसका संबंध शांति, सुकून और अध्यात्म से है। इस आँख के पीछे 'केतु' की ऊर्जा काम करती है, जिसका मकसद इंसान को बाहरी दिखावे से दूर करके सच से रूबरू कराना है।
मध्य का केंद्र : इन दोनों आँखों (वृष और मीन) के ठीक बीच में आकर खड़ा होता है - तुला, जिसे हम समाज, रिश्ते, वासना या दुनियादारी का केंद्र कह सकते हैं।
जब हमारी बाहरी आँख (वृष) काम करती है, तो वह हमें सीधे इस दुनियादारी (तुला) की तरफ खींच ले जाती है। गाने की लाइन 'इन आँखों की मस्ती के दीवाने हज़ारों हैं' का पहला और सीधा सा मतलब यही है। यहाँ आँख की चमक को देखकर दुनिया (हज़ारों दीवाने) आकर्षित हो रही है। यह वह रास्ता है जो इंसान को सांसारिक मोह-माया के चक्र में बांधकर रखता है।
केतु का रास्ता : लेकिन इस सिक्के का एक दूसरा और बेहद खूबसूरत पहलू भी है, जो हमारी भीतरी आँख (मीन) से जुड़ा है।
जब इंसान के अंदर की आँख खुलती है, तो दृश्य पूरी तरह बदल जाता है। जैसा कि हमने जाना, मीन का संबंध केतु से है, और केतु का झुकाव इस बाहरी दुनिया या महफ़िल की तरफ नहीं होता। केतु अपनी पूरी ताकत के साथ अपनी उच्च राशि यानी सिंह (पंचम भाव) की तरफ बढ़ता है। सिंह का सीधा सा मतलब है - हमारी आत्मा, हमारा आत्मसम्मान, और वह परम प्रकाश जिससे हम सब बने हैं।
जब इस भीतरी आँख में 'मस्ती' या दिव्य आनंद आता है, तो इंसान दुनिया के मोह-जाल में नहीं गिरता। बल्कि, केतु उसके सारे सांसारिक बंधनों को ख़त्म करके उसे सीधे उसकी आत्मा के सर्वोच्च शिखर (सिंह) पर बिठा देता है।
देखा जाए तो इस एक पंक्ति में इंसानी जीवन की दो अलग-अलग यात्राएं छिपी हुई हैं :-
1. सांसारिक यात्रा : आँखों की मस्ती जब बाहर की तरफ देखती है, तो दुनियादारी और मोह-माया (हज़ारों दीवाने) पैदा करती है।
2. आध्यात्मिक यात्रा : यही मस्ती जब अंदर की आँख (केतु) में उतरती है, तो सारे बंधनों को तोड़कर इंसान को खुद की आत्मा के असली और ऊंचे स्वरूप से मिला देती है।
गीतकार ने जिसे महफ़िल का रंग कहा था, वह असल में इंसान की चेतना के दो अलग-अलग रास्तों की बेहद खूबसूरत दास्तान है।