ज्योतिष शास्त्र में विष्कुंभादि (नक्षत्र योग) और आनन्दादि योग दोनों का विशेष महत्व है, लेकिन इन दोनों की गणना पद्धति, उद्देश्य और उनके फल (कार्य) पूरी तरह भिन्न हैं।
इन दोनों योगों के नाम और उनके कार्यों/फल में मुख्य अंतर इस प्रकार है:
1. विष्कुंभादि योग (नक्षत्र योग / नित्य योग)
यह सूर्य और चंद्रमा की गतियों के आधार पर बनने वाले 27 नित्य योग हैं। इनका आरंभ नक्षत्रों और राशियों के कुल भोग्यांश के आधार पर होता है। जन्म के समय जो योग होता है, उसे 'जातका का जन्म योग' कहा जाता है और इसका प्रभाव जातक के स्वभाव, स्वास्थ्य और जीवन पर आजीवन रहता है।
27 विष्कुंभादि योगों के नाम:
- विष्कुम्भ
- प्रीति
- आयुष्मान
- सौभाग्य
- शोभन
- अतिगंड
- सुकर्म
- धृति
- शूल
- गण्ड
- वृद्धि
- ध्रुव
- व्याघात
- हर्षण
- वज्र
- सिद्धि
- व्यतिपात
- वरीयान
- परिध
- शिव
- सिद्ध
- साध्य
- शुभ
- शुक्ल
- ब्रह्म
- ऐन्द्र
- वैधृति
इन योगों का कार्य एवं फल:
- शुभ और अशुभ प्रभाव: इन 27 योगों में से कुछ योग अत्यंत शुभ और कल्याणकारी होते हैं (जैसे- प्रीति, आयुष्मान, सौभाग्य, शोभन, सुकर्म, धृति, वृद्धि, ध्रुव, हर्षण, सिद्धि, वरीयान, शिव, सिद्ध, साध्य, शुभ, शुक्ल, ब्रह्म, ऐन्द्र), जबकि कुछ योग अशुभ या कष्टकारक माने जाते हैं (जैसे- विष्कुम्भ, अतिगंड, शूल, गण्ड, व्याघात, वज्र, व्यतिपात, परिध, वैधृति)।
- कार्यों में उपयोग: अशुभ योगों (विशेषकर विष्कुम्भ, शूल, गण्ड, व्यतिपात और वैधृति) में सामान्यतः नए कार्य, यात्रा या मांगलिक अनुष्ठान वर्जित माने जाते हैं, जबकि शुभ योगों में किए गए कार्य में सफलता और स्थिरता मिलती है।
2. आनन्दादि योग
यह योग वार (दिन) और नक्षत्र के मेल से बनने वाले विशेष योग हैं। इनकी कुल संख्या 28 है। इनका मुख्य उपयोग किसी विशिष्ट वार और नक्षत्र के संयोग से यह जानने के लिए किया जाता है कि वह समय किस कार्य के लिए शुभ है और किस कार्य के लिए अशुभ।
28 आनन्दादि योगों के नाम:
आनन्दादि योगों के नाम निम्नलिखित हैं:
- आनन्द
- कालदग्ध
- ध्वांक्ष
- ध्वात
- सौम्य
- ध्वंस
- श्रीवत्स
- वज्र
- मुद्गर
- छत्र
- मित्र
- मानस
- पद्म
- लुम्बक
- उत्पात
- मृत्यु
- राक्षस
- चर
- स्थिर
- वर्द्धमान
- संयोजन
- पाश
- केतु
- श्री
- मुसल
- गद
- मातंग
- राक्षस (अथवा अन्य पारंपरिक गणना के अनुसार चक्रभेद)
(नोट: पंचांगों में वार और नक्षत्र के योग से बनने वाले इन 28 नामों की तालिका अलग से दी होती है, जिनमें आनन्द, छत्र, मित्र, पद्म, श्रीवत्स आदि को श्रेष्ठ तथा कालदग्ध, मृत्यु, उत्पात, वज्र आदि को कष्टप्रद माना गया है।)
इन योगों का कार्य एवं फल:
- विशिष्ट फलकथन: ये योग मुख्य रूप से शुभ-अशुभ फल के शुभाशुभत्व की सूक्ष्म जांच के लिए देखे जाते हैं।
- मुहूर्त निर्धारण में उपयोग: गृह प्रवेश, यात्रा, व्यापार आरंभ, और विशेष प्रयोजनों के लिए वार-नक्षत्र के मिलान से यह देखा जाता है कि संबंधित योग जातक को आरोग्यता, धन लाभ, विजय दिलाएगा या हानि, मृत्युतुल्य कष्ट या बाधा उत्पन्न करेगा। उदाहरण के लिए—'आनन्द' और 'छत्र' योग में किए गए कार्य दीर्घकालिक लाभ और सुख देते हैं, जबकि 'मृत्यु', 'उत्पात' या 'कालदग्ध' योग में जोखिम भरे कार्य वर्जित होते हैं।
मुख्य अंतर संक्षेप में
| विशेषता | विष्कुंभादि योग (नक्षत्र योग) | आनन्दादि योग |
|---|---|---|
| आधार | सूर्य और चंद्रमा की स्थिति (भोग्यांश) | वार (दिन) और नक्षत्र का संयोग |
| कुल संख्या | 27 | 28 |
| मुख्य उपयोग | जातक के जन्मकालीन स्वभाव, नक्षत्र दोष निवारण और नित्य पंचांगीय शुभाशुभता हेतु। | विशेष मुहूर्तों में कार्य सिद्धि, यात्रा, और वार-नक्षत्र जनित विशिष्ट फलों (हानि-लाभ) की गणना हेतु। |