शनिवार, 15 अगस्त 2026

कुण्डली में जातक का कद निर्धारण कैसे करें (8 सूत्रीय अंक पद्धति) GopathAstro का एक नवीन अनुसंधान

ज्योतिषीय कद निर्धारण प्रणाली

लग्न एवं नवमांश पर आधारित 8-सूत्रीय अंक पद्धति

1. आठ प्रमुख घटक (प्रत्येक = 1 अंक)

लग्न कुण्डली (स्थूल शरीर)

  • 1. लग्न राशि 1 अंक
  • 2. लग्नेश ग्रह 1 अंक
  • 3. लग्न में स्थित ग्रह 1 अंक
  • 4. लग्न पर दृष्टि 1 अंक

नवमांश कुण्डली (सूक्ष्म शरीर)

  • 5. नवमांश लग्न राशि 1 अंक
  • 6. नवमांश लग्नेश ग्रह 1 अंक
  • 7. नवमांश लग्न में स्थित ग्रह 1 अंक
  • 8. नवमांश लग्न पर दृष्टि 1 अंक
 2. राशि, ग्रह एवं कद वर्गीकरण

ह्रस्व (लघु कद)

राशियाँ: मेष, वृषभ, कुम्भ, मीन
ग्रह: मंगल, केतु
5'2" से 5'5"

मध्यम (सम कद)

राशियाँ: मिथुन, कर्क, धनु, मकर
ग्रह: सूर्य, चन्द्र, बुध, शुक्र
5'6" से 5'8"

दीर्घ (ऊँचा कद)

राशियाँ: सिंह, कन्या, तुला, वृश्चिक
ग्रह: गुरु, शनि, राहु
5'9" से 5'11"
📐 3. संधि एवं गणना के नियम
ह्रस्व एवं मध्यम (समान अंक होने पर): आधार मान 5 फीट 6 इंच होगा। यदि दीर्घ के अंक हों तो उतने इंच जोड़ें (+)
मध्यम एवं दीर्घ (समान अंक होने पर): आधार मान 5 फीट 9 इंच होगा। यदि ह्रस्व के अंक हों तो उतने इंच घटाएं (-)
स्त्री जातक नियम: प्राप्त मानक कद में से 3 से 4 इंच घटाकर अंतिम कद निर्धारित करें।


2. कद का मानक पैमाना (पुरुष जातक हेतु)

  • अतिदीर्घ कद: 6 फीट या उस से अधिक
  • दीर्घ (ऊँचा) कद: 5 फीट 9 इंच से 5 फीट 11 इंच तक
  • मध्यम कद: 5 फीट 6 इंच से 5 फीट 8 इंच तक
  • ह्रस्व (लघु) कद: 5 फीट 2 इंच से 5 फीट 5 इंच तक
  • अतिलघु कद: 5 फीट 1 इंच से कम

​ध्यान दें - यह वर्गीकरण औसत कद 5'2" से 5'11" मानकर किया गया है। जिन क्षेत्रों में औसत कद इससे भिन्न हो वहाँ बदलाव करना पड़ेगा।

3. आठ प्रमुख घटक (प्रत्येक का 1 अंक)

​कुण्डली का विश्लेषण करते समय निम्नलिखित 8 घटकों को 1-1 अंक आवंटित करें:

  1. लग्न राशि (लग्न में कौन सी राशि उदित है?)
  2. लग्नेश (लग्न के स्वामी ग्रह का स्वरूप)
  3. लग्न में स्थित ग्रह (लग्न भाव में बैठा ग्रह)
  4. लग्न पर दृष्टि (लग्न भाव को पूर्ण दृष्टि से देखने वाला ग्रह)
  5. नवमांश लग्न राशि (D9 लग्न की राशि)
  6. नवमांश लग्नेश (D9 लग्न के स्वामी ग्रह का स्वरूप)
  7. नवमांश लग्न में स्थित ग्रह (D9 लग्न में उपस्थित ग्रह)
  8. नवमांश लग्न पर दृष्टि (D9 लग्न को देखने वाला ग्रह)
  9. विशेष: यदि किसी भाव में एक से अधिक ग्रह बैठे हों या दृष्टि डाल रहे हों, तो प्रत्येक ग्रह को उसका स्वतंत्र 1 अंक प्रदान करें।

    यदि सभी प्वाइंट ह्रस्व प्राप्त हो तो बौना (4'5" या उससे कम) एवं सभी प्वाइंट दीर्घ प्राप्त हो तो अतिदीर्घ (6' या उससे अधिक) समझें।


    ​4. गणना एवं संधि के गणितीय नियम

    ​प्राप्त अंकों का योग करने के बाद निम्नलिखित नियमों के आधार पर परिणाम निकालें:

    • बहुमत नियम: जिस वर्ग (ह्रस्व, मध्यम या दीर्घ) के अंक सर्वाधिक होंगे, जातक का कद सामान्यतः उसी सीमा में रहेगा।
    • ह्रस्व एवं मध्यम के अंक बराबर होने पर:
      • ​आधार कद 5 फीट 6 इंच (ह्रस्व-मध्यम संधि) माना जाएगा।
      • ​यदि कुण्डली में दीर्घ वर्ग के भी अंक हैं, तो प्रति दीर्घ अंक +1 इंच जोड़ दें।
    • मध्यम एवं दीर्घ के अंक बराबर होने पर:
      • ​आधार कद 5 फीट 9 इंच (मध्यम-दीर्घ संधि) माना जाएगा।
      • ​यदि कुण्डली में ह्रस्व वर्ग के भी अंक हैं, तो प्रति ह्रस्व अंक -1 इंच घटा दें।
    • स्त्री जातक के लिए विशेष नियम:
      • ​प्राकृतिक शारीरिक संरचना के अनुसार, प्राप्त मानक पुरुष कद में से 3 से 4 इंच घटाकर स्त्री जातक का अंतिम कद तय करें।

    ​5. व्यावहारिक उदाहरण से समझें

    ​उदाहरण:

    • लग्न: धनु (मध्यम) — 1 मध्यम
    • लग्नेश: गुरु (दीर्घ) — 1 दीर्घ
    • लग्नस्थ ग्रह: बुध (मध्यम) — 1 मध्यम
    • लग्न पर दृष्टि: मंगल (ह्रस्व) — 1 ह्रस्व
    • नवमांश लग्न: मीन (ह्रस्व) — 1 ह्रस्व
    • नवमांश लग्नेश: गुरु (दीर्घ) — 1 दीर्घ
    • नवमांश लग्नस्थ ग्रह: केतु (ह्रस्व) — 1 ह्रस्व
    • नवमांश लग्न पर दृष्टि: चन्द्रमा (मध्यम) — 1 मध्यम

    ​अंकों का कुल योग:

    • ह्रस्व अंक: 3
    • मध्यम अंक: 3
    • दीर्घ अंक: 2

    ​फलादेश गणना:

     यहाँ ह्रस्व (3) और मध्यम (3) दोनों के अंक बराबर हैं, इसलिए संधि का आधार मान = 5 फीट 6 इंच। तालिका में दीर्घ के 2 अंक शेष हैं, अतः आधार मान में 2 इंच जोड़े जाएंगे। 5 फीट 6 इंच + 2 इंच = 5 फीट 8 इंच होगा। 

    अंतिम परिणाम: पुरुष जातक की लंबाई लगभग 5 फीट 8 इंच होगी। (यदि यह स्त्री जातक की कुण्डली होती, तो 3.5 इंच घटाने पर कद लगभग 5 फीट 4.5 इंच आता)।

    निष्कर्ष : शारीरिक गठन केवल एक ग्रह या एक राशि के अधीन नहीं होता। जब हम स्थूल शरीर (लग्न) और सूक्ष्म स्वभाव (नवमांश) दोनों के घटकों को जोड़कर अंक प्रणाली से परिणाम निकालते हैं, तो कद का अनुमान अत्यंत सटीक और वैज्ञानिक रूप से स्पष्ट बैठता है।

    अनुसंधान एवं लेख : आचार्य सोहन वेदपाठी (गोपथ ज्योतिष पद्धति के प्रणेता) , संपर्क सूत्र 9463405098 

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मंगलवार, 14 जुलाई 2026

क्या आप ज्योतिष में 'नीच' ग्रहों से डरते हैं? गोपथ ज्योतिष पद्धति का यह दृष्टिकोण आपकी सोच बदल देगा! आचार्य सोहन वेदपाठी, लुधियाना सम्पर्क सूत्र 9463405098

गोपथ ज्योतिष पद्धति

नीचत्व से उच्चत्व: आत्मा की विकास यात्रा

अवस्था 1: मंगल (लग्न) नीच: कर्क (मोह व निर्भरता)
उच्च: मकर (दशम) लक्ष्य: निष्काम कर्मयोग
अवस्था 2: बृहस्पति (नवम) नीच: मकर (कर्म का अहंकार)
उच्च: कर्क (चतुर्थ) लक्ष्य: हृदय शुद्धि व भक्ति
अवस्था 3: चंद्रमा (चतुर्थ) नीच: वृश्चिक (काल व मृत्यु भय)
उच्च: वृषभ (द्वितीय) लक्ष्य: शाश्वत स्थिरता (मोक्ष)
गोपथ सूत्र: नीचत्व बंधन या अभिशाप नहीं, बल्कि चेतना के रूपांतरण का प्रस्थान बिंदु है।
       गोपथ ज्योतिष पद्धति: आत्मा की विकास यात्रा
   
क्या आप ज्योतिष में 'नीच' ग्रहों से डरते हैं? गोपथ ज्योतिष पद्धति का यह दृष्टिकोण आपकी सोच बदल देगा!
अक्सर ज्योतिष की चर्चाओं में 'नीच' ग्रहों को एक अभिशाप या बड़ी परेशानी के रूप में देखा जाता है। जब कोई कहता है, "मेरा मंगल नीच का है," या "मेरा चंद्रमा नीच का है," तो मन में एक नकारात्मक छवि बनती है—कि सब कुछ गलत होने वाला है।
लेकिन क्या सचमुच ऐसा है?
आज मैं आपको अपनी शोध पर आधारित गोपथ ज्योतिष पद्धति का एक ऐसा क्रांतिकारी दृष्टिकोण बताने जा रहा हूँ, जो नीचत्व को एक अभिशाप नहीं, बल्कि 'मुक्ति का प्रस्थान बिंदु' मानता है। इस पद्धति के अनुसार, 'नीच' अवस्था वास्तव में वह स्थान है, जहाँ से आपकी आत्मा को ऊपर उठना सीखना है।
यह एक विकास यात्रा है: नीचत्व के अंधेरे और संकुचन से, उच्चत्व के प्रकाश और विस्तार की ओर।
सैद्धांतिक सूत्र: उच्च से जागृति तक

गोपथ पद्धति का मूल सिद्धांत है: "प्रत्येक ग्रह अपने उच्च से संचालित होता है। ग्रह जहाँ बैठा है, वह स्थान और उसका उच्च स्थान, दोनों जीव के जीवन में 'पूर्णतः जाग्रत' अवस्था में आ जाते हैं।"

इसका अर्थ है कि कोई भी ग्रह अपनी मूल चेतना अपने उच्च स्थान से प्राप्त करता है। यदि कोई ग्रह नीच का है, तो इसका मतलब है कि उसकी उच्च चेतना अभी 'जाग्रत' नहीं है और आपको उस पर काम करना है।
कालपुरुष कुंडली (मेष लग्न) के अनुसार जीवन की तीन अवस्थाएँ होती है।
आइए, इस सिद्धांत को कालपुरुष कुंडली (मेष लग्न) के माध्यम से समझें, जहाँ जीवन के विकास की तीन स्पष्ट और अनिवार्य अवस्थाएँ उभरकर सामने आती हैं।
अवस्था 1: मंगल और शरीर (कर्क के नीचत्व से मकर के उच्चत्व की ओर)
मानव जीवन का प्रारंभ लग्न (मेष) से होता है, जिसके स्वामी मंगल हैं। मंगल का उच्च स्थान मकर (10वें भाव - कर्म) है और नीच स्थान कर्क (4थे भाव - माता, मोह) है।
 1. गर्भनाल छेदन और प्रथम मुक्ति: जन्म लेते ही जीव का पहला भौतिक संघर्ष कर्क राशि (माता का गर्भ, सुख, निर्भरता) के नीचत्व से मुक्त होना होता है। चिकित्सा विज्ञान जिसे 'गर्भनाल छेदन' कहता है, वह मंगल का कर्क के नीचत्व से मुक्ति का पहला व्यावहारिक कदम है।
 2. निर्भरता से आत्मबोध का संक्रमण: जन्म के 5-6 माह बाद शिशु का माता का दूध छुड़ाकर उसे अन्न पर आश्रित करना भी चतुर्थ भाव (कर्क/मन) से मुक्त होने की दिशा में कदम है। यहाँ से जीव सिंह राशि (5वें भाव - आत्मतत्व और स्वयं का बोध) की प्राप्ति हेतु प्रयासरत हो जाता है।
 3. निष्काम कर्म का उदय: कर्क (सुख-सुविधा) की अधीनता से निकलकर जीव अपने उच्च स्थान मकर (10वें भाव - कर्म) की ओर बढ़ता है। यह अवस्था जीव को कर्मठ बनाती है, जहाँ वह बिना फल की आसक्ति के समाज में अपना योगदान देता है। श्रीमद्भगवद्गीता का यही संदेश है: "कर्मण्येवाधिकारस्ते..."
गोपथ सूत्र: मंगल (लग्न) जब तक कर्क (मोह) में नीच का है, वह मकर (कर्म) के उच्चत्व को नहीं पा सकता। इसलिए, मोह और निर्भरता को छोड़ना ही कर्मठ बनने का मार्ग है।

अवस्था 2: बृहस्पति और संस्कार (बृहस्पति के नीचत्व से मुक्ति)
जब जीव कर्म करना सीख जाता है, तब चेतना के विकास की दूसरी अवस्था प्रारंभ होती है, जिसका प्रतिनिधित्व नवम भाव (धनु - धर्म, संस्कार) के स्वामी बृहस्पति करते हैं।
मकर में नीचत्व की पहेली: बृहस्पति का नीच स्थान मकर (10वें भाव - कर्म) है। यह दर्शाता है कि जब जीव केवल सांसारिक कर्मों और भौतिक उपलब्धियों (मकर) में पूरी तरह डूब जाता है, तो वहाँ ज्ञान और धर्म (बृहस्पति) संकुचित या 'नीच' हो जाता है।
आसक्ति से मुक्ति: जीवन का वास्तविक सत्य तब प्रकट होता है जब जीव कर्म तो करता है, लेकिन कर्म के अहंकार और उसके फलों के प्रति आसक्ति से मुक्त हो जाता है।
परम आनंद की प्राप्ति: मकर (नीचत्व) के इस बंधन को तोड़कर जब कर्मों को ईश्वर को अर्पण कर दिया जाता है, तब चेतना बृहस्पति के उच्च स्थान कर्क (4थे भाव - परम शांति, भक्ति और हृदय की शुद्धि) में प्रवेश कर जाती है।
गोपथ सूत्र: केवल कर्म (मकर) पर्याप्त नहीं है। बृहस्पति (धर्म) का उच्चत्व तब मिलता है जब कर्म आसक्ति रहित होकर भक्ति (कर्क) में बदल जाए।

अवस्था 3: चंद्रमा और काल (कर्क से वृश्चिक - आयु का क्षरण)
तीसरी और अंतिम अवस्था जीवन के सबसे सूक्ष्म और अंतिम सत्य 'काल' से जुड़ी है, जिसका संचालन चतुर्थ भाव (कर्क - मन, जीवन) के स्वामी चंद्रमा द्वारा होता है।
वृश्चिक (8वें भाव) का सत्य: चंद्रमा का नीचत्व वृश्चिक राशि में होता है, जो अष्टम भाव (आयु और मृत्यु) है। गोपथ पद्धति के अनुसार, जन्म के पहले क्षण से ही आयु का क्षरण (वृश्चिक का सक्रिय होना) प्रारंभ हो जाता है। चंद्रमा (मन) स्वभाव से चंचल और संवेदनशील है। जब तक मन कर्क (भौतिक सुख और ममता) में अटका रहेगा, वह वृश्चिक (पर परिवर्तन और मृत्यु) के भय से त्रस्त रहेगा। मन मृत्यु और नश्वरता के सत्य को स्वीकार कर लेता है, तो वह वृश्चिक के भय से मुक्त होकर अपने उच्च स्थान वृषभ (2रे भाव - अचल सत्य, स्थिरता और शाश्वत चेतना) को प्राप्त कर लेता है।
गोपथ सूत्र: मन जब तक काल (वृश्चिक) से डरेगा, वह 'नीच' का रहेगा। जब वह मृत्यु को स्वीकार कर शाश्वत सत्य (वृषभ से चतुर्थ (कर्क) अर्थात् सिंह) में स्थिर हो जाएगा, तब वह 'उच्च' का हो जाएगा। शाश्वत स्थिरता ही मोक्ष है।

निष्कर्ष: नीच ग्रह आपके गुरु हैं, शत्रु नहीं!
गोपथ ज्योतिष पद्धति का यह विश्लेषण यह स्पष्ट करता है कि कुंडली में ग्रहों का 'नीच' होना कोई अभिशाप नहीं बल्कि प्रकृति द्वारा दिया गया एक अलार्म (सचेतक) है। यह आपको बताता है कि आपको किस भाव की आसक्ति को छोड़ना है और किस उच्चता की ओर बढ़ना है।
मेष से मकर, धनु से कर्क, और कर्क से वृश्चिक की यह यात्रा वास्तव में जीव के 'कठिन पुरुषार्थ' से लेकर 'परम वैराग्य' तक की यात्रा है। अपने नीच ग्रहों से डरें नहीं, बल्कि उनसे सीखें कि आपको कहाँ से मुक्त होना है और कहाँ पहुँचना है।
यही ज्योतिष का आध्यात्मिक विज्ञान है।

मंगलवार, 7 जुलाई 2026

गोपथ ज्योतिष पद्धति के अनुसार अष्टम भाव और भावनात्मक ऊर्जा का ह्रास -

गोपथ पद्धति के अनुसार अष्टम भाव और भावनात्मक ऊर्जा का ह्रास -

अष्टम भाव केवल आयु या मृत्यु का नहीं है, बल्कि यह उर्जा के रूपांतरण और मानसिक अवसाद का भी केंद्र है। जब व्यक्ति मानसिक रूप से टूटता है, तो उसका पहला प्रभाव उसकी चेतना और निद्रा चक्र पर पड़ता है।

1. उच्च से सप्तम - कोई भी ग्रह अपने उच्च भाव से सप्तम (सामने) वाले भाव में जाने पर अपनी सहज सकारात्मक ऊर्जा को विपरीत दिशा में प्रवाहित करने लगता है। चंद्रमा वृष राशि (द्वितीय भाव - ऊर्जा, संचय) में उच्च का होता है। यहाँ से ठीक सप्तम यानी वृश्चिक (अष्टम भाव) में वह नीच का हो जाता है। उच्च अवस्था व्यक्ति को आत्मनिर्भर और ऊर्जावान बनाती है (लग्न जागृत)। इसके विपरीत, अष्टम में जाने पर सप्तम भाव (दूसरों पर निर्भरता, सामाजिक अपेक्षाएं) जागृत हो जाता है और लग्न (स्वयं का अस्तित्व, शारीरिक बल) सुप्त हो जाता है। जब लग्न सुप्त हो जाता है, तो जीवनी शक्ति समाप्त हो जाती है और व्यक्ति वास्तविकता से बचने के लिए निद्रा का सहारा लेता है।

2. चंद्रमा का नीचत्व और भावनात्मक पलायन - वृश्चिक राशि कालपुरुष के गुप्त अंगों और स्थिर जल को दर्शाती है। चंद्रमा यहाँ आकर भावनाओं के इसी दलदल में फंस जाता है। जब मन (चंद्रमा) अनसुलझे दर्द या तनाव से थक जाता है, तो शरीर तामसिक प्रवृत्ति (आलस्य और अत्यधिक नींद) को एक सुरक्षा कवच के रूप में चुनता है। इसे आलस्य कहना भूल होगी, यह वास्तव में "भावनात्मक थकावट" है।

3. पराक्रम का अभाव होने पर ही दुर्भाग्य का आविर्भाव होता है। एक पौराणिक सम्बद्ध सूत्र देखिये  “नाभिषेको न संस्कारः सिंहस्य क्रियते वने। विक्रमार्जितसत्त्वस्य स्वयमेव मृगेन्द्रता॥” और “नहि सुप्तस्य सिंहस्य प्रविशन्ति मुखे मृगाः॥”

अष्टम भाव भाग्य (नवम भाव) का व्यय (बारहवां) स्थान है। जब व्यक्ति अष्टम के प्रभाव में आकर पुरुषार्थ खो देता है और केवल दूसरों से (सप्तम भाव) उम्मीदें लगाने लगता है, तो उसका पराक्रम शून्य हो जाता है। पराक्रम के बिना नवम भाव (भाग्य और विवेक) का उदय संभव नहीं है। यही कारण है कि अष्टम भाव को दुर्भाग्य का कारक माना गया है, क्योंकि यह व्यक्ति को कर्महीन बनाकर भाग्य के मार्ग को अवरुद्ध कर देता है।
व्यावहारिक समाधान - इस अवस्था से बाहर निकलने के लिए केवल शारीरिक सक्रियता पर्याप्त नहीं है, बल्कि चंद्रमा (मन) के स्तर पर उपचार आवश्यक है। 
यथा - आत्म-निर्भरता को पुनः प्राप्त करने के लिए व्यक्ति को अपनी चेतना को स्वयं पर केंद्रित करना होगा (सप्तम भाव की उम्मीदों को छोड़ना होगा)। मानसिक ठहराव के लिए ध्यान, जल का सही उपयोग और शिव आराधना, जो चंद्रमा के विष को सोखने की क्षमता रखती है।
आचार्य सोहन वेदपाठी, लुधियाना 

गुरुवार, 25 जून 2026

निर्जला एकादशी 2026 : महत्त्व, व्रत, विधि और पौराणिक कथा -

निर्जला एकादशी 2026 : महत्त्व, व्रत, विधि और पौराणिक कथा -

व्रतदिनांक: 25 जून 2026, गुरुवार

विशेष: वर्ष की सबसे कठिन और फलदायी एकादशी

परिचय : निर्जला एकादशी - एकादशियों का राजा

​सनातन धर्म में एकादशी व्रत का अत्यधिक महत्त्व है, लेकिन वर्ष की सभी चौबीस एकादशियों में 'निर्जला एकादशी' सबसे प्रमुख और श्रेष्ठ मानी जाती है। ज्येष्ठ मास के शुक्ल पक्ष की एकादशी को मनाया जाने वाला यह व्रत, जैसा कि नाम से स्पष्ट है, 'बिना जल' (निर्जल) रखा जाता है।

​"निर्जला" का शाब्दिक अर्थ ही है - जल के बिना। इस दिन श्रद्धालु भगवान विष्णु की असीम कृपा प्राप्त करने के लिए न केवल अन्न, बल्कि जल का भी पूर्ण त्याग करते हैं। उपवास के कठोर नियमों के कारण, इसे सभी एकादशी व्रतों में सबसे कठिन माना जाता है, लेकिन इसका फल भी उतना ही महान है।

अदभुत लाभ : क्यों करें निर्जला एकादशी का उपवास?

​शास्त्रीय मान्यता है कि जो श्रद्धालु शारीरिक अक्षमता या अन्य कारणों से वर्ष की सभी चौबीस एकादशियों का उपवास करने में समर्थ नहीं हैं, उन्हें केवल निर्जला एकादशी का व्रत पूर्ण श्रद्धा से करना चाहिए। मान्यता है कि इस एक एकादशी का निर्जल उपवास करने से दूसरी सभी एकादशियों का पुण्य लाभ स्वतः ही मिल जाता है।

​यह व्रत मनुष्य को विभिन्न पाप-दोषों से मुक्ति दिलाता है, भूलवश हुए पापों का प्रायश्चित करता है और मोक्ष प्रदान करता है।

पौराणिक कथा: क्यों कहते हैं इसे 'पाण्डव एकादशी' या 'भीमसेनी एकादशी'?

​इस पावन तिथि से जुड़ी एक प्रसिद्ध पौराणिक कथा है, जिसके कारण इसे 'पाण्डव एकादशी', 'भीमसेनी एकादशी' या 'भीम एकादशी' के नाम से भी जाना जाता है।

​कथा के अनुसार, पाण्डवों में दूसरे भाई, परम बलशाली भीमसेन, भोजन के अत्यधिक शौक़ीन थे और अपनी तीव्र क्षुधा (भूख) को नियन्त्रित करने में असमर्थ थे। इस कारण, जहाँ अन्य पाण्डव भाई (युधिष्ठिर, अर्जुन, नकुल, सहदेव) और माता कुंती तथा द्रौपदी वर्ष की सभी एकादशी व्रतों को पूरी निष्ठा से करते थे, भीमसेन ऐसा करने में लाचार थे।

​भीमसेन को अपनी इस कमजोरी पर बहुत दुख होता था। उन्हें लगता था कि वह एकादशी व्रत न करके भगवान विष्णु का अनादर कर रहे हैं। अपनी इस दुविधा और लाचारी के समाधान के लिए, भीमसेन महर्षि वेदव्यास के पास गए। महर्षि व्यास ने भीमसेन की व्यथा सुनी और उन्हें साल में केवल एक बार, ज्येष्ठ मास के शुक्ल पक्ष की निर्जला एकादशी व्रत को करने की सलाह दी।

​महर्षि व्यास ने भीमसेन को बताया कि निर्जला एकादशी का व्रत पूरे वर्ष की चौबीस एकादशियों के फल के तुल्य है। इस प्रकार, इस एक व्रत को करके भीमसेन भी एकादशी का पुण्य प्राप्त कर सकते थे। इसी पौराणिक कथा के बाद, भीमसेन ने अत्यंत कठिन होने के बावजूद यह व्रत किया और इस कारण यह 'भीमसेनी एकादशी' और 'पाण्डव एकादशी' के नाम से विख्यात हो गयी।

पारण का समय और विधि (26 जून 2026)

​एकादशी व्रत को विधिपूर्वक समाप्त करने की प्रक्रिया को 'पारण' कहते हैं। निर्जला एकादशी का पारण अगले दिन, 26 जून 2026 को प्रातःकाल सूर्योदय के बाद से अगले 2 घंटे 50 मिनट के भीतर कर लेना अत्यंत आवश्यक है।

  • विशेष नियम: निर्जला एकादशी का पारण 'काले तिल' से करने का विधान है।

व्रती को क्या करना चाहिए? - मुख्य नियम और दान

​निर्जला एकादशी के दिन श्रद्धालुओं को यथासंभव निम्नलिखित कार्य करने चाहिए और धार्मिक नियमों का पालन करना चाहिए:

  1. रात्रि जागरण और शयन: एकादशी के व्रत को करने वाले मनुष्य को रात्रि में भूमि पर बिछौना लगाकर शयन करना चाहिए, ऐसा करने से विशेष पुण्य की प्राप्ति होती है।
  2. श्री विष्णु और तुलसी पूजा: प्रातः स्नान करके भगवान विष्णु, माता लक्ष्मी और तुलसी जी का पूर्ण विधि-विधान से पूजन करें।
  3. निर्जल उपवास: स्वास्थ्य अनुकूल होने पर, मन में संकल्प लेकर जल का त्याग करें और निर्जल व्रत रखें।
  4. पाठ एवं श्रवण: 'विष्णु सहस्रनाम' का पाठ या श्रवण अत्यंत पुण्यदायक है। इसके अतिरिक्त, श्रीमद्भागवत में वर्णित 'गजेन्द्र मोक्ष' का पाठ या श्रवण विशेष फलदायी माना गया है, इससे भगवान की कृपा शीघ्र प्राप्त होती है।
  5. हरिनाम संकीर्तन: दिन भर “ॐ नमो भगवते वासुदेवाय” मंत्र, महामंत्र या विजय मंत्र का जप करें और भगवान के नामों का कीर्तन करें।
  6. पारण की विधि: अगले दिन प्रातः स्नान कर किसी विद्वान, सदाचारी और ईश्वर भक्त ब्राह्मण को जल से भरा कलश, वस्त्र, मिष्ठान्न आदि दक्षिणा सहित दान करने के बाद ही भोजन करें।

दान-पुण्य का विशेष महत्त्व

​ज्येष्ठ मास की भीषण गर्मी में पानी की प्यास बुझाने का विशेष महत्त्व है। निर्जला एकादशी के दिन अन्न, जल, वस्त्र, और शीतल वस्तुओं के दान से भगवान की विशेष कृपा प्राप्त होती है। इस दिन दान की गई वस्तुएं अगले दिन भी दान की जा सकती हैं और उनका पुण्य समान ही रहता है। यदि द्वार पर कोई जल या भोजन के लिए आए, तो उसे यथाशक्ति दान अवश्य करें।

विशेष दान सामग्रियां:

  • ​जल से भरा कलश (जल पात्र दान)
  • ​वस्त्र दान
  • ​पंखा (व्यजन) दान
  • ​छाता दान
  • ​शीतल पेय एवं जलदान
  • ​फल, अन्नदान और मिष्ठान्न
  • ​दूध, गौसेवा और ब्राह्मण सेवा
  • ​धन, बर्तन, आसन, तौलिया, कपड़ा, चारा, हरी घास और जूता दान।

शारीरिक अक्षमता में क्या करें? (वैकल्पिक विधि)

​शास्त्रों में भाव और श्रद्धा को सर्वोपरि माना गया है। हर व्यक्ति की शारीरिक क्षमता अलग होती है। वृद्ध, रोगी, गर्भवती महिलाएं या जिनकी स्वास्थ्य संबंधी विशेष परिस्थितियाँ हों, वे अपनी क्षमता के अनुसार व्रत कर सकते हैं।

​ऐसी स्थिति में आप:

  • ​भगवान विष्णु का स्मरण करें।
  • ​फलाहार या केवल जल ग्रहण करके व्रत (जलाहार व्रत) करें।
  • ​सात्त्विक भोजन का पालन करें।
  • ​विष्णु मंत्रों का जप और संकीर्तन करें।
  • ​दान-पुण्य अवश्य करें।
  • ​अपनी सामर्थ्य के अनुसार उपवास करें।

सौजन्य - आचार्य सोहन वेदपाठी, 9463405098

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शुक्रवार, 5 जून 2026

बाह्यजगत और अध्यात्म को देखने के लिये ही दो आँखें मिली है।

'इन आँखों की मस्ती के दीवाने हज़ारों हैं'- यह सिर्फ एक मशहूर फ़िल्मी गाना या शायरी की लाइन नहीं है, बल्कि अगर इसे गहराई से देखा जाए, तो यह इंसान की ज़िंदगी, उसकी चाहतों और उसकी दो अलग-अलग ताकतों के बीच के द्वंद्व को बयां करती है।
इस पंक्ति को यदि हम गोपथ ज्योतिष पद्धति से समझने की कोशिश करें, तो इसमें इंसानी चेतना और उसकी दो अलग-अलग तरह की 'आँखों' का एक बहुत ही सुंदर रहस्य छिपा हुआ मिलता है।

आइए इसे बेहद सरल शब्दों में समझते हैं। हमारी दो आँखें सिर्फ चेहरा पूरा नहीं करतीं, बल्कि ये दो अलग-अलग दिशाओं को दर्शाती हैं:
वृष अर्थात् द्वितीय भाव (बाहरी आँख) : यह वह आँख है जिससे हम इस खूबसूरत दुनिया को देखते हैं। रूप, रंग, पैसा, और सांसारिक आकर्षण यह सब इसी आँख के दायरे में आता है। इसका काम ही बाहर की चीज़ों की तरफ आकर्षित होना है।
मीन अर्थात् द्वादश भाव (भीतरी आँख) : यह वह आँख है जो बाहर नहीं, बल्कि हमारे अंदर की तरफ खुलती है। इसका संबंध शांति, सुकून और अध्यात्म से है। इस आँख के पीछे 'केतु' की ऊर्जा काम करती है, जिसका मकसद इंसान को बाहरी दिखावे से दूर करके सच से रूबरू कराना है।

मध्य का केंद्र : इन दोनों आँखों (वृष और मीन) के ठीक बीच में आकर खड़ा होता है - तुला, जिसे हम समाज, रिश्ते, वासना या दुनियादारी का केंद्र कह सकते हैं।
जब हमारी बाहरी आँख (वृष) काम करती है, तो वह हमें सीधे इस दुनियादारी (तुला) की तरफ खींच ले जाती है। गाने की लाइन 'इन आँखों की मस्ती के दीवाने हज़ारों हैं' का पहला और सीधा सा मतलब यही है। यहाँ आँख की चमक को देखकर दुनिया (हज़ारों दीवाने) आकर्षित हो रही है। यह वह रास्ता है जो इंसान को सांसारिक मोह-माया के चक्र में बांधकर रखता है।
केतु का रास्ता : लेकिन इस सिक्के का एक दूसरा और बेहद खूबसूरत पहलू भी है, जो हमारी भीतरी आँख (मीन) से जुड़ा है।
जब इंसान के अंदर की आँख खुलती है, तो दृश्य पूरी तरह बदल जाता है। जैसा कि हमने जाना, मीन का संबंध केतु से है, और केतु का झुकाव इस बाहरी दुनिया या महफ़िल की तरफ नहीं होता। केतु अपनी पूरी ताकत के साथ अपनी उच्च राशि यानी सिंह (पंचम भाव) की तरफ बढ़ता है। सिंह का सीधा सा मतलब है - हमारी आत्मा, हमारा आत्मसम्मान, और वह परम प्रकाश जिससे हम सब बने हैं।
जब इस भीतरी आँख में 'मस्ती' या दिव्य आनंद आता है, तो इंसान दुनिया के मोह-जाल में नहीं गिरता। बल्कि, केतु उसके सारे सांसारिक बंधनों को ख़त्म करके उसे सीधे उसकी आत्मा के सर्वोच्च शिखर (सिंह) पर बिठा देता है।

देखा जाए तो इस एक पंक्ति में इंसानी जीवन की दो अलग-अलग यात्राएं छिपी हुई हैं :-
 1. सांसारिक यात्रा : आँखों की मस्ती जब बाहर की तरफ देखती है, तो दुनियादारी और मोह-माया (हज़ारों दीवाने) पैदा करती है।
 2. आध्यात्मिक यात्रा : यही मस्ती जब अंदर की आँख (केतु) में उतरती है, तो सारे बंधनों को तोड़कर इंसान को खुद की आत्मा के असली और ऊंचे स्वरूप से मिला देती है।
गीतकार ने जिसे महफ़िल का रंग कहा था, वह असल में इंसान की चेतना के दो अलग-अलग रास्तों की बेहद खूबसूरत दास्तान है।