बुधवार, 14 अक्टूबर 2026

मुहूर्त चिन्तामणि के आलोक में अन्धा शुक्र' और सम्मुख शुक्र का तार्किक विश्लेषण ​लेखक: आचार्य सोहन वेदपाठी

मुहूर्त शास्त्र में यात्रा, वधू-प्रवेश (गौना) और नूतन विवाहिता या गर्भवती स्त्री के गमन के समय 'सम्मुख शुक्र' और 'दक्षिण शुक्र' का विचार अत्यंत महत्त्वपूर्ण माना गया है। ज्योतिषीय नियमानुसार जिस दिशा में शुक्र सम्मुख (सामने) या दक्षिण (दाहिने) हो, उस दिशा में यात्रा करने से विपत्ति, संतान कष्ट या गर्भपात का भय रहता है।
 सम्मुख शुक्र के कुछ विशेष परिहार (अपवाद) शास्त्रों में वर्णित हैं, जिनमें सबसे प्रमुख अवस्था है— 'अन्ध शुक्र'। जब शुक्र अन्धा होता है, तब सम्मुख या दक्षिण होने का दोष समाप्त हो जाता है। इस लेख में हम अन्ध शुक्र के परम्परागत (स्थूल) और मुहूर्त चिन्तामणि के (सूक्ष्म) मतों का खगोलीय एवं गणितीय विश्लेषण करेंगे।

​लोक-व्यवहार और सामान्य मुहूर्त संकलनों में अन्ध शुक्र का एक श्लोक अत्यधिक प्रचलित है:

​"रेवत्यादिमृगान्ते च यावत्तिष्ठति चन्द्रमाः। तावच्छुक्रो भवेदन्धः सम्मुखे दक्षिणे शुभः॥"

​इस स्थूल मत के अनुसार, जब चन्द्रमा रेवती से लेकर मृगशिरा तक (कुल 6 नक्षत्रों में) गोचर करता है, तब शुक्र 'अन्ध' माना जाता है। लेकिन यदि इसे सूक्ष्म दृष्टि से देखा जाए, तो यह नियम खगोलीय सिद्धांतों का पूर्णतः समर्थन नहीं करता।

​ज्योतिष के प्रकांड विद्वान आचार्य राम दैवज्ञ ने मुहूर्त चिन्तामणि में इस स्थूल नियम का परिष्कार करते हुए एक अत्यंत सटीक और अकाट्य सूत्र दिया:

​"यावच्चन्द्रः पूषभात्कृत्तिकाद्ये पादे शुक्रोऽन्धो न दुष्टोऽग्रदक्षे।"

​अर्थात्, पूषा (रेवती का देवता) नक्षत्र से लेकर कृत्तिका नक्षत्र के प्रथम चरण तक ही शुक्र अन्धा होता है और इस अवधि में सम्मुख या दक्षिण होने पर दोषपूर्ण नहीं होता।

आचार्य सोहन वेदपाठी, लुधियाना के विचारों पर आधारित - 

​स्वराशि बल और गंडांत का वैज्ञानिक तर्क - ​आचार्य राम दैवज्ञ का मत ज्योतिष के मूल सिद्धांतों के सर्वथा अनुकूल है। इसके दो प्रमुख तार्किक आधार हैं:

  1. ​स्वराशि में अन्धत्व असंभव: कृत्तिका का द्वितीय चरण वृषभ राशि में आता है। वृषभ शुक्र की अपनी राशि (स्वराशि) है। कोई भी ग्रह अपनी स्वराशि में सुप्त, हीन या 'अन्धा' नहीं हो सकता; वहाँ उसे पूर्ण 'स्थान बल' प्राप्त होता है। इसलिए मृगशिरा तक शुक्र को अन्धा मानना ग्रहों के षड्बल सिद्धांत का उल्लंघन है। अन्धा शुक्र का प्रभाव केवल मेष राशि (कृत्तिका के प्रथम चरण) की समाप्ति तक ही रहता है।
  2. ​रेवती का गंडांत और नीचत्त्व प्रभाव: रेवती मीन राशि का अंतिम भाग (भ-संधि/गंडांत) है, जहाँ जल तत्त्व समाप्त होकर अग्नि तत्त्व (मेष) आरंभ होता है। यह ऊर्जा के संक्रमण का संवेदनशील बिंदु है। इसके अतिरिक्त, मीन राशि में बुध नीच का होता है और रेवती बुध का ही नक्षत्र है। नक्षत्र स्वामी के नीचत्त्व और गंडांत के कारण ही यहाँ शुक्र के प्रभाव में 'दृष्टिहीनता' उत्पन्न होती है, जो मेष राशि के अंत तक बनी रहती है।

​सम्मुख शुक्र के विचार में दिशा और उदय का गणित - 

​शुक्र के उदय की दिशा के आधार पर शुभ-अशुभ यात्रा का निर्धारण इस प्रकार किया जाता है:

  • ​पूर्व में उदय: यदि शुक्र का उदय पूर्व दिशा में हो, तो पश्चिम एवं दक्षिण दिशाओं तथा नैऋत्य और आग्नेय विदिशाओं में यात्रा करना शुभ होता है।
  • ​पश्चिम में उदय: यदि शुक्र पश्चिम में उदित हो, तो पूर्व एवं उत्तर दिशाओं तथा ईशान और वायव्य विदिशाओं की यात्रा शुभ रहती है।

​सम्मुख शुक्र के विशेष परिहार एवं गोत्र अपवाद

​शास्त्रों ने दैनिक जीवन की व्यावहारिकता को समझते हुए सम्मुख शुक्र के दोष से कुछ विशेष छूट प्रदान की हैं। यदि निम्नलिखित परिस्थितियाँ हों, तो सम्मुख शुक्र का विचार नहीं किया जाता है -

  • ​गोत्र आधारित छूट: भृगु, अंगिरा, वत्स, वशिष्ठ और भारद्वाज गोत्र वाले जातकों को सम्मुख शुक्र का दोष नहीं लगता।
  • ​आपातकालीन व विशेष मुहूर्त: गुरु अथवा शुक्र अस्त हों, गुरु सिंह राशि में (सिंहस्थ) हो, कन्या का रजोदर्शन पिता के घर में होने लगे और कोई शुभ मुहूर्त न मिल रहा हो, तो दीपावली के दिन कन्या पति के घर जा सकती है।
  • ​ग्रह बल: यदि गोचर में गुरु उपचय (3, 6, 10, 11) स्थानों में हो, शुक्र केंद्र में हो, तथा लग्न शुभ ग्रहों से युक्त हो, तो स्त्री अपने पति के घर की यात्रा कर सकती है।
  • ​स्थान व प्रयोजन: एक ही ग्राम या नगर के भीतर, राज्य परिवर्तन के समय, विवाह तथा तीर्थयात्रा के दौरान सम्मुख शुक्र का दोष प्रभावी नहीं होता।

​निष्कर्ष: मुहूर्त शास्त्र का अंधानुकरण करने के बजाय, उसकी गणितीय और खगोलीय पृष्ठभूमि को समझना आवश्यक है। समय का अभाव होने पर भी आपातकालीन अपवादों का लाभ उठाते हुए, हमेशा सम्मुख शुक्र का शास्त्र-सम्मत विचार करके ही मांगलिक यात्राएं करनी चाहिए।

मंगलवार, 13 अक्टूबर 2026

शिववास का विचार कैसे करें?

 शिववास के विना कोई भी शिव अनुष्ठान नहीं करना चाहिये।

शिव वास देखने का सूत्र- 

शुक्लपक्ष की प्रतिपदा से अमावस्या तक तिथियों की कुल संख्या 30 होती है । इस तरह से कोई भी मुहूर्त देखने के लिए 1 से 30 तक की संख्या को ही लेना चाहिए ।।

तिथीं च द्विगुणी कृत्वा बाणै: संयोजयेत्तथा ।।

सप्तभिस्तु हरेद्भागं शेषाङ्के फलमादिशेत् ।।

शिववास फल:-

एकेन वासः कैलाशे द्वितीये गौरिसन्निधौ।

तृतीये वृषभारूढं सभायाञ्च चतुर्थके।।

पञ्चमे भोजने चैव क्रीडायाञ्च रसात्मके।

श्मशाने सप्तमे चैव शिववास: प्रकीर्त्तित:।।

कैलाशे च लभते सौख्यं गौर्याञ्च सुखसम्पदौ।

वृषभेsभीष्ट सिद्धि: स्यात् सभायां तापकारकौ।।

भोजने च भवेत्पीडा क्रीडायां कष्टमेव च।

श्मशाने च मरणं ज्ञेयं फलमेवं विचारयेत्।।

शिववासमविज्ञाय प्रवृत्त: शिवकर्मणि।

न तत्फलमवाप्नोति अनुष्ठानशतैरपि।।

AcharyaG.com की प्रस्तुति

शिववास का विचार 

तिथि को दुगुना करके उसमे पांच और जोड़ देना चाहिए। कुल योग में, 7 का भाग देने पर, 1.2.3. शेष बचे तो इच्छा पूर्ति होता है,

शिववास अच्छा बनता है । बाकि बचे तो हानिकारक होता है, शुभ नहीं है ।।

इसे शेष के अनुसार इस प्रकार समझना चाहिये-

१.कैलाश अर्थात = सुख,

२. गौरिसंग = सुख एवं संपत्ति, 

३.वृषभारूढ = अभीष्टसिध्दि,

४.सभा = सन्ताप,

५.भोजन = पीड़ा, 

६.क्रीड़ा = कष्ट, 

७.श्मशाने = मरण ।।

यह ध्यान रहे कि शिव-वास का विचार सकाम अनुष्ठान में ही जरूरी है।

निष्काम भाव से की जाने वाली अर्चना कभी भी हो सकती है..

ज्योतिर्लिंग-क्षेत्र, तीर्थस्थान, शिवरात्रि, प्रदोष एवं सावन के सोमवार आदि पर्वो में शिव-वास का विचार किये बिना भी रुद्राभिषेक किया जा सकता है।

शनिवार, 19 सितंबर 2026

नवग्रह एवं वस्तु

ज्योतिष शास्त्र में ब्रह्मांड के प्रत्येक तत्व, पदार्थ और ऊर्जा को नवग्रहों के अधीन माना गया है। भोजन, धातु और हमारे आसपास की रोजमर्रा की वस्तुओं के माध्यम से विशिष्ट ग्रहों की ऊर्जा को संतुलित, सक्रिय या शांत किया जा सकता है।

यहाँ नवग्रहों के अधिकार क्षेत्र में आने वाले खाद्य पदार्थों और रोजमर्रा की वस्तुओं की विस्तृत सूची दी गई है:

आचार्य सोहन वेदपाठी, लुधियाना सम्पर्क WA - 9463405098

नवग्रहों के कारक तत्व (वस्तु एवं खाद्य पदार्थ)

ग्रहअनाज एवं मुख्य आहारफल, सब्जियां व मसालेरोजमर्रा की वस्तुएंधातु एवं अन्य पदार्थ
सूर्यगेहूं, दलियातीखे मिर्च-मसाले, केसर, तेजपत्तालकड़ी का फर्नीचर, दवाइयां, सरकारी या कानूनी दस्तावेज, रौशनी के स्रोततांबा, माणिक्य, लाल रेशमी वस्त्र, रक्त चंदन
चंद्रचावल, दूध, पनीर, मखाना, बर्फरसीले फल, पानी वाले फल (तरबूज आदि), नमककांच के बर्तन, पानी की बोतल, दर्पण, शंख, सीपचांदी, मोती, सफेद सूती वस्त्र, कपूर
मंगललाल मसूर, गुड़लाल मिर्च, चुकंदरधारदार औजार (चाकू, कैंची), रसोई की आग, माचिस, खेल-कूद का सामानतांबा, मूंगा, ईंट, लाल पत्थर
बुधहरी मूंगहरी सब्जियां, धनिया, सौंफ, आंवलास्टेशनरी (पेन, डायरी, किताबें), अखबार, संचार उपकरण, केबल्सकांसा, पन्ना, हरे वस्त्र, फिटकरी
गुरुचने की दाल, बेसन, घीहल्दी, केला, पपीता, पीली मिठाइयांधार्मिक एवं शोध पुस्तकें, तिजोरी, पूजा-पाठ की सामग्री, चंदनसोना, पुखराज, पीले वस्त्र
शुक्रसफेद रसगुल्ला, मिश्री, साबूदानादही, सुगंधित मसाले (इलायची), चीनीसौंदर्य प्रसाधन (Cosmetics), परफ्यूम, रेशमी और डिजाइनर कपड़े, वाहन, सजावटी सामानहीरा, ओपल, स्फटिक, प्लेटिनम
शनिसाबुत उड़द, काले तिलसरसों, लौंग, काली मिर्च, अचार, सिरकालोहे की मशीनरी, चमड़े के जूते, बेल्ट, बैग, पुरानी वस्तुएं, झाड़ू, कूड़ेदानलोहा, नीलम, कोयला, पेट्रोलियम पदार्थ
राहुजौ, बाजरा, जंक फूडप्याज, लहसुनइलेक्ट्रॉनिक गैजेट्स, बंद पड़ी घड़ियां, सिंथेटिक कपड़े, केमिकल्स, दवाइयों के खाली रैपरसीसा (Lead), गोमेद, प्लास्टिक
केतुकुल्थी की दाल, बहुधान्य (मिश्रित अनाज)इमली, अत्यधिक खट्टे-तीखे पदार्थकंबल, रस्सियां, झंडे, सुई, सीढ़ियां (Stairs), पालतू जानवर (विशेषकर कुत्ते) का सामानलहसुनिया (Cat's Eye), मिश्रित धातु

विश्लेषणात्मक दृष्टि: किसी ग्रह की दशा या अंतर्दशा के दौरान उस ग्रह से संबंधित वस्तुओं का सेवन या उपयोग स्वतः ही बढ़ जाता है। इसी प्रकार, यदि किसी ग्रह को बलवान करना हो, तो उस ग्रह की वस्तुओं का सेवन और उपयोग बढ़ाया जाता है, जबकि ग्रह के दुष्प्रभावों को कम करने के लिए उनसे संबंधित वस्तुओं का दान किया जाता है या उनसे दूरी बनाई जाती है।

सोमवार, 14 सितंबर 2026

विष्कुंभादि 24 (नक्षत्र योग) और आनन्दादि 28 योग में क्या फर्क है ?

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ज्योतिष शास्त्र में विष्कुंभादि (नक्षत्र योग) और आनन्दादि योग दोनों का विशेष महत्व है, लेकिन इन दोनों की गणना पद्धति, उद्देश्य और उनके फल (कार्य) पूरी तरह भिन्न हैं।

इन दोनों योगों के नाम और उनके कार्यों/फल में मुख्य अंतर इस प्रकार है:

1. विष्कुंभादि योग (नक्षत्र योग / नित्य योग)

यह सूर्य और चंद्रमा की गतियों के आधार पर बनने वाले 27 नित्य योग हैं। इनका आरंभ नक्षत्रों और राशियों के कुल भोग्यांश के आधार पर होता है। जन्म के समय जो योग होता है, उसे 'जातका का जन्म योग' कहा जाता है और इसका प्रभाव जातक के स्वभाव, स्वास्थ्य और जीवन पर आजीवन रहता है।

27 विष्कुंभादि योगों के नाम:

  1. विष्कुम्भ
  2. प्रीति
  3. आयुष्मान
  4. सौभाग्य
  5. शोभन
  6. अतिगंड
  7. सुकर्म
  8. धृति
  9. शूल
  10. गण्ड
  11. वृद्धि
  12. ध्रुव
  13. व्याघात
  14. हर्षण
  15. वज्र
  16. सिद्धि
  17. व्यतिपात
  18. वरीयान
  19. परिध
  20. शिव
  21. सिद्ध
  22. साध्य
  23. शुभ
  24. शुक्ल
  25. ब्रह्म
  26. ऐन्द्र
  27. वैधृति

इन योगों का कार्य एवं फल:

  • शुभ और अशुभ प्रभाव: इन 27 योगों में से कुछ योग अत्यंत शुभ और कल्याणकारी होते हैं (जैसे- प्रीति, आयुष्मान, सौभाग्य, शोभन, सुकर्म, धृति, वृद्धि, ध्रुव, हर्षण, सिद्धि, वरीयान, शिव, सिद्ध, साध्य, शुभ, शुक्ल, ब्रह्म, ऐन्द्र), जबकि कुछ योग अशुभ या कष्टकारक माने जाते हैं (जैसे- विष्कुम्भ, अतिगंड, शूल, गण्ड, व्याघात, वज्र, व्यतिपात, परिध, वैधृति)।
  • कार्यों में उपयोग: अशुभ योगों (विशेषकर विष्कुम्भ, शूल, गण्ड, व्यतिपात और वैधृति) में सामान्यतः नए कार्य, यात्रा या मांगलिक अनुष्ठान वर्जित माने जाते हैं, जबकि शुभ योगों में किए गए कार्य में सफलता और स्थिरता मिलती है।

2. आनन्दादि योग

यह योग वार (दिन) और नक्षत्र के मेल से बनने वाले विशेष योग हैं। इनकी कुल संख्या 28 है। इनका मुख्य उपयोग किसी विशिष्ट वार और नक्षत्र के संयोग से यह जानने के लिए किया जाता है कि वह समय किस कार्य के लिए शुभ है और किस कार्य के लिए अशुभ।

28 आनन्दादि योगों के नाम:

आनन्दादि योगों के नाम निम्नलिखित हैं:

  1. आनन्द
  2. कालदग्ध
  3. ध्वांक्ष
  4. ध्वात
  5. सौम्य
  6. ध्वंस
  7. श्रीवत्स
  8. वज्र
  9. मुद्गर
  10. छत्र
  11. मित्र
  12. मानस
  13. पद्म
  14. लुम्बक
  15. उत्पात
  16. मृत्यु
  17. राक्षस
  18. चर
  19. स्थिर
  20. वर्द्धमान
  21. संयोजन
  22. पाश
  23. केतु
  24. श्री
  25. मुसल
  26. गद
  27. मातंग
  28. राक्षस (अथवा अन्य पारंपरिक गणना के अनुसार चक्रभेद)

(नोट: पंचांगों में वार और नक्षत्र के योग से बनने वाले इन 28 नामों की तालिका अलग से दी होती है, जिनमें आनन्द, छत्र, मित्र, पद्म, श्रीवत्स आदि को श्रेष्ठ तथा कालदग्ध, मृत्यु, उत्पात, वज्र आदि को कष्टप्रद माना गया है।)

इन योगों का कार्य एवं फल:

  • विशिष्ट फलकथन: ये योग मुख्य रूप से शुभ-अशुभ फल के शुभाशुभत्व की सूक्ष्म जांच के लिए देखे जाते हैं।
  • मुहूर्त निर्धारण में उपयोग: गृह प्रवेश, यात्रा, व्यापार आरंभ, और विशेष प्रयोजनों के लिए वार-नक्षत्र के मिलान से यह देखा जाता है कि संबंधित योग जातक को आरोग्यता, धन लाभ, विजय दिलाएगा या हानि, मृत्युतुल्य कष्ट या बाधा उत्पन्न करेगा। उदाहरण के लिए—'आनन्द' और 'छत्र' योग में किए गए कार्य दीर्घकालिक लाभ और सुख देते हैं, जबकि 'मृत्यु', 'उत्पात' या 'कालदग्ध' योग में जोखिम भरे कार्य वर्जित होते हैं।

मुख्य अंतर संक्षेप में

विशेषताविष्कुंभादि योग (नक्षत्र योग)आनन्दादि योग
आधारसूर्य और चंद्रमा की स्थिति (भोग्यांश)वार (दिन) और नक्षत्र का संयोग
कुल संख्या2728
मुख्य उपयोगजातक के जन्मकालीन स्वभाव, नक्षत्र दोष निवारण और नित्य पंचांगीय शुभाशुभता हेतु।विशेष मुहूर्तों में कार्य सिद्धि, यात्रा, और वार-नक्षत्र जनित विशिष्ट फलों (हानि-लाभ) की गणना हेतु।

अश्विनी नक्षत्र की कथा द्वारा गोपथ ज्योतिष पद्धति

गोपथ ज्योतिष पद्धति के प्रणेता - आचार्य सोहन वेदपाठी , सम्पर्क सूत्र - WA 9463405098
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प्रथम नक्षत्र कथा: अश्विनी – "वेग और संजीवनी का रहस्य"
प्राचीन काल में पूर्व दिशा के एक समृद्ध राज्य में एक अत्यंत ऊर्जावान और चंचल बालक का जन्म हुआ। वह बालक एक क्षण भी शांत नहीं बैठता था; उसके भीतर जैसे किसी अदृश्य अश्व (घोड़े) की गति और चपलता समाई थी। उसकी बुद्धि अत्यंत कुशाग्र थी, लेकिन उसकी असीमित ऊर्जा को एक सही दिशा की आवश्यकता थी।
एक बार, राज्य में एक भयंकर ज्वर (बुखार) की महामारी फैली। दुर्भाग्यवश, वह बालक भी इस महामारी की चपेट में आ गया। लगातार ९ दिनों तक उसे तीव्र कष्ट रहा और राज्य के सभी वैद्य हार मान चुके थे।
तब, मोक्ष और रहस्य के कारक केतु (अश्विनी के स्वामी ग्रह) की कृपा से, श्वेत वस्त्र धारण किए हुए दो दिव्य वैद्य वहाँ प्रकट हुए। ये देवताओं के चिकित्सक अश्विनी कुमार थे। उनके हाथों में अमृत कलश था और वे घोड़ों के रथ पर सवार थे।
उन्होंने बालक की नाड़ी जांची और कहा, "इस बालक की नाड़ी 'आदि' (वात प्रकृति) है। इसकी बीमारी का कारण इसकी ऊर्जा का असंतुलन है, क्योंकि इसका जन्म गंडमूल के संधिकाल में हुआ है।"
अश्विनी कुमारों ने बालक को 'कुचला' (विषमुष्टि) नामक जड़ी-बूटी का अर्क पिलाया और उसे एक पौधा सौंपते हुए कहा, "हे बालक! तुम्हारी बीमारी (विष नाड़ी का दोष) शांत हो गई है। अब से तुम्हें गुरुवार (क्षिप्र संज्ञक दिन) के दिन इस कुचला वृक्ष की सेवा करनी होगी। यही तुम्हारी चंचलता को एकाग्रता में बदलेगा।"
स्वस्थ होने पर, बालक ने उन दिव्य कुमारों से ही चिकित्सा का गूढ़ ज्ञान प्राप्त किया। उसकी गति इतनी क्षिप्र (तेज) थी कि वह पलक झपकते ही दूर-दराज के रोगियों तक पहुँचकर उनकी जान बचा लेता।
बड़ा होकर वह बालक केवल एक साधारण व्यक्ति नहीं रहा। अपने अश्व-रूपी वेग के कारण वह राज्य का सबसे तेज धावक (खिलाड़ी) और वीर सेनापति बना। साथ ही, अपनी विद्या से वह एक महान चिकित्सक के रूप में विख्यात हुआ। जब भी वह सुंदर आभूषण धारण करके अपने घोड़े पर सवार होकर निकलता, तो राजा से लेकर प्रजा तक सभी उसका सम्मान करते। उसने अपने जीवन के ८६ वर्ष लोक-कल्याण और गतिशीलता में व्यतीत किए।
कथा का ज्योतिषीय सार (विद्यार्थियों के लिए ):
प्रतीक व आकाशीय पहचान: घोड़े का सिर (आकाश में ३ तारों का समूह)। यह चपलता और वेग का प्रतीक है।
ग्रह, देवता व तत्व: स्वामी केतु (मार्गदर्शक), देवता अश्विनी कुमार (दिव्य वैद्य) और पृथ्वी तत्व।
स्वभाव व वर्ण: क्षिप्र/लघु संज्ञक, वैश्य वर्ण, आभूषण प्रेमी, राजपूज्य और कुशाग्र बुद्धि।
कॅरियर (आजीविका): चिकित्सक (Doctor), खिलाड़ी (Athlete), सेनापति/पुलिस, और वाहन/अश्व से जुड़े कार्य।
अरिष्ट (दोष) व उपाय: गंडमूल दोष, ५० घटी बाद विष नाड़ी (९ दिन का ज्वर/कष्ट)। उपाय: कुचला (विषमुष्टि) का वृक्ष लगाना और श्वेत वस्त्र धारण करके अश्विनी कुमारों की पूजा करना।
दिशा, गण, योनि व नाड़ी: पूर्व दिशा, देव गण, अश्व योनि, आदि नाड़ी (वात)।
चोरी/नष्ट प्रश्न (सुलोचनादि संज्ञा): अंधाक्ष (अंधा) – चोरी गई या खोई वस्तु पूर्व दिशा में है, घर के भीतर या आस-पास ही है और शीघ्र मिल जाएगी।