मंगलवार, 21 अप्रैल 2026

ज्योतिष में कान एवं श्रवण शक्ति का विचार कैसे करें ?

ज्योतिष शास्त्र में मानव शरीर के अंगों का विचार केवल स्थूल रूप में नहीं, बल्कि उनकी कार्यक्षमता और चेतना के आधार पर किया जाता है। अक्सर विद्यार्थी इस बात को लेकर उलझन में रहते हैं कि ऋषियों ने एक ही अंग (जैसे कान) के लिए द्वितीय, तृतीय, एकादश और द्वादश—इन चार भावों का उल्लेख क्यों किया है?

आज के इस लेख में हम 'गोपथ ज्योतिष पद्धति' के शोध आधारित दृष्टिकोण से इस रहस्य को समझेंगे।
 अंगों का पक्ष भेद: दाहिना और बायाँ (Right vs Left)
वैदिक ज्योतिष के अनुसार, लग्न को केंद्र मानकर शरीर को दो भागों में विभाजित किया गया है। कुंडली का दाहिना पक्ष (Right Side) लग्न से नीचे की ओर और बायाँ पक्ष (Left Side) लग्न के ऊपर की ओर होता है।
यही वह सूक्ष्म बिंदु है जो एक सामान्य विश्लेषण और गोपथ ज्योतिष पद्धति के विश्लेषण को अलग करता है। इसे हम 'स्थान' और 'शक्ति' के रूप में देख सकते हैं:
बाह्य संरचना (Physical Structure): द्वितीय एवं द्वादश भाव। ये भाव कान की बाहरी बनावट (Pinna) के स्वामी हैं। यदि किसी जातक का कान बाहर से छोटा-बड़ा है, कान के पास कोई निशान या चोट है, तो हम इन भावों का परीक्षण करते हैं। यह केवल 'देह' है, यानी वह ढांचा जो हमें दिखाई देता है।
श्रवण शक्ति (Hearing Power): तृतीय एवं एकादश भाव । ये भाव कान की वास्तविक कार्यशक्ति के स्वामी हैं। कान के भीतर का पर्दा, सुनने की सूक्ष्म नसें और ध्वनि को ग्रहण करने की क्षमता इन्हीं भावों के अधीन है। इसे हम 'प्राण' कह सकते हैं। यदि ये भाव पीड़ित हैं, तो कान बाहर से सुंदर दिखने के बावजूद सुनने में अक्षम हो सकता है।
 बुध का महत्व: बुध नसों और संचार का कारक है। यदि श्रवण भाव (3/11) और बुध दोनों पीड़ित हों, तो बहरेपन का योग प्रबल हो जाता है।
 नैदानिक सूत्र (Diagnostic Formulas)
विद्यार्थियों के अभ्यास के लिए यहाँ कुछ सरल सूत्र दिए जा रहे हैं:
सूत्र 1: यदि 2/12 भाव पीड़ित हों लेकिन 3/11 शुभ हों, तो कान की बनावट में दोष होगा, पर सुनने की शक्ति सामान्य रहेगी।
सूत्र 2: यदि 3/11 भाव के स्वामी निर्बल या शत्रु राशि में हों, तो जातक को ऊँचा सुनाई देने (Hard of hearing) की समस्या हो सकती है।
 
निष्कर्षतः ज्योतिष में किसी भी अंग का विचार करते समय हमें 'स्थान' (2nd/12th) और 'शक्ति' (3rd/11th) के बीच की विभाजक रेखा को समझना अनिवार्य है। गोपथ ज्योतिष पद्धति इसी सूक्ष्मता को रेखांकित करती है ताकि भविष्यवाणियों में त्रुटि की कोई संभावना न रहे।

💬 आपकी क्या राय है?
क्या आपने अपनी शोध यात्रा में ऐसा कोई चार्ट देखा है जहाँ कान की बनावट और सुनने की शक्ति में विरोधाभास हो? अपने अनुभव नीचे कमेंट बॉक्स में साझा करें।


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 कुंडली में कान के लिए 2, 3, 11 और 12 भाव क्यों देखे जाते हैं? गोपथ ज्योतिष पद्धति के अनुसार श्रवण शक्ति और कान की बनावट के बीच के सूक्ष्म भेद को समझें।
  
लेखक: आचार्य सोहन वेदपाठी
प्रवर्तक: गोपथ ज्योतिष पद्धति
लुधियाना, पंजाब 
सम्पर्क सूत्र - 9463405098

सोमवार, 20 अप्रैल 2026

2026 का परिसीमन: भारतीय राजनीति का वो 'टाइम बम' जिसकी टिक-टिक शुरू हो चुकी है।

2026 का परिसीमन: भारतीय राजनीति का वो 'टाइम बम' जिसकी टिक-टिक शुरू हो चुकी है।
भारतीय लोकतंत्र के इतिहास में कुछ तारीखें ऐसी हैं जो केवल सत्ता परिवर्तन नहीं, बल्कि सत्ता की पूरी धुरी ही बदल देती हैं। वर्ष 2026 एक ऐसी ही दहलीज है। राजनैतिक गलियारों में इसे 'टाइम बम' कहा जा रहा है, जिसकी सुई संविधान के अनुच्छेद 81 और परिसीमन (Delimitation) की उस प्रक्रिया पर टिकी है जो पिछले कई दशकों से 'फ्रीज' थी।
 1. संवैधानिक पाबंदी का इतिहास: क्यों रुकी थी सुई?
लोकतंत्र का सामान्य सिद्धांत है—'एक व्यक्ति, एक वोट'। इसी आधार पर हर 10 साल की जनगणना के बाद सीटों का पुनर्गठन होना चाहिए। लेकिन 1970 के दशक में एक बड़ा संकट खड़ा हुआ:
 जनसंख्या का गणित: उत्तर भारतीय राज्यों में जनसंख्या तेजी से बढ़ रही थी, जबकि दक्षिण भारतीय राज्यों ने परिवार नियोजन को सफलतापूर्वक अपनाया।
 राजनैतिक दंड: यदि जनसंख्या के आधार पर सीटें बढ़तीं, तो दक्षिण के राज्यों का प्रतिनिधित्व कम हो जाता।
 इमरजेंसी का फैसला: 1976 में 42वें संशोधन  द्वारा सीटों की संख्या को 1971 की जनगणना के आधार पर साल 2000 तक के लिए रोक दिया गया। बाद में, अटल बिहारी वाजपेयी सरकार ने 84वें संशोधन के जरिए इस अवधि को 2026 तक बढ़ा दिया।
 2. 2026 के बाद क्या बदलेगा?
जैसे ही 2026 का कैलेंडर पलटेगा, सीटों की संख्या पर लगी यह संवैधानिक पाबंदी हट जाएगी। इसके बाद भारत का राजनैतिक मानचित्र कुछ इस प्रकार बदलेगा:
 लोकसभा का विस्तार:  वर्तमान में लोकसभा की 543 सीटें हैं। विशेषज्ञों का अनुमान है कि परिसीमन के बाद यह संख्या 800 से 850 तक पहुँच सकती है। नया संसद भवन इसी भविष्य की तैयारी का जीवंत उदाहरण है।
 उत्तर बनाम दक्षिण: परिसीमन के बाद उत्तर प्रदेश, बिहार, राजस्थान और मध्य प्रदेश जैसे राज्यों में सीटों का 'सैलाब' आएगा, जबकि दक्षिण भारतीय राज्यों का सापेक्षिक प्रभाव कम हो सकता है।
 3. शकुनि की बिसात और धृतराष्ट्र का मोह
राजनैतिक विश्लेषकों का मानना है कि विपक्ष इस पूरे घटनाक्रम में 'दृष्टिहीनता' का शिकार रहा है। सरकार ने जब 'सीट वृद्धि' के प्रस्ताव दिए, तो वह एक संधि का हाथ था। लेकिन श्रेय न देने की जिद और 'राहुल-मोह' की जंजीरों में बंधे पुराने नेताओं ने दूरगामी अनर्थ को अनदेखा कर दिया।
 "बिनय न मानत जलधि जड़, गए तीनि दिन बीति।
बोले राम सकोप तब, भय बिनु होइ न पीति॥"

विपक्ष ने जब प्रस्ताव (विनय) को अहंकार वश ठुकराया, तो अब 2026 में 'संवैधानिक कोप' यानी अनुच्छेद 81 का सीधा प्रभाव तय है।
 4. क्षेत्रीय क्षत्रपों का भविष्य: सूखे में खड़ी रियासतें?
2026 के बाद जब जनसंख्या के आधार पर सीटें आवंटित होंगी, तब क्षेत्रीय दलों के सामने अपनी प्रासंगिकता बचाने की चुनौती होगी। उत्तर भारत की सीटों में होने वाली भारी वृद्धि राष्ट्रीय दलों को मजबूती देगी, जबकि दक्षिण और पूर्व के क्षेत्रीय क्षत्रपों के पास सौदेबाजी की शक्ति (Bargaining Power) कम हो जाएगी।

आचार्य सोहन वेदपाठी www.AcharyaG.com
 निष्कर्ष: भविष्य की आहट
मुंशी प्रेमचंद के शब्दों में कहें तो, कभी-कभी उत्साह में लिया गया निर्णय भविष्य के लिए अंधकारमय हो जाता है। 2026 का जिन्न जब बाहर आएगा, तब कोई 'कानूनी स्टे' काम नहीं आएगा। उत्तर भारत में 'सीटों की बरसात' होगी और विपक्ष के पास शायद ही कोई 'बैकअप प्लान' बचेगा।
आज सदन में जो तालियां बज रही हैं, वे शायद किसी कॉमेडी शो के अंत की तालियां हैं, क्योंकि अमित शाह ने शतरंज की जो बिसात बिछाई है, उसमें विपक्ष ने अपने 'राजा' को बचाने के चक्कर में पूरी 'सेना' ही कुर्बान कर दी है।
"हित अनहित नहिं जानहीं, बालक सम सब कोय।अहंकार बस मति फिरी, अब जो होइ सो होय॥"

गुरुवार, 16 अप्रैल 2026

विवाह में कन्या निरीक्षण एवं स्वर्ण आभूषण देने की परंपरा

गोपथ ज्योतिष पद्धति: कन्या निरीक्षण में ज्येष्ठ द्वारा स्वर्ण आभूषण देने की परंपरा का वैज्ञानिक एवं ज्योतिषीय रहस्य
भारतीय सनातन संस्कृति में विवाह केवल दो व्यक्तियों का मिलन नहीं, बल्कि ऊर्जाओं का एक सूक्ष्म विज्ञान है। विवाह की रस्मों में एक महत्वपूर्ण परंपरा है—कन्या निरीक्षण के समय ज्येष्ठ (वर के बड़े भाई) द्वारा वधु को स्वर्ण आभूषण भेंट करना।
अक्सर हम इसे एक सामाजिक रीति मान लेते हैं, लेकिन गोपथ ज्योतिष पद्धति के गहरे शोधपरक सूत्रों के अनुसार, इसके पीछे एक अत्यंत सटीक ज्योतिषीय और वैज्ञानिक ऊर्जा चक्र कार्य करता है। आइए, आचार्य सोहन वेदपाठी जी द्वारा प्रतिपादित गोपथ पद्धति के आलोक में इस परंपरा का विश्लेषण करते हैं।
विश्लेषण के मुख्य गोपथ सूत्र
इस शोध को समझने के लिए हमें पद्धति के तीन बुनियादी नियमों को ध्यान में रखना होगा:
 1. बृहस्पति का एकाधिकार: इस पद्धति में बृहस्पति केवल **धनु राशि** के स्वामी हैं।
 2. दूरीजन्य जागृति नियम: कोई भी ग्रह अपने 'उच्च स्थान' से जितनी राशि की दूरी पर स्थित होता है, वह कुंडली के उसी संख्या वाले भाव को जागृत (Activate) कर देता है।
 3. स्त्री जातक का विशिष्ट फल: स्त्री की कुंडली में एकादश (11वां) भाव परिणाम के रूप में पंचम (5वां) भाव को सक्रिय करता है, क्योंकि विवाह के बाद सप्तम (पति) से गणना करने पर 11वां भाव 'पंचम' ही आता है।
1. कन्या (वधु) के लिए: सौभाग्य और संतान का आधार
जब कन्या द्वितीय भाव में स्वर्ण (बृहस्पति) धारण करती है, तो वह कालपुरुष की कुंडली में अपने उच्च स्थान (कर्क) से 11वीं राशि की दूरी पर होती है।
जागृति: यहाँ 11वां भाव सक्रिय होता है।
परिणाम: चूँकि स्त्री के लिए 11वें का परिणाम 5वां भाव (संतान और बुद्धि) है, अतः स्वर्ण पहनने से कन्या के जीवन में संतान सुख और सौभाग्य की वृद्धि होती है। साथ ही, द्वितीय भाव का बृहस्पति मायके और ससुराल दोनों की समृद्धि सुनिश्चित करता है।
2. ज्येष्ठ (वर के बड़े भाई) के लिए: कर्म और प्रतिष्ठा की शुद्धि
ज्येष्ठ का विचार पंचम भाव से किया जाता है। कन्या का द्वितीय भाव ज्येष्ठ के लिए दशम (कर्म स्थान) पड़ता है।
जागृति: दशम भाव में स्थित बृहस्पति उच्च (कर्क) से 7वीं राशि की दूरी पर होता है।
परिणाम: इससे ज्येष्ठ का सप्तम भाव जागृत होता है, जिससे उनके व्यापारिक संबंधों, सामाजिक प्रतिष्ठा और लोक-व्यवहार में उन्नति होती है। स्वर्ण दान करके ज्येष्ठ स्वयं के कर्मों को शुद्ध करते हैं।
3. ससुर के लिए: मर्यादा का ज्योतिषीय कारण
अक्सर प्रश्न उठता है कि ससुर स्वयं आभूषण क्यों नहीं पहनाते? ससुर का विचार चतुर्थ भाव से होता है और कन्या का द्वितीय भाव उनके लिए एकादश (लाभ) है।
जागृति: एकादश भाव उच्च (कर्क) से 8वीं राशि की दूरी पर है।
वैज्ञानिक कारण: अष्टम भाव 'बाधा' और 'गूढ़ संकट' का है। ससुर द्वारा सीधे गहने पहनाने से उनके लिए अष्टम जनित दोष उत्पन्न हो सकते हैं, इसीलिए ज्येष्ठ को यह उत्तरदायित्व दिया गया है ताकि परिवार के मुखिया की ऊर्जा सुरक्षित रहे।

4. वर (पति) के लिए: वंश वृद्धि का संकल्प
वर (सप्तम भाव) के लिए कन्या का द्वितीय भाव अष्टम (आयु और मंगल) स्थान है।
 जागृति: अष्टम भाव में बृहस्पति की यह स्थिति उच्च (कर्क) से 5वीं राशि की दूरी पर है।
परिणाम: यह वर के पंचम भाव (वंश वृद्धि) को सक्रिय करता है। इस प्रकार, बड़े भाई द्वारा दी गई भेंट छोटे भाई के कुल विस्तार का कारण बनती है।
निष्कर्ष: ऊर्जा का पूर्ण चक्र
गोपथ ज्योतिष पद्धति यह सिद्ध करती है कि हमारी परंपराएँ अंधविश्वास नहीं, बल्कि 'एनर्जी इंजीनियरिंग' हैं। ज्येष्ठ द्वारा स्वर्ण का दान और कन्या द्वारा उसे धारण करना, पूरे परिवार के विभिन्न भावों को सकारात्मक रूप से जागृत करने की एक प्रक्रिया है।
"एकादश भाव का पंचम में परिणत होना ही गृहस्थ जीवन का सबसे बड़ा रहस्य है।"
लेखक परिचय
यह लेख आचार्य सोहन वेदपाठी (गोपथ एस्ट्रो) के शोध कार्यों पर आधारित है। गोपथ ज्योतिष पद्धति ज्योतिष के क्षेत्र में एक नवीन और शोध-आधारित दृष्टिकोण है, जो पारंपरिक नियमों को तार्किक और वैज्ञानिक धरातल पर परखता है।क्या आप अपनी कुंडली का विश्लेषण गोपथ पद्धति से करवाना चाहते हैं?
अपने विचार नीचे कमेंट में साझा करें या संपर्क करें।
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ज्योतिषीय त्रिकोण और त्रिदेव: गोपथ पद्धति द्वारा संसार चक्र का नवीन शोध

ज्योतिषीय त्रिकोण और त्रिदेव: गोपथ पद्धति द्वारा संसार चक्र का नवीन शोध
लेखक: आचार्य सोहन वेदपाठी (संस्थापक: गोपथ ज्योतिष पद्धति)
सृष्टि का हर कण एक निश्चित व्यवस्था और चक्र में बंधा है। भारतीय दर्शन में जहाँ हम 'त्रिदेव' (ब्रह्मा, विष्णु, महेश) की अवधारणा को सृष्टि के संचालन का आधार मानते हैं, वहीं ज्योतिष शास्त्र में 'लग्न त्रिकोण' (1, 5, 9) इसी ईश्वरीय ऊर्जा का प्रतिनिधित्व करता है।
आज के लेख में, मैं 'गोपथ ज्योतिष पद्धति' के उन विशिष्ट शोध-नियमों को उजागर करूँगा जो यह स्पष्ट करते हैं कि कैसे हमारी जन्म कुंडली के भाव, जन्म से लेकर मोक्ष तक की यात्रा को परिभाषित करते हैं।

1. लग्न त्रिकोण: त्रिदेव का स्वरूप
कुंडली के तीन सबसे महत्वपूर्ण भाव—प्रथम (लग्न), पंचम और नवम—वास्तव में त्रिदेवों की ऊर्जा के केंद्र हैं।
लग्न (प्रथम भाव): यह 'ब्रह्मा' है। यह हमारे अस्तित्व, शरीर और इस संसार में हमारे प्रादुर्भाव (सृष्टि) का प्रतीक है।
पंचम भाव: यह 'रुद्र' (शिव) है। यहाँ रुद्र संहारकर्ता नहीं, बल्कि ऊर्जा के उस परिवर्तनकारी स्वरूप के प्रतीक हैं जो बुद्धि और कर्मों के फल स्वरूप जीवन को पूर्णता की ओर ले जाते हैं।
नवम भाव: यह 'विष्णु' है। धर्म और भाग्य का यह भाव ही जीवन का पालन और रक्षण करता है।

2. गोपथ पद्धति का एक अत्यंत महत्वपूर्ण शोध सूत्र है - 'भाव का सुख'। 
किसी भी भाव से चौथा भाव उस मूल भाव का सुख कहलाता है। जब हम इस नियम को लग्न त्रिकोण पर लागू करते हैं, तो 'संसार चक्र' की गुत्थी सुलझ जाती है।

A. उत्पत्ति (लग्न का सुख = चतुर्थ भाव)
लग्न (स्वयं) से चौथा भाव 'मातृत्व' और 'सुख' का है। यह माता की कोख और वह परिवेश है जहाँ से सृष्टि (जन्म) संभव होती है। इसीलिए चतुर्थ भाव ही ब्रह्मा की सृजनात्मक ऊर्जा का मूर्त रूप है।

B. संहार (पंचम का सुख = अष्टम भाव)
पंचम (बुद्धि/पूर्व पुण्य) से गणना करने पर चौथा भाव अष्टम आता है। अष्टम भाव आयु और मृत्यु का स्थान है। यहाँ 'रुद्र' की ऊर्जा जीवन की समाप्ति और रूपांतरण का कार्य करती है। यह वह बिंदु है जहाँ जीवन का एक चक्र पूर्ण होकर अगले के लिए तैयार होता है।

C. मोक्ष (नवम का सुख = द्वादश भाव)
नवम (विष्णु/धर्म) से चौथा भाव द्वादश आता है। द्वादश भाव व्यय, त्याग और अंततः 'मोक्ष' का है। भगवान विष्णु, जो मुक्तिदाता हैं, उनका परम पद (सुख) इसी मोक्ष भाव में निहित है।

3. गोपथ पद्धति का विशेष शोध: केतु और मोक्ष का रहस्य
अक्सर पारंपरिक ज्योतिष में मीन राशि और द्वादश भाव के विश्लेषण में केतु की भूमिका को गौण कर दिया जाता है। लेकिन गोपथ पद्धति के अनुसार:
 1. मीन राशि का स्वामित्व: मीन राशि (द्वादश भाव) का एकमात्र स्वामी (बृहस्पति द्वारा प्रदत्त) केतु है।
 2. केतु का स्वभाव: गोपथ का नियम है कि 'केतु जिस राशि में बैठता है, वह राशि कालपुरुष के जिस भाव को सूचित करता है, वह उस स्थान के भौतिक पक्ष को नष्ट कर देता है'।
यही कारण है कि द्वादश भाव 'मुक्ति' का द्वार बनता है। जब केतु सांसारिक मोह और भौतिक बंधनों का 'नाश' करता है, तभी आत्मा को वास्तविक आनंद और मोक्ष की प्राप्ति होती है। बिना केतु की इस विध्वंसक (सकारात्मक अर्थ में) शक्ति के, विष्णु के परम पद (मोक्ष) की प्राप्ति असंभव है।
निष्कर्ष
कुंडली का यह त्रिकोण केवल भविष्य बताने का साधन नहीं है, बल्कि यह हमारे जीवन के आध्यात्मिक विकास का रोडमैप है। गोपथ ज्योतिष पद्धति यह सिद्ध करती है कि हमारा जीवन अनायास नहीं है, बल्कि 'उत्पत्ति, संहार और मुक्ति' के एक सुनिश्चित गणितीय नियम से संचालित है।

ज्योतिषीय परामर्श एवं शोध आधारित जानकारी के लिए संपर्क करें:
आचार्य सोहन वेदपाठी (प्रणेता: गोपथ ज्योतिष पद्धति)
मोबाईल: 9463405098
स्थान: लुधियाना, पंजाब
YouTube: @gopathastro

 #विषय: गोपथ ज्योतिष पद्धति, संसार चक्र, मोक्ष भाव का रहस्य।
 #नियम: चतुर्थ पद नियम, केतु का स्वामित्व (मीन राशि)।
 #दर्शन:  त्रिदेव और ज्योतिषीय त्रिकोण का अंतर्संबंध।

बुधवार, 25 फ़रवरी 2026

चन्द्रग्रहण 3 मार्च 2026 का पूर्ण विवरण

🌑 खग्रास चन्द्रग्रहण 2026: तिथि, सूतक काल और शास्त्रोक्त नियम 🌑
आगामी 3 मार्च 2026, मंगलवार को खग्रास चन्द्रग्रहण लगने जा रहा है। वैदिक ज्योतिष और धर्मशास्त्रों में ग्रहण का विशेष महत्व बताया गया है। इस दौरान सूतक काल, स्नान, दान और पूजा-पाठ से जुड़े कई नियम होते हैं जिनका पालन करना कल्याणकारी माना जाता है।
आइए जानते हैं ग्रहण का समय, सूतक काल और इस दौरान किन नियमों का पालन करना चाहिए।
⏰ लुधियाना में ग्रहण और सूतक का समय (Time Table)
सूतक प्रारंभ - 06:26 प्रातः से।
ग्रहण प्रारंभ - 06:26 सायंकाल से।
ग्रहण समाप्ति - 06:47 सायंकाल पर।
विशेष ध्यान दें: जहाँ ग्रहण दृश्य नहीं होता (दिखाई नहीं देता), वहाँ उसका पुण्यकाल, सूतक तथा अन्य नियम मान्य नहीं होते हैं।
📢 मंदिर दर्शन और शुद्धिकरण (स्थानीय निर्देश)
 * मंदिर दर्शन: सुबह दर्शन के लिये मन्दिर केवल 6:00 बजे तक ही खुला रहेगा। क्योंकि उसके बाद का कुछ समय स्वयं के तैयारी के लिये चाहिये होता है।
 * भगवान का स्नान व भोग: सायंकाल 6:47 पर ग्रहण समाप्त होने के बाद, श्रद्धालुओं को स्वयं स्नानादि करने के पश्चात् ही भगवान के स्नान एवं भोग आदि की व्यवस्था करनी चाहिए।
 * सिद्धपीठ दण्डी स्वामी मन्दिर (लुधियाना): यहाँ दर्शन रात्रि 7:45 से 8:00 बजे तक ही उपलब्ध होंगे।
🌿 सूतक एवं ग्रहण काल के महत्वपूर्ण नियम - 
ग्रहण के समय हमारे ऋषि-मुनियों ने कुछ विशेष नियम बताए हैं, जिनका वैज्ञानिक और आध्यात्मिक दोनों महत्व है:

​🌒 सूतक निर्णय एवं विशेष शास्त्रोक्त नियम

​सूतक और ग्रहण के स्पर्श व समाप्ति को लेकर शास्त्रों में स्पष्ट निर्देश दिए गए हैं:

  • सूतक काल का आरंभ: सामान्यतः सूर्यग्रहण का सूतक चार प्रहर और चन्द्रग्रहण का सूतक तीन प्रहर पहले प्रारम्भ हो जाता है। यह सामान्य नियम है।
  • ग्रस्तोदय ग्रहण के नियम: ग्रस्तोदय ग्रहण (जब ग्रहण लगा हुआ ही उदित हो) में उदयकाल (सूर्योदय या चन्द्रोदय) को ही ग्रहण का स्पर्शकाल मानकर देवार्चन, होम, जप और दानादि करना चाहिये।
  • ग्रस्तास्त ग्रहण के नियम: ग्रस्तास्त ग्रहण (जब ग्रहण लगा हुआ ही अस्त हो) में अस्तकाल (सूर्यास्त या चन्द्रास्त) ही ग्रहण पर्व का समाप्ति काल होता है। लेकिन ऐसे में अगले दिन शुद्ध बिम्ब को देखकर ही भोजनादि करना चाहिए।
  • विशेष नियम: ग्रस्तोदय एवं ग्रस्तास्त ग्रहण में उदय एवं अस्त से चार प्रहर पहले ही (सूर्य/चन्द्रग्रहण दोनों के लिए) सूतक प्रारम्भ हो जाता है।
 * कर्तव्य: ग्रहण के प्रारम्भ में स्नान करके जप-हवन करें। ग्रहण के मध्य में दान और समाप्ति पर सचैल (वस्त्रों सहित) स्नान करना चाहिए।
 * तीर्थ स्नान: ग्रहण के समय विशेषकर गंगा, कनखल (हरिद्वार), प्रयाग (त्रिवेणी), पुष्कर और कुरुक्षेत्र में स्नान करने से विशेष पुण्य की प्राप्ति होती है।
 * महिलाओं के लिए नियम: सौभाग्यवती स्त्रियाँ सिर के ऊपर से स्नान न करें (अशिरः स्नान)। रजस्वला स्त्रियाँ तीर्थ में स्नान न करें, वे केवल तीर्थ का स्मरण करें या अलग पात्र में जल लेकर स्नान करें।
 * निषेध: ग्रहण के समय गर्म पानी (ऊष्णोदक) से स्नान निषिद्ध है। इसके अलावा ग्रहण के पर्वकाल में सोना, खाना, पीना, तेल मालिश (तैलमर्दन), मैथुन और शौचादि वर्जित माने गए हैं।
🍛 भोजन और खाद्य पदार्थों की शुद्धि
 * क्या न खाएं: ग्रहण में पका हुआ अन्न, कटी हुई सब्जी व फल दूषित हो जाते हैं, अतः इनका सेवन नहीं करना चाहिए।
 * कुशा और तिल का प्रयोग: तेल या घी में पका अन्न, दूध, दही, लस्सी, पनीर, अचार, चटनी, सिरका और मुरब्बा में यदि तिल या कुशा रख दी जाए, तो वे ग्रहण काल में दूषित नहीं होते। सूखे खाद्य-पदार्थों में तिल या कुशा डालने की आवश्यकता नहीं होती।
🕉️ व्रत, पर्व और श्राद्ध के अनुष्ठान कैसे करें?
 * व्रत-पर्व पर प्रभाव: उपाकर्म को छोड़कर शेष किसी भी व्रत-पर्व (जैसे सत्यनारायण व्रत, अमावस्या/पूर्णिमा स्नान-दान, नवरात्रि, दीपावली आदि) के अनुष्ठान पर सूर्य या चन्द्रग्रहण का कोई प्रभाव नहीं पड़ता।
 * पूजा का नियम: यदि अनुष्ठान काल में ग्रहण या सूतक लगा हो, तो स्नान करके पूजा करनी चाहिए, लेकिन वहां पके हुए भोजन (पकवान) का प्रयोग न करें।
 * पारण: ग्रहण के सूतक एवं ग्रहण काल में व्रत का पारणा नहीं करना चाहिए।
 * श्राद्ध कर्म: यदि श्राद्ध के दिन ग्रहण पड़ जाए, तो आमंत्रित ब्राह्मण को श्राद्ध के विहित काल में दक्षिणा सहित अपक्वान्न (बिना पका हुआ अन्न या सूखा सीधा) ही दें। इसे देने से पहले श्राद्धकर्ता को स्नान अवश्य कर लेना चाहिए।
🤰 विशेष सावधानियां
 * गर्भवती महिलाओं के लिए: गर्भिणी स्त्रियों को सूर्य एवं चन्द्र, दोनों ही ग्रहण नहीं देखने चाहिए।
 * गृहस्थों के लिए उपवास का नियम: गृहस्थों को ग्रहण वाले दिन उपवास का निषेध है। फिर भी यदि वे व्रत रखना चाहें, तो व्रत संकल्प से पहले थोड़ा सा तिल या फल खा लें, या जल/दूध पी लें। ऐसा करने से उपवास निषेध का दोष नहीं लगता और व्रत का पूर्ण फल मिलता है:
> "उपवासनिषेधे तु भक्ष्यं किंचित्प्रकल्पयेत्। न दुष्यत्युपवासेन उपवासफलं लभेत् ।।"
ध्यान दें : ग्रहण सूतक एवं पर्वकाल में किसी भी नये व्रत का आरंभ और उद्यापन निषिद्ध है।
✍️ आलेख एवं मार्गदर्शन:
आचार्य सोहन वेदपाठी, लुधियाना (पंजाब)
सम्पर्क सूत्र: 9463405098