Thursday, 26 January 2023

वसन्तपंचमी 23 जनवरी 2023

 

26 जनवरी 2023 को माघ शुक्ल पंचमी  पूर्वाह्न व्यापिनी होने से पूरे भारत में वसंतपंचमी का पावन त्यौहार मनाया जायेगा। सिद्धपीठ दण्डी स्वामी मंदिर, लुधियाना से आचार्य सोहन वेदपाठी ने बताया कि वसन्त पञ्चमी का दिन माँ सरस्वती को समर्पित है और इस दिन माँ सरस्वती की पूजा-अर्चना की जाती है। माता सरस्वती को ज्ञान, सँगीत, कला, विज्ञान और शिल्प-कला की देवी माना जाता है। इस दिन को श्री पञ्चमी और सरस्वती पूजा के नाम से भी जाना जाता है।

भक्त लोग, ज्ञान प्राप्ति और सुस्ती, आलस्य एवं अज्ञानता से छुटकारा पाने के लिये, आज के दिन देवी सरस्वती की उपासना करते हैं। कुछ प्रदेशों में आज के दिन शिशुओं को पहला अक्षर लिखना सिखाया जाता है। दूसरे शब्दों में वसन्त पञ्चमी का दिन विद्या आरम्भ या अक्षर अभ्यास के लिये काफी शुभ माना जाता है। इसीलिये माता-पिता आज के दिन शिशु को माता सरस्वती के आशीर्वाद के साथ विद्या आरम्भ कराते हैं। सभी विद्यालयों में आज के दिन सुबह के समय माता सरस्वती की पूजा की जाती है। वसन्त पञ्चमी वाले दिन सरस्वती पूजा विद्यार्थी अपने घर में ही अपने पुस्तकों को साफ-सफाई करके स्वच्छ वस्त्र पर रखकर माता सरस्वती का ध्यान करते हुये धूप-दीप, नैवेद्यादि से पूजन करें।

यह स्वयंसिद्ध मुहूर्तों में शामिल है। इस दिन कोई भी शुभ कार्य किया जा सकता है। विवाहादि संस्कारों को छोड़कर।

आइये इसके बारे में कुछ खास जानकारी आपके साथ सांझा करता हूँ।

 वसंत ऋतु आते ही प्रकृति का कण-कण खिल उठता है। मानव तो क्या पशु-पक्षी तक उल्लास से भर जाते हैं। हर दिन नयी उमंग से सूर्योदय होता है और नयी चेतना प्रदान कर अगले दिन फिर आने का आश्वासन देकर चला जाता है। यों तो माघ का यह पूरा मास ही उत्साह देने वाला है, पर वसंत पंचमी (माघ शुक्ल पंचमी) का पर्व भारतीय जनजीवन को अनेक तरह से प्रभावित करता है। प्राचीनकाल से इसे ज्ञान और कला की देवी मां सरस्वती का जन्मदिवस माना जाता है। जो शिक्षाविद भारत और भारतीयता से प्रेम करते हैं, वे इस दिन मां शारदा की पूजा कर उनसे और अधिक ज्ञानवान होने की प्रार्थना करते हैं। कलाकारों का तो कहना ही क्या? जो महत्व सैनिकों के लिए अपने शस्त्रों और विजयादशमी का है, जो विद्वानों के लिए अपनी पुस्तकों और व्यास पूर्णिमा का है, जो व्यापारियों के लिए अपने तराजू, बाट, बहीखातों और दीपावली का है, वही महत्व कलाकारों के लिए वसंत पंचमी का है। चाहे वे कवि हों या लेखक, गायक हों या वादक, नाटककार हों या नृत्यकार, सब दिन का प्रारम्भ अपने उपकरणों की पूजा और मां सरस्वती की वंदना से करते हैं।

ऐतिहासिक महत्व - 

वसंत पंचमी का दिन हमें पृथ्वीराज चौहान की भी याद दिलाता है। उन्होंने विदेशी हमलावर मोहम्मद गौरी को 16 बार पराजित किया और उदारता दिखाते हुए हर बार जीवित छोड़ दिया, पर जब सत्रहवीं बार वे पराजित हुए, तो मोहम्मद गौरी ने उन्हें नहीं छोड़ा। वह उन्हें अपने साथ अफगानिस्तानले गया और उनकी आंखें फोड़ दीं।

इसके बाद की घटना तो जगप्रसिद्ध ही है। गौरी ने मृत्युदंड देने से पूर्व उनके शब्दभेदी बाण का कमाल देखना चाहा। पृथ्वीराज के साथी कवि चंदबरदाई के परामर्श पर गौरी ने ऊंचे स्थान पर बैठकर तवे पर चोट मारकर संकेत किया। तभी चंदबरदाई ने पृथ्वीराज को संदेश दिया।

चार बांस चौबीस गज, अंगुल अष्ट प्रमाण।

ता ऊपर सुल्तान है, मत चूको चौहान ॥

पृथ्वीराज चौहान ने इस बार भूल नहीं की। उन्होंने तवे पर हुई चोट और चंदबरदाई के संकेत से अनुमान लगाकर जो बाण मारा, वह गौरी के सीने में जा धंसा। इसके बाद चंदबरदाई और पृथ्वीराज ने भी एक दूसरे के पेट में छुरा भौंककर आत्मबलिदान दे दिया। (1192 ई) यह घटना भी वसंत पंचमी वाले दिन ही हुई थी।

वसंत पंचमी का लाहौर निवासी वीर हकीकत से भी गहरा संबंध है। एक दिन जब मुल्ला जी किसी काम से विद्यालय छोड़कर चले गये, तो सब बच्चे खेलने लगे, पर वह पढ़ता रहा। जब अन्य बच्चों ने उसे छेड़ा, तो दुर्गा मां की सौगंध दी। मुस्लिम बालकों ने दुर्गा मां की हंसी उड़ाई। हकीकत ने कहा कि यदि में तुम्हारी बीबी फातिमा के बारे में कुछ कहूं, तो तुम्हें कैसा लगेगा?

बस फिर क्या था, मुल्ला जी के आते ही उन शरारती छात्रों ने शिकायत कर दी कि इसने बीबी फातिमा को गाली दी है। फिर तो बात बढ़ते हुए काजी तक जा पहुंची। मुस्लिम शासन में वही निर्णय हुआ, जिसकी अपेक्षा थी। आदेश हो गया कि या तो हकीकत मुसलमान बन जाये, अन्यथा उसे मृत्युदंड दिया जायेगा। हकीकत ने यह स्वीकार नहीं किया। परिणामत: उसे तलवार के घाट उतारने का फरमान जारी हो गया।

कहते हैं उसके भोले मुख को देखकर जल्लाद के हाथ से तलवार गिर गयी। हकीकत ने तलवार उसके हाथ में दी और कहा कि जब मैं बच्चा होकर अपने धर्म का पालन कर रहा हूं, तो तुम बड़े होकर अपने धर्म से क्यों विमुख हो रहे हो? इस पर जल्लाद ने दिल मजबूत कर तलवार चला दी, पर उस वीर का शीश धरती पर नहीं गिरा। वह आकाशमार्ग से सीधा स्वर्ग चला गया। यह घटना वसंत पंचमी (23.2.1734) को ही हुई थी। पाकिस्तान यद्यपि मुस्लिम देश है, पर हकीकत के आकाशगामी शीश की याद में वहां वसंत पंचमी पर पतंगें उड़ाई जाती है। हकीकत लाहौर का निवासी था। अत: पतंगबाजी का सर्वाधिक जोर लाहौर में रहता है।

वसंत पंचमी हमें गुरू रामसिंह कूका की भी याद दिलाती है। उनका जन्म 1816 ई. में वसंत पंचमी पर लुधियाना के भैणी ग्राम में हुआ था। कुछ समय वे रणजीत सिंह की सेना में रहे, फिर घर आकर खेतीबाड़ी में लग गये, पर आध्यात्मिक प्रवृत्ति होने के कारण इनके प्रवचन सुनने लोग आने लगे। धीरे-धीरे इनके शिष्यों का एक अलग पंथ ही बन गया, जो कूका पंथ कहलाया।

गुरू रामसिंह गोरक्षा, स्वदेशी, नारी उध्दार, अंतरजातीय विवाह, सामूहिक विवाह आदि पर बहुत जोर देते थे। उन्होंने भी सर्वप्रथम अंग्रेजी शासन का बहिश्कार कर अपनी स्वतंत्र डाक और प्रशासन व्यवस्था चलायी थी। प्रतिवर्ष मकर संक्रांति पर भैणी गांव में मेला लगता था। 1872 में मेले में आते समय उनके एक शिष्य को मुसलमानों ने घेर लिया। उन्होंने उसे पीटा और गोवध कर उसके मुंह में गोमांस ठूंस दिया। यह सुनकर गुरू रामसिंह के शिष्य भड़क गये। उन्होंने उस गांव पर हमला बोल दिया, पर दूसरी ओर से अंग्रेज सेना आ गयी। अत: युध्द का पासा पलट गया।

इस संघर्ष में अनेक कूका वीर शहीद हुए और 68 पकड़ लिये गये। इनमें से 50 को सत्रह जनवरी 1872 को मलेरकोटलामें तोप के सामने खड़ाकर उड़ा दिया गया। शेष 18 को अगले दिन फांसी दी गयी। दो दिन बाद गुरू रामसिंह को भी पकड़कर बर्मा की मांडले जेल में भेज दिया गया। 14 साल तक वहां कठोर अत्याचार सहकर 1885 ई. में उन्होंने अपना शरीर त्याग दिया।


Saturday, 31 December 2022

सब धरा का धरा रह जायेगा।

 सब धरा का धरा रह जायेगा।


एक राजा को राज भोगते हुए काफी समय हो गया था। बाल भी सफ़ेद होने लगे थे। एक दिन उसने अपने दरबार में एक उत्सव रखा और अपने गुरुदेव एवं मित्र देश के राजाओं को भी सादर आमन्त्रित किया। उत्सव को रोचक बनाने के लिए राज्य की सुप्रसिद्ध नर्तकी को भी बुलाया गया।

राजा ने कुछ स्वर्ण मुद्रायें अपने गुरु जी को भी दीं, ताकि यदि वे चाहें तो नर्तकी के अच्छे गीत व नृत्य पर वे उसे पुरस्कृत कर सकें। सारी रात नृत्य चलता रहा। ब्रह्म मुहूर्त की बेला आयी। नर्तकी ने देखा कि तबले वाला ऊँघ रहा है, उसको जगाने के लिए नर्तकी ने एक दोहा पढ़ा –

“बहु बीती, थोड़ी रही, पल पल गयी बिताय।
एक पलक के कारने, क्यों कलंक लग जाय ।”

अब इस दोहे का अलग-अलग व्यक्तियों ने अपने अनुरुप अलग-अलग अर्थ निकाला। तबले वाला सतर्क होकर बजाने लगा। जब यह बात गुरु जी ने सुनी तो उन्होंने सारी मोहरें उस नर्तकी के सामने फैंक दीं। वही दोहा नर्तकी ने फिर पढ़ा तो राजा की लड़की ने अपना नवलखा हार नर्तकी को भेंट कर दिया।

उसने फिर वही दोहा दोहराया तो राजा के पुत्र युवराज ने अपना मुकट उतारकर नर्तकी को समर्पित कर दिया। नर्तकी फिर वही दोहा दोहराने लगी तो राजा ने कहा – “बस कर, एक दोहे से तुमने वैश्या होकर भी सबको लूट लिया है।” जब यह बात राजा के गुरु ने सुनी तो गुरु के नेत्रों में आँसू आ गए और गुरु जी कहने लगे – “राजन! इसको तू वैश्या मत कह, ये तो अब मेरी गुरु बन गयी है। इसने मेरी आँखें खोल दी हैं। यह कह रही है कि मैं सारी उम्र संयमपूर्वक भक्ति करता रहा और आखिरी समय में नर्तकी का मुज़रा देखकर अपनी साधना नष्ट करने यहाँ चला आया हूँ, भाई! मैं तो चला।” यह कहकर गुरु जी तो अपना कमण्डल उठाकर जंगल की ओर चल पड़े।

राजा की लड़की ने कहा – “पिता जी! मैं जवान हो गयी हूँ। आप आँखें बन्द किए बैठे हैं, मेरी शादी नहीं कर रहे थे और आज रात मैंने आपके महावत के साथ भागकर अपना जीवन बर्बाद कर लेना था। लेकिन इस नर्तकी ने मुझे सुमति दी है कि जल्दबाजी मत कर कभी तो तेरी शादी होगी ही। क्यों अपने पिता को कलंकित करने पर तुली है?”

युवराज ने कहा – “पिता जी! आप वृद्ध हो चले हैं, फिर भी मुझे राज नहीं दे रहे थे। मैंने आज रात ही सिपाहियों से मिलकर आपका कत्ल करवा देना था। लेकिन इस नर्तकी ने समझाया कि पगले! आज नहीं तो कल आखिर राज तो तुम्हें ही मिलना है, क्यों अपने पिता के खून का कलंक अपने सिर पर लेता है। धैर्य रख।”

जब ये सब बातें राजा ने सुनी तो राजा को भी आत्म ज्ञान हो गया। राजा के मन में वैराग्य आ गया। राजा ने तुरन्त फैसला लिया – “क्यों न मैं अभी युवराज का राजतिलक कर दूँ।” फिर क्या था, उसी समय राजा ने युवराज का राजतिलक किया और अपनी पुत्री को कहा – “पुत्री ! दरबार में एक से एक राजकुमार आये हुए हैं। तुम अपनी इच्छा से किसी भी राजकुमार के गले में वरमाला डालकर पति रुप में चुन सकती हो।” राजकुमारी ने ऐसा ही किया और राजा सब त्याग कर जंगल में गुरु की शरण में चला गया।

यह सब देखकर नर्तकी ने सोचा – “मेरे एक दोहे से इतने लोग सुधर गए, लेकिन मैं क्यूँ नहीं सुधर पायी?” उसी समय नर्तकी में भी वैराग्य आ गया। उसी समय उसने निर्णय लिया कि आज से मैं अपना धंधा बन्द करती हूँ और कहा कि “हे प्रभु! मेरे पापों से मुझे क्षमा करना। बस, आज से मैं सिर्फ तेरा नाम सुमिरन करुँगी।”

समझ आने की बात है, दुनिया बदलते देर नहीं लगती। एक दोहे की दो लाईनों से भी हृदय परिवर्तन हो सकता है। बस, केवल थोड़ा धैर्य रखकर चिन्तन करने की आवश्यकता है।

प्रशंसा से पिघलना नहीं चाहिए, आलोचना से उबलना नहीं चाहिए। नि:स्वार्थ भाव से कर्म करते रहें। क्योंकि इस धरा का, इस धरा पर, सब धरा रह जायेगा!

Sunday, 30 October 2022

8 नवम्बर 2022 के खण्डग्रास एवं ग्रस्तोदय चंद्रग्रहण का विवरण के लिये क्लिक करें -

आचार्य सोहन वेदपाठी , संपर्क - 9463405098

08 नवम्बर 2022 को भारतीय समयानुसार पूरे विश्व में 02:39PM  से 06:19 PM तक ग्रहण है। इस ग्रहण की खण्डग्रास आकृति सम्पूर्ण भारत में दृश्य होगी । परंतु भारत के अधिकतर क्षेत्र में यह ग्रस्तोदय ही होगा अर्थात् चंद्रोदय से पूर्व ही ग्रहण प्रारम्भ हो चुका होगा।

भारत के अतिरिक्त यह एशिया, उत्तर-पूर्वी यूरोप,  ऑस्ट्रेलिया , उत्तर - पश्चिमी कनाडा, उत्तरी-अमेरिका , दक्षिणी अमेरिका , प्रशांत महासागर , थाईलैंड , गोटेमाला , इंडोनेशिया , दक्षिण कोरिया , जापान , मैक्सिको , चीन , म्यांमार , फिलीपींस में दृश्य होगा।

ग्रस्तोदय ग्रहण का प्रारम्भ स्थानीय चंद्रोदय से माना जाता है एवं उसका सूतक पूर्ववर्ती स्थानीय  सूर्योदय से ( न की 9 घंटे पहले ) ही प्रारम्भ माना जाता है ।

लुधियाना में सूर्योदय 06:51 बजे होगा एवं चंद्रोदय 05:30 बजे शाम को होगा ।।

तदनुसार सूतक प्रारम्भ = 06:51 AM से
ग्रहण प्रारम्भ = 05:30 PM से
ग्रहण समाप्ति = 06:19 PM तक

ग्रहण समाप्ति ( 06:19 PM) के बाद सचैल स्नान करके शुद्ध चंद्र के बिम्ब का दर्शन करने के बाद ही भोजनादि करने का विधान है। 

विशेष - सिद्धपीठ दण्डी स्वामी मंदिर (लुधियाना में ) प्रातःकाल 5:30 से 6:30 तक एवं सायंकाल 7:00 से 8:00 बजे तक दर्शन हेतु खुला रहेगा। इसी समय में भोग-आरती सम्पन्न होगा।।

Monday, 29 August 2022

जीवित्पुत्रिका एवं महालक्ष्मी व्रत का निर्णय कैसे करें ?

मिथिला क्षेत्रीय पञ्चाङ्ग में व्रतों का निर्णय अधिकतम वर्षकृत्य ग्रंथ के आधार पर किया जाता है। वर्षकृत्य के अनुसार जीवित्पुत्रिका प्रदोषव्यापिनी में ही स्वीकार करते हैं। जिसका पालन मिथिलांचल में लोग करते भी है। कथा में उपलब्ध वाक्य को प्रमाण मानते है। यथा - "प्रदोषसमये स्त्रीभिः पूज्यो जीमूतवाहनः" के अनुसार प्रदोषकाल में पूजन करना युक्तिसंगत है। लेकिन व्रत के लिये निर्णायक नहीं है। 

परञ्च 
इस व्रत के निर्णायक सिद्धांत में भ्रम होने का एकमात्र कारण यह है कि आश्विन कृष्ण अष्टमी को दो व्रत होता है। 
पहला - जीवित्पुत्रिका एवं 
दूसरा - महालक्ष्मी व्रत (सोलह दिनों का व्रत होता है। जो भाद्र शुक्ल अष्टमी से प्रारंभ होकर आश्विन कृष्ण अष्टमी को पूर्ण होता है।)
दोनों का निर्णायक सिद्धांत अलग-अलग है।
देखिये ब्रह्मवैवर्त पुराण के इस श्लोक को -

लक्ष्मीव्रतं चभ्युदिते शशांके 
यत्राष्टमी चाश्विनकृष्णपक्षे।
यत्रोदयं वै लभते दिनेशो 
सुताख्या व्रतमस्तु तत्र।।

स्पष्ट है कि चंद्रोदय में उपलब्ध अष्टमी में लक्ष्मी व्रत एवं सूर्योदय में उपलब्ध अष्टमी में जीवित्पुत्रिका व्रत करना चाहिये।। काशीय एवं अन्य प्रान्तीय पञ्चाङ्गकारों के द्वारा यही स्वीकृत एवं ग्राह्य है।

Saturday, 6 August 2022

ऋषिपंचमी व्रत की विशेषता, कथा एवं उद्यापन विधि

ऋषिपंचमी व्रत का उद्देश्य - 

महिलाये जब माहवारी (mc) से होती हैं तब गलती से कभी मंदिर में चली जाती हैं या कभी पूजा हो वहाँ चली जाती हैं , परपुरुषगमन, व्यभिचार, विवाहपूर्व संबंध हो तो उसका दोष लगता हैं ।उन सभी पापों से छुटकारा पाने के लिए यह व्रत स्त्रियों द्वारा किया जाना चाहिये। आजकल जब पुरुष भी इस व्रत को करते हैं तो वैदिक मन्त्रों का पाठ होता है, ब्रह्मचर्य का पालन किया जाता है। इसके करने से सभी पापों एवं तीनों प्रकार के दु:खों से छुटकारा मिलता है तथा सौभाग्य की वृद्धि होती है। जब नारी इसे सम्पादित करती है तो उसे आनन्द, शरीर-सौन्दर्य , पुत्रों एवं पौत्रों की प्राप्ति होती है।

विशेष - 

वैसे तो यह व्रत स्त्रियों को आजीवन निर्बाधरूप से करना चाहिये। लेकिन कई वर्ष व्रत के दिन माहवारी आ जाने के कारण व्रत नही कर सकते है। इस अवस्था में व्रत छोड़ना पड़ता है। अतः लगभग 45 से 50 वर्ष की अवस्था के बाद जब माहवारी से निवृति ( Menopause ) हो जाये तब पति-पत्नी दोनों ही इस व्रत को लगातार सात वर्षों तक करें एवं आठवें वर्ष इसका उद्यापन करें।

पश्चात्कालीन निबन्ध व्रतार्क, व्रतराज आदि ने भविष्योत्तर से उद्धृत कर बहुत-सी बातें लिखी हैं, जहाँ कृष्ण द्वारा युधिष्ठिर को सुनायी गयी एक कथा भी है। जब इन्द्र ने त्वष्टा के पुत्र वृत्र का हनन किया तो उन्हें ब्रह्महत्या का अपराध लगा। उस पाप को चार स्थानों में बाँटा गया, यथा अग्नि (धूम से मिश्रित प्रथम ज्वाला), नदियों (वर्षाकाल के पंकिल (कीचड़ युक्त ) जल), पर्वतों (जहाँ गोंद वाले वृक्ष उगते हैं) में तथा स्त्रियों (रजस्वला) में। अत: मासिक धर्म के समय लगे पाप से छुटकारा पाने के लिए यह व्रत स्त्रियों द्वारा किया जाना चाहिये।

निषेध- 

इस व्रत में केवल शाकों का प्रयोग होता है । व्रतराज के मत से इस व्रत में केवल शाकों या नीवारों या साँवा (श्यामाक) या कन्द-मूलों या फलों का सेवन करना चाहिए तथा हल से उत्पन्न किया हुआ अन्न नहीं खाना चाहिये ।

कब करें - 

ऋषि पञ्चमी का व्रत भाद्रपद के  शुक्ल पक्षकी पंचमी को किया जाता है। ऋषिपंचमी व्रत चतुर्थी से संयुक्त पंचमी को किया जाता है न कि षष्ठीयुक्त पंचमी को।

व्रत एवं पूजन की विधि -

व्रती को नदी आदि में स्नान करते समय अपामार्ग (पंजाब में इसे पुठकण्डा के नाम से जाना जाता है। जबकि हिंदी भाषी क्षेत्रों में इसे चिड़चिड़ी कहा जाता है। ) के आठ पत्ते लेकर एक - एक करके हथेली पर रगड़ें एवं अपने बालों पर लगाकर स्नान करना चाहिये । इसी प्रकार अरुंधति सहित सातों ऋषियों का ध्यान करते हुये आठ बार स्नान करने चाहिये। तथा दैनिक कृत्य करने के उपरान्त व्रत का संकल्प करें । 

जो इस प्रकार है - तिथ्यादि - नाम - गोत्र आदि का उच्चारण करने के बाद इस प्रकार से बोलें - 

अहं ज्ञानतोऽज्ञानतो वा रजस्वलावस्थायां कृतसंपर्कजनितदोषपरिहारार्थमृषिपञ्चमीव्रतं करिष्ये।

ऐसा संकल्प करके अरून्धती के साथ सप्तर्षियों की पूजा करनी चाहिये ।

सातों ऋषियों (कश्यप, अत्रि भरद्वाज, विश्वामित्र, गौतम, जमदग्नि एवं वसिष्ठ-इन सात ऋषियों एवं वसिष्ठ पत्नी अरुंधति) की प्रतिमाओं (यह कुशा को लपेटकर बना लेना चाहिये।) को पंचामृत से स्नान कराकर उन पर चन्दन , पुष्पों, सुगन्धित पदार्थों, धूप, दीप, श्वेत वस्त्रों, यज्ञोपवीतों, अधिक मात्रा में नैवेद्य से पूजा करनी चाहिए और मन्त्रों के साथ अर्ध्य चढ़ाना चाहिये।

अर्ध्यमन्त्र - 

सप्त ऋषि के लिये -

कश्यपोSत्रिर्भरद्वाजो विश्वामित्रोय गौतम:। 

जमदग्निर्वसिष्ठश्च सप्तैते ऋषय: स्मृता:॥

गृह्णन्त्वर्ध्य मया दत्तं तुष्टा भवत मे सदा॥


अरून्धती के लिए भी अर्घ्यमन्त्र है—

अत्रेर्यथानसूया स्याद् वसिष्ठस्याप्यरून्धती। 

कौशिकस्य यथा सती तथा त्वमपि भर्तरि॥ 


सौजन्य - आचार्य सोहन वेदपाठी

मोबाइल : 9463405098

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वेबसाइट - http://www.acharyag.com


व्रत की कथा -

इसकी दो कथा प्रसिद्ध है - 

पहली कथा - 

सतयुग में विदर्भ नगरी में श्येनजित नामक राजा हुए थे। वह ऋषियों के समान थे। उन्हीं के राज में एक कृषक सुमित्र था। उसकी पत्नी जयश्री अत्यंत  पतिव्रता थी। एक समय वर्षा ऋतु में जब उसकी पत्नी खेती के कामों में लगी हुई थी, तो वह रजस्वला हो गई। उसको रजस्वला होने का पता लग गया फिर भी वह घर के कामों में लगी रही। कुछ समय बाद वह दोनों स्त्री-पुरुष अपनी-अपनी आयु भोगकर मृत्यु को प्राप्त हुए। जयश्री तो कुटिया बनीं और सुमित्र को रजस्वला स्त्री के सम्पर्क में आने के कारण बैल की योनी मिली, क्योंकि ऋतु दोष के अतिरिक्त इन दोनों का कोई अपराध नहीं था। इसी कारण इन दोनों को अपने पूर्व जन्म का समस्त विवरण याद रहा। वे दोनों कुतिया और बैल के रूप में उसी नगर में अपने बेटे सुचित्र के यहां रहने लगे। धर्मात्मा सुचित्र अपने अतिथियों का पूर्ण सत्कार करता था। अपने पिता के श्राद्ध के दिन उसने अपने घर ब्राह्मणों को भोजन के लिए नाना प्रकार के भोजन बनवाए। जब उसकी स्त्री किसी काम के लिए रसोई से बाहर गई हुई थी तो एक सर्प ने रसोई की खीर के बर्तन में विष वमन कर दिया । कुतिया के रूप में सुचित्र की मां कुछ दूर से सब देख रही थी। पुत्र की बहू के आने पर उसने पुत्र को ब्रह्महत्या के पाप से बचाने के लिए उस बर्तन में मुंह डाल दिया। सुचित्र की पत्नी चन्द्रवती से कुतिया का यह कृत्य देखा न गया और उसने चूल्हे में से जलती लकड़ी निकाल कर कुतिया को मारी। बेचारी कुतिया मार खाकर इधर-उधर भागने लगी। चौके में जो झूठन आदि बची रहती थी, वह सब सुचित्र की बहू उस कुतिया को डाल देती थी, लेकिन क्रोध के कारण उसने वह भी बाहर फिकवा दी। सब खाने का सामान फिकवा कर बर्तन साफ करके दोबारा खाना बना कर ब्राह्मणों को खिलाया। रात्रि के समय भूख से व्याकुल होकर वह कुतिया बैल के रूप में रह रहे अपने पूर्व पति के पास आकर बोली, हे स्वामी! आज तो मैं भूख से मरी जा रही हूं। वैसे तो मेरा पुत्र मुझे रोज खाने को देता था, लेकिन आज मुझे मारा और खाने को कुछ भी नहीं दिया। तब वह बैल बोला, हे भद्रे! तेरे पापों के कारण तो मैं भी इस योनी में आ पड़ा हूं और आज बोझा ढ़ोते-ढ़ोते मेरी कमर टूट गई है। आज मैं भी खेत में दिनभर हल में जुता रहा। मेरे पुत्र ने आज मुझे भी भोजन नहीं दिया और मुझे मारा भी बहुत। मुझे इस प्रकार कष्ट देकर उसने इस श्राद्ध को निष्फल कर दिया। अपने माता-पिता की इन बातों को सुचित्र सुन रहा था, उसने उसी समय दोनों को भरपेट भोजन कराया और फिर उनके दुख से दुखी होकर वन की ओर चला गया। वन में जाकर ऋषियों से पूछा कि मेरे माता-पिता किन कर्मों के कारण इन नीची योनियों को प्राप्त हुए हैं और अब किस प्रकार से इनको छुटकारा मिल सकता है। तब सर्वतमा ऋषि बोले तुम इनकी मुक्ति के लिए पत्नीसहित ऋषि पंचमी का व्रत धारण करो तथा उसका फल अपने माता-पिता को दो। भाद्रपद महीने की शुक्ल पंचमी को मुख शुद्ध करके मध्याह्न में नदी के पवित्र जल में स्नान करना और नए रेशमी कपड़े पहनकर अरूधन्ती सहित सप्तऋषियों का पूजन करना। इतना सुनकर सुचित्र अपने घर लौट आया और अपनी पत्नीसहित विधि-विधान से पूजन व्रत किया। उसके पुण्य से माता-पिता दोनों पशु योनियों से छूट गए। इसलिए जो महिला श्रद्धापूर्वक ऋषि पंचमी का व्रत करती है, वह समस्त सांसारिक सुखों को भोग कर बैकुंठ को जाती है।

दूसरी कथा -

एक समय  विदर्भ  देश में उत्तक नाम का ब्राह्मण  अपनी पतिव्रता पत्नी के साथ निवास करता था। उसके परिवार में एक पुत्र व एक पुत्री थी। पुत्र का नाम 'सुविभूषण' था जो बहुत बुद्धि वाला था। राजा ने अपनी पुत्री का विवाहअच्छे ब्राह्मण के साथ कर दिया था। भगवान की कृपा से ऐसा विधान बना कि पुत्री विधवा हो गयी। अपने धर्म के साथ वह अपने पिता के घर ही रहने लगी। अपनी कन्या को दु:खी देखकर उत्तक अपने पुत्र को घर पर छोड़कर अपनी स्त्री व पुत्री को लेकर गंगा किनारे आश्रम बनाकर रहने लगे। कन्या अपने माता-पिता की सेवा करने लगी। एक दिन काम करके थक कर कन्या एक पत्थर की शिला पर आराम करने लेट गई। आधी रात में उसके शरीर में कीड़े उत्पन्न हो गये। अपनी कन्या के शरीर पर कीड़े देखकर ब्राह्मणी बहुत विलाप करके रोती रही और बेहोश हो गयी। होश आने पर कन्या को उठाकर उत्तक ऋषि के पास ले गई और कहने लगी कि इसकी हालत ऐसी क्यों हो गई? ब्राह्मणी की बात सुनकर उत्तक अपने नेत्रों को बन्द करके ध्यान लगाकर कहने लगे कि हमारी कन्या पूर्व जन्म में ब्राह्मणी थी। इसने एक बार रजस्वला होने पर घर के सब बर्तन आदि छू लिये थे। बस इसी पाप के कारण इसके शरीर पर कीड़े पड़ गये हैं। शास्त्रों के अनुसार रजस्वला स्त्री पहले दिन चान्डालनी दूसरे दिन ब्रह्म हत्यारनी तीसरे दिन पवित्र धोबिन के समान होती है और चौथे दिन वह स्नान करने के पश्चात् शुद्ध हो जाती है। शुद्ध होने के बाद भी इसने अपनी सखियों के साथ ऋषि पंचमी का व्रत देखकर रुचि नहीं ली। व्रत के दर्शन मात्र से ही इसे ब्राह्मण कुल प्राप्त हुआ। लेकिन इसके तिरस्कार करने से इसके शरीर में कीड़े पड़ गये। ब्राह्मणी ने कहा ऐसे आश्चर्य व्रत को आप कृपा करके मुझे अवश्य बतायें। यह कथा श्री कृष्ण ने युधिष्ठरको सुनाई थी। जो स्त्री रजस्वला होकर भी घर के कामों को करती है वह अवश्य ही नरक में जाती है।

उद्यापन की विधि--

यह व्रत सात वर्षों का होता है।सप्तर्षि सहित नवग्रहादि पूजन किया जाता है। सात घड़े होते हैं और सात ब्राह्मण निमन्त्रित रहते हैं, जिन्हें अन्त में ऋषियों की सातों प्रतिमाएँ (सोने या चाँदी की) दान में दे दी जाती हैं। यदि सभी प्रतिमाएँ एक ही कलश में रखी गयी हों तो वह कलश एक ब्राह्मण को तथा अन्यों को कलशों के साथ वस्त्र एवं दक्षिणा दी जाती है।