Tuesday, 13 January 2026

एकादशी व्रत में चावल एवं अन्न निषेध: एक शास्त्रीय और वैज्ञानिक विश्लेषण


(एकादशी व्रत और अन्न निषेध: शास्त्र, विज्ञान और आयुर्वेद का अद्भुत संगम)
जानिये एकादशी व्रत में चावल और अन्न खाने की मनाही क्यों है? क्या कहता है पद्म पुराण और आधुनिक विज्ञान? 
आचार्य सोहन वेदपाठी द्वारा विस्तृत विश्लेषण।
जय श्री हरि!
सनातन धर्म में एकादशी व्रत का स्थान सर्वोपरि है। इसे हरिवासर भी कहा जाता है। मेरे पास अक्सर जिज्ञासुओं और विद्यार्थियों के प्रश्न आते हैं कि "आखिर एकादशी के दिन चावल या अन्न का सेवन पूर्णतः वर्जित क्यों है?"
क्या यह केवल एक परंपरा है, या इसके पीछे कोई गहरा विज्ञान है? आज के इस लेख में, हम 'गोपथ ज्योतिष' के दृष्टिकोण से इसका शास्त्रीय, पौराणिक और वैज्ञानिक विश्लेषण करेंगे।

1. क्या कहते हैं हमारे शास्त्र? (पौराणिक आधार)
धर्मग्रंथों में स्पष्ट उल्लेख है कि एकादशी के दिन अन्न में 'पाप' का वास होता है। नारद पुराण और पद्म पुराण का यह श्लोक अत्यंत महत्वपूर्ण है:
|| यानि कानि च पापानि ब्रह्महत्यादिकानि च ||
|| अन्नमाश्रित्य तिष्ठन्ति सम्प्राप्ते हरिवासरे ||
भावार्थ: संसार के समस्त पाप (यहाँ तक कि ब्रह्महत्या जैसे महापाप भी) एकादशी (हरि वासर) के दिन अन्न में आश्रय लेकर स्थित हो जाते हैं। अतः जो व्यक्ति इस दिन अन्न ग्रहण करता है, वह भोजन नहीं, अपितु पापों का ही भक्षण करता है।
स्कंद पुराण में अन्न खाने के दुष्परिणामों का वर्णन करते हुए कठोर शब्दों में कहा गया है:
|| मातृहा पितृहा चैव भ्रातृहा गुरुहा तथा ||
|| एकादश्यां तु यो भुङ्क्ते विष्णुलोकाच्च च्यवते ||
भावार्थ: जो व्यक्ति एकादशी को अन्न खाता है, वह माता-पिता, भाई और गुरु की हत्या करने वाले के समान पाप का भागी होता है और विष्णुलोक से वंचित रह जाता है।
कथा प्रसंग: पौराणिक मान्यताओं के अनुसार, जब भगवान विष्णु ने 'मुरा' नामक दैत्य के वध हेतु अपने शरीर से एक शक्ति (एकादशी) को प्रकट किया, तो 'पाप पुरुष' ने भयभीत होकर भगवान से छिपने का स्थान माँगा। तब भगवान ने उसे एकादशी के दिन 'अन्न' में वास करने की अनुमति दी। यही कारण है कि इस दिन अन्न (विशेषकर चावल) खाना पाप को शरीर में प्रवेश देने के समान माना गया है।

2. विज्ञान क्या कहता है? (वैज्ञानिक कारण)
अक्सर युवा पीढ़ी तर्कों की मांग करती है। उनके लिए यह जानना आवश्यक है कि चावल का सीधा संबंध हमारे मन से है।
 * चंद्रमा और जल: ज्योतिष का सूत्र है 'चन्द्रमा मनसो जातः'
 चावल के निषेध का संबंध केवल धर्म से नहीं, बल्कि हमारे शरीर और मन की संरचना से भी है। चंद्रमा का जल पर गहरा प्रभाव होता है (जैसे समुद्र में ज्वार-भाटा)।
 * जल तत्व और चावल: चावल की खेती में अत्यधिक जल की आवश्यकता होती है और चावल में जल को धारण करने की क्षमता (Water Retention) सर्वाधिक होती है। हमारे शरीर में भी ७०% जल है।
 * मन की एकाग्रता: एकादशी तिथि पर चंद्रमा की स्थिति ऐसी होती है कि वायुमंडलीय दबाव और शरीर के जल तत्व में हलचल होती है। यदि हम चावल खाते हैं, तो शरीर में जल की मात्रा बढ़ती है, जिससे मन चंचल और अस्थिर हो जाता है। व्रत का उद्देश्य ईश्वर में ध्यान लगाना है, किन्तु चावल खाने से उत्पन्न आलस्य और मानसिक चंचलता इसमें बाधा उत्पन्न करती है।
3. आयुर्वेद और स्वास्थ्य (Health Benefits)
आयुर्वेद का स्वर्णिम सूत्र है— 'लंघनम् परमौषधम्' (उपवास ही परम औषधि है)। निरंतर कार्य करने से हमारे पाचन तंत्र को विश्राम की आवश्यकता होती है। अन्न पचने में भारी होता है, जबकि फलाहार सुपाच्य है। एकादशी पर अन्न त्यागने से शरीर के विषाक्त पदार्थ (Toxins) बाहर निकल जाते हैं और शरीर का शुद्धिकरण (Detoxification) होता है।

(निष्कर्ष / Conclusion)
एकादशी पर चावल न खाने का नियम हमें शारीरिक रूप से हल्का, मानसिक रूप से एकाग्र और आध्यात्मिक रूप से पवित्र बनाता है। यह केवल एक निषेध नहीं, बल्कि आत्म-नियंत्रण और सात्विकता की ओर बढ़ाया गया एक महत्वपूर्ण कदम है।

प्रिय पाठकों/विद्यार्थियों !
क्या आप भी एकादशी का व्रत रखते हैं? अपने अनुभव या प्रश्न नीचे कमेंट बॉक्स में अवश्य लिखें। यदि यह जानकारी आपको ज्ञानवर्धक लगी हो, तो इसे अपने परिजनों के साथ शेयर करना न भूलें।
 आचार्य सोहन वेदपाठी
(लेखक एवं शोधकर्ता: गोपथ ज्योतिष पद्धति) ज्योतिष सीखने के लिये 9463405098 पर संपर्क करें।

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