Tuesday, 13 January 2026

षट्तिला एकादशी व्रत कथा एवं उसके छह अनिवार्य कर्म

आज 14 जनवरी 2026 को षट्तिला एकादशी का व्रत है। इसी दिन मकर संक्रांति भी है।

आज के दिन 6 प्रकार से तिल का प्रयोग करना चाहिये।

पारण का समय - इस व्रत का पारण का समय अगले दिन सूर्योदय से 9:30 AM (लुधियाना में) तक के मध्य गाय के दूध से पारण करें।

हे अर्जुन! अब मैं माघ मास के कृष्ण पक्ष की षट्तिला एकादशी व्रत की कथा सुनाता हूँ-

एक बार दालभ्य ऋषि ने पुलस्त्य ऋषि से पूछा- 'हे ऋषि श्रेष्ठ! मनुष्य मृत्युलोक में ब्रह्महत्या आदि महापाप करते हैं और दूसरे के धन की चोरी तथा दूसरे की उन्तति देखकर ईर्ष्या आदि करते हैं, ऐसे महान पाप मनुष्य क्रोध, ईर्ष्या, आवेग और मूर्खतावश करते हैं और बाद में शोक करते हैं कि हाय! यह हमने क्या किया! हे महामुनि! ऐसे मनुष्यों को नरक से बचाने का क्या उपाय है? कोई ऐसा उपाय बताने की कृपा करें, जिससे ऐसे मनुष्यों को नरक से बचाया जा सके अर्थात उन्हें नरक की प्राप्ति न हो। ऐसा कौन-सा दान-पुण्य है, जिसके प्रभाव से नरक की यातना से बचा जा सकता है, इन सभी प्रश्नों का हल आप कृपापूर्वक बताइए?'

दालभ्य ऋषि की बात सुन पुलत्स्य ऋषि ने कहा- 'हे मुनि श्रेष्ठ! आपने मुझसे अत्यंत गूढ़ प्रश्न पूछा है। इससे संसार में मनुष्यों का बहुत लाभ होगा। जिस रहस्य को इंद्र आदि देवता भी नहीं जानते, वह रहस्य मैं आपको अवश्य ही बताऊंगा। माघ मास आने पर मनुष्य को स्नान आदि से शुद्ध रहना चाहिए और इंद्रियों को वश में करके तथा काम, क्रोध, लोभ, मोह, ईर्ष्या तथा अहंकार आदि से सर्वथा बचना चाहिए।

पुष्य नक्षत्र में गोबर, कपास, तिल मिलाकर उपले बनाने चाहिए। इन उपलों से १०८ बार हवन करना चाहिए।

जिस दिन मूल नक्षत्र और एकादशी तिथि हो, तब अच्छे पुण्य देने वाले नियमों को ग्रहण करना चाहिए। स्नानादि नित्य कर्म से देवों के देव भगवान श्रीहरि का पूजन व कीर्तन करना चाहिए।

एकादशी के दिन उपवास करें तथा रात को जागरण और हवन करें। उसके दूसरे दिन धूप, दीप, नैवेद्य से भगवान श्रीहरि की पूजा-अर्चना करें तथा खिचड़ी का भोग लगाएं। उस दिन श्रीविष्णु को पेठा, नारियल, सीताफल या सुपारी सहित अर्घ्य अवश्य देना चाहिए, तदुपरांत उनकी स्तुति करनी चाहिए- 'हे जगदीश्वर! आप निराश्रितों को शरण देने वाले हैं। आप संसार में डूबे हुए का उद्धार करने वाले हैं। हे कमलनयन! हे मधुसूदन! हे जगन्नाथ! हे पुण्डरीकाक्ष! आप लक्ष्मीजी सहित मेरे इस तुच्छ अर्घ्य को स्वीकार कीजिए।' इसके पश्चात ब्राह्मण को जल से भरा घड़ा और तिल दान करने चाहिए। यदि सम्भव हो तो ब्राह्मण को गऊ और तिल दान देना चाहिए। इस प्रकार मनुष्य जितने तिलों का दान करता है। वह उतने ही सहस्र वर्ष स्वर्ग में वास करता है।

आचार्य सोहन वेदपाठी ने बताया है कि तिल का छह प्रकार से इस प्रकार प्रयोग करें।

1.तिल स्नान 

2. तिल की उबटन

3.तिलोदक

4.तिल का हवन

5.तिल का भोजन

6तिल का दान 

इस प्रकार छः रूपों में तिलों का प्रयोग षट्तिला कहलाती है। इससे अनेक प्रकार के पाप नष्ट हो जाते हैं। इतना कहकर पुलस्त्य ऋषि ने कहा- 'अब मैं एकादशी की कथा सुनाता हूँ-

एक बार नारद मुनि ने भगवान श्रीहरि से षटतिला एकादशी का माहात्म्य पूछा, वे बोले- 'हे प्रभु! आप मेरा प्रणाम स्वीकार करें। षटतिला एकादशी के उपवास का क्या पुण्य है? उसकी क्या कथा है, कृपा कर मुझसे कहिए।'

नारद की प्रार्थना सुन भगवान श्रीहरि ने कहा- 'हे नारद! मैं तुम्हें प्रत्यक्ष देखा सत्य वृत्तांत सुनाता हूँ, ध्यानपूर्वक श्रवण करो-

बहुत पहले मृत्युलोक में एक ब्राह्मणी रहती थी। वह सदा व्रत-उपवास किया करती थी। एक बार वह एक मास तक उपवास करती रही, इससे उसका शरीर बहुत कमजोर हो गया। वह अत्यंत बुद्धिमान थी। फिर उसने कभी भी देवताओं तथा ब्राह्मणों के निमित्त अन्नादि का दान नहीं किया। मैंने चिंतन किया कि इस ब्राह्मणी ने उपवास आदि से अपना शरीर तो पवित्र कर लिया है तथा इसको वैकुंठ लोक भी प्राप्त हो जाएगा, किंतु इसने कभी अन्नदान नहीं किया है, अन्न के बिना जीव की तृप्ति होना कठिन है। ऐसा चिंतन कर मैं मृत्युलोक में गया और उस ब्राह्मणी से अन्न की भिक्षा मांगी। इस पर उस ब्राह्मणी ने कहा-हे योगीराज! आप यहां किसलिए पधारे हैं? मैंने कहा- मुझे भिक्षा चाहिए। इस पर उसने मुझे एक मिट्टी का पिंड दे दिया। मैं उस पिंड को लेकर स्वर्ग लौट आया। कुछ समय व्यतीत होने पर वह ब्राह्मणी शरीर त्यागकर स्वर्ग आई। मिट्टी के पिंड के प्रभाव से उसे उस जगह एक आम वृक्ष सहित घर मिला, किंतु उसने उस घर को अन्य वस्तुओं से खाली पाया। वह घबराई हुई मेरे पास आई और बोली- 'हे प्रभु! मैंने अनेक व्रत आदि से आपका पूजन किया है, किंतु फिर भी मेरा घर वस्तुओं से रिक्त है, इसका क्या कारण है?'

मैंने कहा- 'तुम अपने घर जाओ और जब देव-स्त्रियां तुम्हें देखने आएं, तब तुम उनसे षटतिला एकादशी व्रत का माहात्म्य और उसका विधान पूछना, जब तक वह न बताएं, तब तक द्वार नहीं खोलना।'

प्रभु के ऐसे वचन सुन वह अपने घर गई और जब देव-स्त्रियां आईं और द्वार खोलने के लिए कहने लगीं, तब उस ब्राह्मणी ने कहा- 'यदि आप मुझे देखने आई हैं तो पहले मुझे षटतिला एकादशी का माहात्म्य बताएं।'

तब उनमें से एक देव-स्त्री ने कहा- 'यदि तुम्हारी यही इच्छा है तो ध्यानपूर्वक श्रवण करो- मैं तुमसे एकादशी व्रत और उसका माहात्म्य विधान सहित कहती हूं।'

जव उस देव-स्त्री ने षटतिला एकादशी का माहात्म्य सुना दिया, तब उस ब्राह्मणी ने द्वार खोल दिया। देव-स्त्रियों ने ब्राह्मणी को सब स्त्रियों से अलग पाया। उस ब्राह्मणी ने भी देव-स्त्रियों के कहे अनुसार षटतिला एकादशी का उपवास किया और उसके प्रभाव से उसका घर धन्य-धान्य से भर गया, अतः हे पार्थ! मनुष्यों को अज्ञान को त्यागकर षटतिला एकादशी का उपवास करना चाहिए। इस एकादशी व्रत के करने वाले को जन्म-जन्म की निरोगता प्राप्त हो जाती है। इस उपवास से मनुष्य के सभी पाप नष्ट हो जाते हैं।"

कथा-सार

इस उपवास को करने से जहां हमें शारीरिक पवित्रता और निरोगता प्राप्त होती है, वहीं अन्न, तिल आदि दान करने से धन-धान्य में बढ़ोत्तरी होती है। इससे यह भी सिद्ध होता है कि मनुष्य जो-जो और जैसा दान करता है, शरीर त्यागने के बाद उसे फल भी वैसा ही प्राप्त होता है, अतः धार्मिक कृत्यों के साथ-साथ हमें दान आदि अवश्य करना चाहिए। शास्त्रों में वर्णित है कि बिना दान किए कोई भी धार्मिक कार्य सम्पन्न नहीं होता।

आचार्य सोहन वेदपाठी, व्हाट्सएप्प नम्बर 9463405098

एकादशी व्रत में चावल एवं अन्न निषेध: एक शास्त्रीय और वैज्ञानिक विश्लेषण


(एकादशी व्रत और अन्न निषेध: शास्त्र, विज्ञान और आयुर्वेद का अद्भुत संगम)
जानिये एकादशी व्रत में चावल और अन्न खाने की मनाही क्यों है? क्या कहता है पद्म पुराण और आधुनिक विज्ञान? 
आचार्य सोहन वेदपाठी द्वारा विस्तृत विश्लेषण।
जय श्री हरि!
सनातन धर्म में एकादशी व्रत का स्थान सर्वोपरि है। इसे हरिवासर भी कहा जाता है। मेरे पास अक्सर जिज्ञासुओं और विद्यार्थियों के प्रश्न आते हैं कि "आखिर एकादशी के दिन चावल या अन्न का सेवन पूर्णतः वर्जित क्यों है?"
क्या यह केवल एक परंपरा है, या इसके पीछे कोई गहरा विज्ञान है? आज के इस लेख में, हम 'गोपथ ज्योतिष' के दृष्टिकोण से इसका शास्त्रीय, पौराणिक और वैज्ञानिक विश्लेषण करेंगे।

1. क्या कहते हैं हमारे शास्त्र? (पौराणिक आधार)
धर्मग्रंथों में स्पष्ट उल्लेख है कि एकादशी के दिन अन्न में 'पाप' का वास होता है। नारद पुराण और पद्म पुराण का यह श्लोक अत्यंत महत्वपूर्ण है:
|| यानि कानि च पापानि ब्रह्महत्यादिकानि च ||
|| अन्नमाश्रित्य तिष्ठन्ति सम्प्राप्ते हरिवासरे ||
भावार्थ: संसार के समस्त पाप (यहाँ तक कि ब्रह्महत्या जैसे महापाप भी) एकादशी (हरि वासर) के दिन अन्न में आश्रय लेकर स्थित हो जाते हैं। अतः जो व्यक्ति इस दिन अन्न ग्रहण करता है, वह भोजन नहीं, अपितु पापों का ही भक्षण करता है।
स्कंद पुराण में अन्न खाने के दुष्परिणामों का वर्णन करते हुए कठोर शब्दों में कहा गया है:
|| मातृहा पितृहा चैव भ्रातृहा गुरुहा तथा ||
|| एकादश्यां तु यो भुङ्क्ते विष्णुलोकाच्च च्यवते ||
भावार्थ: जो व्यक्ति एकादशी को अन्न खाता है, वह माता-पिता, भाई और गुरु की हत्या करने वाले के समान पाप का भागी होता है और विष्णुलोक से वंचित रह जाता है।
कथा प्रसंग: पौराणिक मान्यताओं के अनुसार, जब भगवान विष्णु ने 'मुरा' नामक दैत्य के वध हेतु अपने शरीर से एक शक्ति (एकादशी) को प्रकट किया, तो 'पाप पुरुष' ने भयभीत होकर भगवान से छिपने का स्थान माँगा। तब भगवान ने उसे एकादशी के दिन 'अन्न' में वास करने की अनुमति दी। यही कारण है कि इस दिन अन्न (विशेषकर चावल) खाना पाप को शरीर में प्रवेश देने के समान माना गया है।

2. विज्ञान क्या कहता है? (वैज्ञानिक कारण)
अक्सर युवा पीढ़ी तर्कों की मांग करती है। उनके लिए यह जानना आवश्यक है कि चावल का सीधा संबंध हमारे मन से है।
 * चंद्रमा और जल: ज्योतिष का सूत्र है 'चन्द्रमा मनसो जातः'
 चावल के निषेध का संबंध केवल धर्म से नहीं, बल्कि हमारे शरीर और मन की संरचना से भी है। चंद्रमा का जल पर गहरा प्रभाव होता है (जैसे समुद्र में ज्वार-भाटा)।
 * जल तत्व और चावल: चावल की खेती में अत्यधिक जल की आवश्यकता होती है और चावल में जल को धारण करने की क्षमता (Water Retention) सर्वाधिक होती है। हमारे शरीर में भी ७०% जल है।
 * मन की एकाग्रता: एकादशी तिथि पर चंद्रमा की स्थिति ऐसी होती है कि वायुमंडलीय दबाव और शरीर के जल तत्व में हलचल होती है। यदि हम चावल खाते हैं, तो शरीर में जल की मात्रा बढ़ती है, जिससे मन चंचल और अस्थिर हो जाता है। व्रत का उद्देश्य ईश्वर में ध्यान लगाना है, किन्तु चावल खाने से उत्पन्न आलस्य और मानसिक चंचलता इसमें बाधा उत्पन्न करती है।
3. आयुर्वेद और स्वास्थ्य (Health Benefits)
आयुर्वेद का स्वर्णिम सूत्र है— 'लंघनम् परमौषधम्' (उपवास ही परम औषधि है)। निरंतर कार्य करने से हमारे पाचन तंत्र को विश्राम की आवश्यकता होती है। अन्न पचने में भारी होता है, जबकि फलाहार सुपाच्य है। एकादशी पर अन्न त्यागने से शरीर के विषाक्त पदार्थ (Toxins) बाहर निकल जाते हैं और शरीर का शुद्धिकरण (Detoxification) होता है।

(निष्कर्ष / Conclusion)
एकादशी पर चावल न खाने का नियम हमें शारीरिक रूप से हल्का, मानसिक रूप से एकाग्र और आध्यात्मिक रूप से पवित्र बनाता है। यह केवल एक निषेध नहीं, बल्कि आत्म-नियंत्रण और सात्विकता की ओर बढ़ाया गया एक महत्वपूर्ण कदम है।

प्रिय पाठकों/विद्यार्थियों !
क्या आप भी एकादशी का व्रत रखते हैं? अपने अनुभव या प्रश्न नीचे कमेंट बॉक्स में अवश्य लिखें। यदि यह जानकारी आपको ज्ञानवर्धक लगी हो, तो इसे अपने परिजनों के साथ शेयर करना न भूलें।
 आचार्य सोहन वेदपाठी
(लेखक एवं शोधकर्ता: गोपथ ज्योतिष पद्धति) ज्योतिष सीखने के लिये 9463405098 पर संपर्क करें।

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मकर संक्रांति और एकादशी साथ में होने पर खिचड़ी की व्यवस्था

शंका - संक्रांति (14 जनवरी 2026) को खिचड़ी दान का विशेष महत्व एवं परंपरा है। जबकि एकादशी को अन्न खाने वाला एवं दान देने वाला दोनों ही पाप (नरक) का भागी होता है। जब संक्रांति को ही एकादशी भी उपस्थित हो जाए तो इस परिस्थिति में क्या करें ?

समाधान - संकल्प विधि (मानसिक दान) ही श्रेष्ठ है।

​एकादशी होने के कारण इस बार संक्रांति में खिचड़ी का विधान त्याज्य होगा। खिचड़ी दान या सेवन पुण्य का कार्य है, जबकि एकादशी में अन्न भक्षण पाप का कारण बनता है। पुण्य भले ही न हो, लेकिन पाप कर्म से बचना चाहिये। यदि आप बहुत कड़े नियमों का पालन करते हैं और एकादशी को अन्न छूना भी नहीं चाहते, तो आप 'संकल्प विधि' अपना सकते हैं:
​संक्रांति (एकादशी) के दिन हाथ में जल लेकर खिचड़ी दान (एक दिन पहले ही ​सामग्री को अलग निकाल कर रख दें।) करने का 'संकल्प' लें।

​अगले दिन (द्वादशी को) सूर्योदय के बाद उस सामग्री को ब्राह्मण को प्रदान कर दें। शास्त्र कहते हैं कि संकल्प जिस समय किया गया, पुण्य उसी समय का माना जाता है।

ध्यान दें - जहाँ पुण्यकाल 15 जनवरी को होगा। वहाँ तो कोई विवाद ही नहीं है।

Tuesday, 26 August 2025

हरितालिका (तीज) व्रत

 26 अगस्त 2025 को हरितालिका तीज का व्रत है ।

              कब और कहाँ किया जाता है? 

हरितालिका तीज का व्रत भाद्रपद मास के शुक्ल पक्ष की तृतीया तिथि को मनाया जाता है। हिंदी भाषी राज्यों में यह बहुलता से किया जाने वाला कठिन निर्जल व्रत है।

प्रयोजन- सुहागन अपने अखण्ड सौभाग्य की रक्षा हेतु शिवपार्वती की पूजा कर व्रत रखतीं है। कुंवारी कन्यायें यह व्रत अच्छा घर वर प्राप्त करने हेतु रखती हैं ।

 इस दिन भगवान शंकर की पार्थिवलिंग बनाकर पूजन किया जाता है और नाना प्रकार के मंगल गीतों से रात्रि जागरण किया जाता है।

   इस निर्जला कठिन व्रतानुष्ठान को हरितालिका इसलिये कहते हैं कि पार्वती की सखी उन्हें पिता के घर से हर कर घनघोर जंगल में ले गईं थीं। हरित (हरण करना) अलिका (अर्थात् सखी, सहेली) के द्वारा पार्वती का हरण किया गया था।

 शंकरजी ने पार्वती को वरदान देने के पश्चात् यह भी कहा था कि - जो स्त्री या कुवांरी इस व्रत को श्रद्धा से करेगी, उसे तुम्हारे समान अचल सुहाग प्राप्त होगा।

   यदि इस दिन कुवांरी कन्या रात्रि जागरण में शिव- पार्वती विवाह का पाठ-परायण करे अथवा पार्वती मंगल स्तोत्र का पाठ करे तो श्रेष्ठ घर एवं वर की प्राप्ति होती है ।

                             व्रतकथा

 श्री परम पावनभूमि कैलाश पर्वत पर विशाल वट वृक्ष के नीचे भगवान शिव पार्वती सभी गणों सहित बाघम्बर पर विराजमान थे। बलभद्र, वीरभद्र, भृंगी, श्रृंगी, नन्दी, अपने पहरों पर सदाशिव के दरबार की शोभा बढा रहे थे। गन्धर्वगण, किन्नर एवं ऋषिगण भगवान शिव की अनुष्टुपछन्दों से स्तुति गान में संलग्न थे, उसी सुअवसर पर देवी पार्वतीजी ने भगवान शंकर से दोंनो हाथ जोड प्रश्न किया , हे! महेश्वर मेरे बडे सौभाग्य हैं जो मैने आप सरीखे पति का वरण किया , क्या मैं जान सकती हूं कि मैंने कौन सा ऐसा पुण्य अर्जन किया है ? आप अन्तर्यामी हैं, मुझको बताने की कृपा करें ।

पार्वती जी की ऐसी प्रार्थना सुनने पर शिवजी बोले हे वरानने! तुमने अति उत्तम पुण्य का संग्रह किया था, जिससे मुझे प्राप्त किया है वह अति गुप्त है किन्तु तुम्हारे आग्रह पर प्रकट करता हूँ।

इसकी कथा है जो उस रात्रि कही जाती है। जैसे तारागणों में चन्द्रमा, नवग्रहों में सूर्य, वर्णों में ब्राह्मण, नदियों में गंगा, पुराणों में महाभारत, वेदों में सामवेद, इन्द्रियों में मन श्रेष्ठ है, वैसे ही व्रतों में यह व्रत श्रेष्ठ है । व्रती आज स्नान करके व्रत का संकल्प एवं सात्विक भोजन करेंगी। फिर कल 21 अगस्त को दिन के चारो प्रहर व रात्रि के चारो प्रहर शिवपूजन कर होम करतीं है रात्रि जागरण कर शिव जप , भजन आदि करती हैं फिर तीसरे दिन प्रातः फूलहरा ( सजाया गया मंडप) व पार्थिव या रेणुका के शिव लिंग का विसर्जन कर व्रत खोलती हैं।

                          मंगलाकांक्षी   

आचार्य सोहन वेदपाठी 9463405098  https://www.facebook.com/acharyag1001

ऋषिपंचमी का महत्व एवं व्रत विधि

28 अगस्त 2025, बृहस्पतिवार को ऋषिपंचमी का व्रत है। मध्याह्नकाल में इस व्रत का पूजन करना चाहिये।

ऋषिपंचमी व्रत का उद्देश्य - महिलाये जब माहवारी (mc) से होती हैं तब गलती से कभी मंदिर में चली जाती हैं या कभी पूजा हो वहाँ चली जाती हैं , परपुरुषगमन, व्यभिचार, विवाहपूर्व संबंध हो तो उसका दोष लगता हैं ।उन सभी पापों से छुटकारा पाने के लिए यह व्रत स्त्रियों द्वारा किया जाना चाहिये। आजकल जब पुरुष भी इस व्रत को करते हैं तो वैदिक मन्त्रों का पाठ होता है, ब्रह्मचर्य का पालन किया जाता है। इसके करने से सभी पापों एवं तीनों प्रकार के दु:खों से छुटकारा मिलता है तथा सौभाग्य की वृद्धि होती है। जब नारी इसे सम्पादित करती है तो उसे आनन्द, शरीर-सौन्दर्य , पुत्रों एवं पौत्रों की प्राप्ति होती है।

विशेष - वैसे तो यह व्रत स्त्रियों को आजीवन निर्बाधरूप से करना चाहिये। लेकिन कई वर्ष व्रत के दिन माहवारी आ जाने के कारण व्रत नही कर सकते है। इस अवस्था में व्रत छोड़ना पड़ता है। अतः लगभग 45 से 50 वर्ष की अवस्था के बाद जब माहवारी से निवृति ( Menopause ) हो जाये तब पति-पत्नी दोनों ही इस व्रत को लगातार सात वर्षों तक करें एवं आठवें वर्ष इसका उद्यापन करें।

पश्चात्कालीन निबन्ध व्रतार्क, व्रतराज आदि ने भविष्योत्तर से उद्धृत कर बहुत-सी बातें लिखी हैं, जहाँ कृष्ण द्वारा युधिष्ठिर को सुनायी गयी एक कथा भी है। जब इन्द्र ने त्वष्टा के पुत्र वृत्र का हनन किया तो उन्हें ब्रह्महत्या का अपराध लगा। उस पाप को चार स्थानों में बाँटा गया, यथा अग्नि (धूम से मिश्रित प्रथम ज्वाला), नदियों (वर्षाकाल के पंकिल (कीचड़ युक्त ) जल), पर्वतों (जहाँ गोंद वाले वृक्ष उगते हैं) में तथा स्त्रियों (रजस्वला) में। अत: मासिक धर्म के समय लगे पाप से छुटकारा पाने के लिए यह व्रत स्त्रियों द्वारा किया जाना चाहिये।

निषेध--
इस व्रत में केवल शाकों का प्रयोग होता है । व्रतराज के मत से इस व्रत में केवल शाकों या नीवारों या साँवा (श्यामाक) या कन्द-मूलों या फलों का सेवन करना चाहिए तथा हल से उत्पन्न किया हुआ अन्न नहीं खाना चाहिये ।

कब करें -
ऋषि पञ्चमी का व्रत भाद्रपद के  शुक्ल पक्षकी पंचमी को किया जाता है। ऋषिपंचमी व्रत चतुर्थी से संयुक्त पंचमी को किया जाता है न कि षष्ठीयुक्त पंचमी को।

व्रत एवं पूजन की विधि

व्रती को नदी आदि में स्नान ( स्नान करते समय अपामार्ग के आठ पत्ते लेकर एक - एक करके हथेली पर रगड़ें एवं अपने बालों पर लगाकर स्नान करना चाहिये । इसी प्रकार अरुंधति सहित सातों ऋषियों का ध्यान करते हुये आठ बार स्नान करने चाहिये। ) तथा दैनिक कृत्य करने के उपरान्त व्रत का संकल्प करें , जो इस प्रकार है --

तिथ्यादि - नाम - गोत्र आदि का उच्चारण करने के बाद इस प्रकार से बोलें -

अहं ज्ञानतोऽज्ञानतो वा रजस्वलावस्थायां कृतसंपर्कजनितदोषपरिहारार्थमृषिपञ्चमीव्रतं करिष्ये।

ऐसा संकल्प करके अरून्धती के साथ सप्तर्षियों की पूजा करनी चाहिये ।
सातों ऋषियों (कश्यप, अत्रि भरद्वाज, विश्वामित्र, गौतम, जमदग्नि एवं वसिष्ठ-इन सात ऋषियों एवं वसिष्ठ पत्नी अरुंधति) की प्रतिमाओं को पंचामृत से स्नान कराकर उन पर चन्दन , पुष्पों, सुगन्धित पदार्थों, धूप, दीप, श्वेत वस्त्रों, यज्ञोपवीतों, अधिक मात्रा में नैवेद्य से पूजा करनी चाहिए और मन्त्रों के साथ अर्ध्य चढ़ाना चाहिये।
अर्ध्यमन्त्र
सप्त ऋषि के लिये -
कश्यपोSत्रिर्भरद्वाजो विश्वामित्रोय गौतम:। 
जमदग्निर्वसिष्ठश्च सप्तैते ऋषय: स्मृता:॥
गृह्णन्त्वर्ध्य मया दत्तं तुष्टा भवत मे सदा॥

अरून्धती के लिए भी मन्त्र है—

अत्रेर्यथानसूया स्याद् वसिष्ठस्याप्यरून्धती। कौशिकस्य यथा सती तथा त्वमपि भर्तरि॥ 

व्रत की कथा---

इसकी दो कथा प्रसिद्ध है

सौजन्य - आचार्य सोहन वेदपाठी
मोबाइल : 9463405098

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पहली कथा---

ऋषिपंचमी की कथा

सतयुग में विदर्भ नगरी में श्येनजित नामक राजा हुए थे। वह ऋषियों के समान थे। उन्हीं के राज में एक कृषक सुमित्र था। उसकी पत्नी जयश्री अत्यंत  पतिव्रता थी। 
एक समय वर्षा ऋतु में जब उसकी पत्नी खेती के कामों में लगी हुई थी, तो वह रजस्वला हो गई। उसको रजस्वला होने का पता लग गया फिर भी वह घर के कामों में लगी रही। कुछ समय बाद वह दोनों स्त्री-पुरुष अपनी-अपनी आयु भोगकर मृत्यु को प्राप्त हुए। जयश्री तो कुटिया बनीं और सुमित्र को रजस्वला स्त्री के सम्पर्क में आने के कारण बैल की योनी मिली, क्योंकि ऋतु दोष के अतिरिक्त इन दोनों का कोई अपराध नहीं था। इसी कारण इन दोनों को अपने पूर्व जन्म का समस्त विवरण याद रहा। वे दोनों कुतिया और बैल के रूप में उसी नगर में अपने बेटे सुचित्र के यहां रहने लगे। धर्मात्मा सुचित्र अपने अतिथियों का पूर्ण सत्कार करता था। अपने पिता के श्राद्ध के दिन उसने अपने घर ब्राह्मणों को भोजन के लिए नाना प्रकार के भोजन बनवाए। 
जब उसकी स्त्री किसी काम के लिए रसोई से बाहर गई हुई थी तो एक सर्प ने रसोई की खीर के बर्तन में विष वमन कर दिया । कुतिया के रूप में सुचित्र की मां कुछ दूर से सब देख रही थी। पुत्र की बहू के आने पर उसने पुत्र को ब्रह्महत्या के पाप से बचाने के लिए उस बर्तन में मुंह डाल दिया। सुचित्र की पत्नी चन्द्रवती से कुतिया का यह कृत्य देखा न गया और उसने चूल्हे में से जलती लकड़ी निकाल कर कुतिया को मारी। बेचारी कुतिया मार खाकर इधर-उधर भागने लगी। चौके में जो झूठन आदि बची रहती थी, वह सब सुचित्र की बहू उस कुतिया को डाल देती थी, लेकिन क्रोध के कारण उसने वह भी बाहर फिकवा दी। सब खाने का सामान फिकवा कर बर्तन साफ करके दोबारा खाना बना कर ब्राह्मणों को खिलाया।  
   रात्रि के समय भूख से व्याकुल होकर वह कुतिया बैल के रूप में रह रहे अपने पूर्व पति के पास आकर बोली, हे स्वामी! आज तो मैं भूख से मरी जा रही हूं। वैसे तो मेरा पुत्र मुझे रोज खाने को देता था, लेकिन आज मुझे मारा और खाने को कुछ भी नहीं दिया।  

तब वह बैल बोला, हे भद्रे! तेरे पापों के कारण तो मैं भी इस योनी में आ पड़ा हूं और आज बोझा ढ़ोते-ढ़ोते मेरी कमर टूट गई है। आज मैं भी खेत में दिनभर हल में जुता रहा। मेरे पुत्र ने आज मुझे भी भोजन नहीं दिया और मुझे मारा भी बहुत। मुझे इस प्रकार कष्ट देकर उसने इस श्राद्ध को निष्फल कर दिया।  
    अपने माता-पिता की इन बातों को सुचित्र सुन रहा था, उसने उसी समय दोनों को भरपेट भोजन कराया और फिर उनके दुख से दुखी होकर वन की ओर चला गया। वन में जाकर ऋषियों से पूछा कि मेरे माता-पिता किन कर्मों के कारण इन नीची योनियों को प्राप्त हुए हैं और अब किस प्रकार से इनको छुटकारा मिल सकता है। तब सर्वतमा ऋषि बोले तुम इनकी मुक्ति के लिए पत्नीसहित ऋषि पंचमी का व्रत धारण करो तथा उसका फल अपने माता-पिता को दो।
  भाद्रपद महीने की शुक्ल पंचमी को मुख शुद्ध करके मध्याह्न में नदी के पवित्र जल में स्नान करना और नए रेशमी कपड़े पहनकर अरूधन्ती सहित सप्तऋषियों का पूजन करना। इतना सुनकर सुचित्र अपने घर लौट आया और अपनी पत्नीसहित विधि-विधान से पूजन व्रत किया। उसके पुण्य से माता-पिता दोनों पशु योनियों से छूट गए। इसलिए जो महिला श्रद्धापूर्वक ऋषि पंचमी का व्रत करती है, वह समस्त सांसारिक सुखों को भोग कर बैकुंठ को जाती है।

सौजन्य - आचार्य सोहन वेदपाठी
मोबाइल : 9463405098

दूसरी कथा-- एक समय  विदर्भ  देश में उत्तक नाम का ब्राह्मण  अपनी पतिव्रता पत्नी के साथ निवास करता था। उसके परिवार में एक पुत्र व एक पुत्री थी। पुत्र का नाम 'सुविभूषण' था जो बहुत बुद्धि वाला था। राजा ने अपनी पुत्री का विवाहअच्छे ब्राह्मण के साथ कर दिया था। भगवान की कृपा से ऐसा विधान बना कि पुत्री विधवा हो गयी। अपने धर्म के साथ वह अपने पिता के घर ही रहने लगी। अपनी कन्या को दु:खी देखकर उत्तक अपने पुत्र को घर पर छोड़कर अपनी स्त्री व पुत्री को लेकर गंगा किनारे आश्रम बनाकर रहने लगे। कन्या अपने माता-पिता की सेवा करने लगी। एक दिन काम करके थक कर कन्या एक पत्थर की शिला पर आराम करने लेट गई। आधी रात में उसके शरीर में कीड़े उत्पन्न हो गये। अपनी कन्या के शरीर पर कीड़े देखकर ब्राह्मणी बहुत विलाप करके रोती रही और बेहोश हो गयी। होश आने पर कन्या को उठाकर उत्तक ऋषि के पास ले गई और कहने लगी कि इसकी हालत ऐसी क्यों हो गई? ब्राह्मणी की बात सुनकर उत्तक अपने नेत्रों को बन्द करके ध्यान लगाकर कहने लगे कि हमारी कन्या पूर्व जन्म में ब्राह्मणी थी। इसने एक बार रजस्वला होने पर घर के सब बर्तन आदि छू लिये थे। बस इसी पाप के कारण इसके शरीर पर कीड़े पड़ गये हैं। शास्त्रों के अनुसार रजस्वला स्त्री पहले दिन चान्डालनी दूसरे दिन ब्रह्म हत्यारनी तीसरे दिन पवित्र धोबिन के समान होती है और चौथे दिन वह स्नान करने के पश्चात् शुद्ध हो जाती है। शुद्ध होने के बाद भी इसने अपनी सखियों के साथ ऋषि पंचमी का व्रत देखकर रुचि नहीं ली। व्रत के दर्शन मात्र से ही इसे ब्राह्मण कुल प्राप्त हुआ। लेकिन इसके तिरस्कार करने से इसके शरीर में कीड़े पड़ गये। ब्राह्मणी ने कहा ऐसे आश्चर्य व्रत को आप कृपा करके मुझे अवश्य बतायें। यह कथा श्री कृष्ण ने युधिष्ठरको सुनाई थी। जो स्त्री रजस्वला होकर भी घर के कामों को करती है वह अवश्य ही नरक में जाती है।

उद्यापन की विधि--

यह व्रत सात वर्षों का होता है।सप्तर्षि सहित नवग्रहादि पूजन किया जाता है। सात घड़े होते हैं और सात ब्राह्मण निमन्त्रित रहते हैं, जिन्हें अन्त में ऋषियों की सातों प्रतिमाएँ (सोने या चाँदी की) दान में दे दी जाती हैं। यदि सभी प्रतिमाएँ एक ही कलश में रखी गयी हों तो वह कलश एक ब्राह्मण को तथा अन्यों को कलशों के साथ वस्त्र एवं दक्षिणा दी जाती है।