बुधवार, 25 फ़रवरी 2026

चन्द्रग्रहण 3 मार्च 2026 का पूर्ण विवरण

🌑 खग्रास चन्द्रग्रहण 2026: तिथि, सूतक काल और शास्त्रोक्त नियम 🌑
आगामी 3 मार्च 2026, मंगलवार को खग्रास चन्द्रग्रहण लगने जा रहा है। वैदिक ज्योतिष और धर्मशास्त्रों में ग्रहण का विशेष महत्व बताया गया है। इस दौरान सूतक काल, स्नान, दान और पूजा-पाठ से जुड़े कई नियम होते हैं जिनका पालन करना कल्याणकारी माना जाता है।
आइए जानते हैं ग्रहण का समय, सूतक काल और इस दौरान किन नियमों का पालन करना चाहिए।
⏰ लुधियाना में ग्रहण और सूतक का समय (Time Table)
सूतक प्रारंभ - 06:26 प्रातः से।
ग्रहण प्रारंभ - 06:26 सायंकाल से।
ग्रहण समाप्ति - 06:47 सायंकाल पर।
विशेष ध्यान दें: जहाँ ग्रहण दृश्य नहीं होता (दिखाई नहीं देता), वहाँ उसका पुण्यकाल, सूतक तथा अन्य नियम मान्य नहीं होते हैं।
📢 मंदिर दर्शन और शुद्धिकरण (स्थानीय निर्देश)
 * मंदिर दर्शन: सुबह दर्शन के लिये मन्दिर केवल 6:00 बजे तक ही खुला रहेगा। क्योंकि उसके बाद का कुछ समय स्वयं के तैयारी के लिये चाहिये होता है।
 * भगवान का स्नान व भोग: सायंकाल 6:47 पर ग्रहण समाप्त होने के बाद, श्रद्धालुओं को स्वयं स्नानादि करने के पश्चात् ही भगवान के स्नान एवं भोग आदि की व्यवस्था करनी चाहिए।
 * सिद्धपीठ दण्डी स्वामी मन्दिर (लुधियाना): यहाँ दर्शन रात्रि 7:45 से 8:00 बजे तक ही उपलब्ध होंगे।
🌿 सूतक एवं ग्रहण काल के महत्वपूर्ण नियम - 
ग्रहण के समय हमारे ऋषि-मुनियों ने कुछ विशेष नियम बताए हैं, जिनका वैज्ञानिक और आध्यात्मिक दोनों महत्व है:

​🌒 सूतक निर्णय एवं विशेष शास्त्रोक्त नियम

​सूतक और ग्रहण के स्पर्श व समाप्ति को लेकर शास्त्रों में स्पष्ट निर्देश दिए गए हैं:

  • सूतक काल का आरंभ: सामान्यतः सूर्यग्रहण का सूतक चार प्रहर और चन्द्रग्रहण का सूतक तीन प्रहर पहले प्रारम्भ हो जाता है। यह सामान्य नियम है।
  • ग्रस्तोदय ग्रहण के नियम: ग्रस्तोदय ग्रहण (जब ग्रहण लगा हुआ ही उदित हो) में उदयकाल (सूर्योदय या चन्द्रोदय) को ही ग्रहण का स्पर्शकाल मानकर देवार्चन, होम, जप और दानादि करना चाहिये।
  • ग्रस्तास्त ग्रहण के नियम: ग्रस्तास्त ग्रहण (जब ग्रहण लगा हुआ ही अस्त हो) में अस्तकाल (सूर्यास्त या चन्द्रास्त) ही ग्रहण पर्व का समाप्ति काल होता है। लेकिन ऐसे में अगले दिन शुद्ध बिम्ब को देखकर ही भोजनादि करना चाहिए।
  • विशेष नियम: ग्रस्तोदय एवं ग्रस्तास्त ग्रहण में उदय एवं अस्त से चार प्रहर पहले ही (सूर्य/चन्द्रग्रहण दोनों के लिए) सूतक प्रारम्भ हो जाता है।
 * कर्तव्य: ग्रहण के प्रारम्भ में स्नान करके जप-हवन करें। ग्रहण के मध्य में दान और समाप्ति पर सचैल (वस्त्रों सहित) स्नान करना चाहिए।
 * तीर्थ स्नान: ग्रहण के समय विशेषकर गंगा, कनखल (हरिद्वार), प्रयाग (त्रिवेणी), पुष्कर और कुरुक्षेत्र में स्नान करने से विशेष पुण्य की प्राप्ति होती है।
 * महिलाओं के लिए नियम: सौभाग्यवती स्त्रियाँ सिर के ऊपर से स्नान न करें (अशिरः स्नान)। रजस्वला स्त्रियाँ तीर्थ में स्नान न करें, वे केवल तीर्थ का स्मरण करें या अलग पात्र में जल लेकर स्नान करें।
 * निषेध: ग्रहण के समय गर्म पानी (ऊष्णोदक) से स्नान निषिद्ध है। इसके अलावा ग्रहण के पर्वकाल में सोना, खाना, पीना, तेल मालिश (तैलमर्दन), मैथुन और शौचादि वर्जित माने गए हैं।
🍛 भोजन और खाद्य पदार्थों की शुद्धि
 * क्या न खाएं: ग्रहण में पका हुआ अन्न, कटी हुई सब्जी व फल दूषित हो जाते हैं, अतः इनका सेवन नहीं करना चाहिए।
 * कुशा और तिल का प्रयोग: तेल या घी में पका अन्न, दूध, दही, लस्सी, पनीर, अचार, चटनी, सिरका और मुरब्बा में यदि तिल या कुशा रख दी जाए, तो वे ग्रहण काल में दूषित नहीं होते। सूखे खाद्य-पदार्थों में तिल या कुशा डालने की आवश्यकता नहीं होती।
🕉️ व्रत, पर्व और श्राद्ध के अनुष्ठान कैसे करें?
 * व्रत-पर्व पर प्रभाव: उपाकर्म को छोड़कर शेष किसी भी व्रत-पर्व (जैसे सत्यनारायण व्रत, अमावस्या/पूर्णिमा स्नान-दान, नवरात्रि, दीपावली आदि) के अनुष्ठान पर सूर्य या चन्द्रग्रहण का कोई प्रभाव नहीं पड़ता।
 * पूजा का नियम: यदि अनुष्ठान काल में ग्रहण या सूतक लगा हो, तो स्नान करके पूजा करनी चाहिए, लेकिन वहां पके हुए भोजन (पकवान) का प्रयोग न करें।
 * पारण: ग्रहण के सूतक एवं ग्रहण काल में व्रत का पारणा नहीं करना चाहिए।
 * श्राद्ध कर्म: यदि श्राद्ध के दिन ग्रहण पड़ जाए, तो आमंत्रित ब्राह्मण को श्राद्ध के विहित काल में दक्षिणा सहित अपक्वान्न (बिना पका हुआ अन्न या सूखा सीधा) ही दें। इसे देने से पहले श्राद्धकर्ता को स्नान अवश्य कर लेना चाहिए।
🤰 विशेष सावधानियां
 * गर्भवती महिलाओं के लिए: गर्भिणी स्त्रियों को सूर्य एवं चन्द्र, दोनों ही ग्रहण नहीं देखने चाहिए।
 * गृहस्थों के लिए उपवास का नियम: गृहस्थों को ग्रहण वाले दिन उपवास का निषेध है। फिर भी यदि वे व्रत रखना चाहें, तो व्रत संकल्प से पहले थोड़ा सा तिल या फल खा लें, या जल/दूध पी लें। ऐसा करने से उपवास निषेध का दोष नहीं लगता और व्रत का पूर्ण फल मिलता है:
> "उपवासनिषेधे तु भक्ष्यं किंचित्प्रकल्पयेत्। न दुष्यत्युपवासेन उपवासफलं लभेत् ।।"
ध्यान दें : ग्रहण सूतक एवं पर्वकाल में किसी भी नये व्रत का आरंभ और उद्यापन निषिद्ध है।
✍️ आलेख एवं मार्गदर्शन:
आचार्य सोहन वेदपाठी, लुधियाना (पंजाब)
सम्पर्क सूत्र: 9463405098

कोई टिप्पणी नहीं:

एक टिप्पणी भेजें