मंगलवार, 7 जुलाई 2026

गोपथ ज्योतिष पद्धति के अनुसार अष्टम भाव और भावनात्मक ऊर्जा का ह्रास -

गोपथ पद्धति के अनुसार अष्टम भाव और भावनात्मक ऊर्जा का ह्रास -

अष्टम भाव केवल आयु या मृत्यु का नहीं है, बल्कि यह उर्जा के रूपांतरण और मानसिक अवसाद का भी केंद्र है। जब व्यक्ति मानसिक रूप से टूटता है, तो उसका पहला प्रभाव उसकी चेतना और निद्रा चक्र पर पड़ता है।

1. उच्च से सप्तम - कोई भी ग्रह अपने उच्च भाव से सप्तम (सामने) वाले भाव में जाने पर अपनी सहज सकारात्मक ऊर्जा को विपरीत दिशा में प्रवाहित करने लगता है। चंद्रमा वृष राशि (द्वितीय भाव - ऊर्जा, संचय) में उच्च का होता है। यहाँ से ठीक सप्तम यानी वृश्चिक (अष्टम भाव) में वह नीच का हो जाता है। उच्च अवस्था व्यक्ति को आत्मनिर्भर और ऊर्जावान बनाती है (लग्न जागृत)। इसके विपरीत, अष्टम में जाने पर सप्तम भाव (दूसरों पर निर्भरता, सामाजिक अपेक्षाएं) जागृत हो जाता है और लग्न (स्वयं का अस्तित्व, शारीरिक बल) सुप्त हो जाता है। जब लग्न सुप्त हो जाता है, तो जीवनी शक्ति समाप्त हो जाती है और व्यक्ति वास्तविकता से बचने के लिए निद्रा का सहारा लेता है।

2. चंद्रमा का नीचत्व और भावनात्मक पलायन - वृश्चिक राशि कालपुरुष के गुप्त अंगों और स्थिर जल को दर्शाती है। चंद्रमा यहाँ आकर भावनाओं के इसी दलदल में फंस जाता है। जब मन (चंद्रमा) अनसुलझे दर्द या तनाव से थक जाता है, तो शरीर तामसिक प्रवृत्ति (आलस्य और अत्यधिक नींद) को एक सुरक्षा कवच के रूप में चुनता है। इसे आलस्य कहना भूल होगी, यह वास्तव में "भावनात्मक थकावट" है।

3. पराक्रम का अभाव होने पर ही दुर्भाग्य का आविर्भाव होता है। एक पौराणिक सम्बद्ध सूत्र देखिये  “नाभिषेको न संस्कारः सिंहस्य क्रियते वने। विक्रमार्जितसत्त्वस्य स्वयमेव मृगेन्द्रता॥” और “नहि सुप्तस्य सिंहस्य प्रविशन्ति मुखे मृगाः॥”

अष्टम भाव भाग्य (नवम भाव) का व्यय (बारहवां) स्थान है। जब व्यक्ति अष्टम के प्रभाव में आकर पुरुषार्थ खो देता है और केवल दूसरों से (सप्तम भाव) उम्मीदें लगाने लगता है, तो उसका पराक्रम शून्य हो जाता है। पराक्रम के बिना नवम भाव (भाग्य और विवेक) का उदय संभव नहीं है। यही कारण है कि अष्टम भाव को दुर्भाग्य का कारक माना गया है, क्योंकि यह व्यक्ति को कर्महीन बनाकर भाग्य के मार्ग को अवरुद्ध कर देता है।
व्यावहारिक समाधान - इस अवस्था से बाहर निकलने के लिए केवल शारीरिक सक्रियता पर्याप्त नहीं है, बल्कि चंद्रमा (मन) के स्तर पर उपचार आवश्यक है। 
यथा - आत्म-निर्भरता को पुनः प्राप्त करने के लिए व्यक्ति को अपनी चेतना को स्वयं पर केंद्रित करना होगा (सप्तम भाव की उम्मीदों को छोड़ना होगा)। मानसिक ठहराव के लिए ध्यान, जल का सही उपयोग और शिव आराधना, जो चंद्रमा के विष को सोखने की क्षमता रखती है।
आचार्य सोहन वेदपाठी, लुधियाना 

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