सोमवार, 20 अप्रैल 2026

2026 का परिसीमन: भारतीय राजनीति का वो 'टाइम बम' जिसकी टिक-टिक शुरू हो चुकी है।

2026 का परिसीमन: भारतीय राजनीति का वो 'टाइम बम' जिसकी टिक-टिक शुरू हो चुकी है।
भारतीय लोकतंत्र के इतिहास में कुछ तारीखें ऐसी हैं जो केवल सत्ता परिवर्तन नहीं, बल्कि सत्ता की पूरी धुरी ही बदल देती हैं। वर्ष 2026 एक ऐसी ही दहलीज है। राजनैतिक गलियारों में इसे 'टाइम बम' कहा जा रहा है, जिसकी सुई संविधान के अनुच्छेद 81 और परिसीमन (Delimitation) की उस प्रक्रिया पर टिकी है जो पिछले कई दशकों से 'फ्रीज' थी।
 1. संवैधानिक पाबंदी का इतिहास: क्यों रुकी थी सुई?
लोकतंत्र का सामान्य सिद्धांत है—'एक व्यक्ति, एक वोट'। इसी आधार पर हर 10 साल की जनगणना के बाद सीटों का पुनर्गठन होना चाहिए। लेकिन 1970 के दशक में एक बड़ा संकट खड़ा हुआ:
 जनसंख्या का गणित: उत्तर भारतीय राज्यों में जनसंख्या तेजी से बढ़ रही थी, जबकि दक्षिण भारतीय राज्यों ने परिवार नियोजन को सफलतापूर्वक अपनाया।
 राजनैतिक दंड: यदि जनसंख्या के आधार पर सीटें बढ़तीं, तो दक्षिण के राज्यों का प्रतिनिधित्व कम हो जाता।
 इमरजेंसी का फैसला: 1976 में 42वें संशोधन  द्वारा सीटों की संख्या को 1971 की जनगणना के आधार पर साल 2000 तक के लिए रोक दिया गया। बाद में, अटल बिहारी वाजपेयी सरकार ने 84वें संशोधन के जरिए इस अवधि को 2026 तक बढ़ा दिया।
 2. 2026 के बाद क्या बदलेगा?
जैसे ही 2026 का कैलेंडर पलटेगा, सीटों की संख्या पर लगी यह संवैधानिक पाबंदी हट जाएगी। इसके बाद भारत का राजनैतिक मानचित्र कुछ इस प्रकार बदलेगा:
 लोकसभा का विस्तार:  वर्तमान में लोकसभा की 543 सीटें हैं। विशेषज्ञों का अनुमान है कि परिसीमन के बाद यह संख्या 800 से 850 तक पहुँच सकती है। नया संसद भवन इसी भविष्य की तैयारी का जीवंत उदाहरण है।
 उत्तर बनाम दक्षिण: परिसीमन के बाद उत्तर प्रदेश, बिहार, राजस्थान और मध्य प्रदेश जैसे राज्यों में सीटों का 'सैलाब' आएगा, जबकि दक्षिण भारतीय राज्यों का सापेक्षिक प्रभाव कम हो सकता है।
 3. शकुनि की बिसात और धृतराष्ट्र का मोह
राजनैतिक विश्लेषकों का मानना है कि विपक्ष इस पूरे घटनाक्रम में 'दृष्टिहीनता' का शिकार रहा है। सरकार ने जब 'सीट वृद्धि' के प्रस्ताव दिए, तो वह एक संधि का हाथ था। लेकिन श्रेय न देने की जिद और 'राहुल-मोह' की जंजीरों में बंधे पुराने नेताओं ने दूरगामी अनर्थ को अनदेखा कर दिया।
 "बिनय न मानत जलधि जड़, गए तीनि दिन बीति।
बोले राम सकोप तब, भय बिनु होइ न पीति॥"

विपक्ष ने जब प्रस्ताव (विनय) को अहंकार वश ठुकराया, तो अब 2026 में 'संवैधानिक कोप' यानी अनुच्छेद 81 का सीधा प्रभाव तय है।
 4. क्षेत्रीय क्षत्रपों का भविष्य: सूखे में खड़ी रियासतें?
2026 के बाद जब जनसंख्या के आधार पर सीटें आवंटित होंगी, तब क्षेत्रीय दलों के सामने अपनी प्रासंगिकता बचाने की चुनौती होगी। उत्तर भारत की सीटों में होने वाली भारी वृद्धि राष्ट्रीय दलों को मजबूती देगी, जबकि दक्षिण और पूर्व के क्षेत्रीय क्षत्रपों के पास सौदेबाजी की शक्ति (Bargaining Power) कम हो जाएगी।

आचार्य सोहन वेदपाठी www.AcharyaG.com
 निष्कर्ष: भविष्य की आहट
मुंशी प्रेमचंद के शब्दों में कहें तो, कभी-कभी उत्साह में लिया गया निर्णय भविष्य के लिए अंधकारमय हो जाता है। 2026 का जिन्न जब बाहर आएगा, तब कोई 'कानूनी स्टे' काम नहीं आएगा। उत्तर भारत में 'सीटों की बरसात' होगी और विपक्ष के पास शायद ही कोई 'बैकअप प्लान' बचेगा।
आज सदन में जो तालियां बज रही हैं, वे शायद किसी कॉमेडी शो के अंत की तालियां हैं, क्योंकि अमित शाह ने शतरंज की जो बिसात बिछाई है, उसमें विपक्ष ने अपने 'राजा' को बचाने के चक्कर में पूरी 'सेना' ही कुर्बान कर दी है।
"हित अनहित नहिं जानहीं, बालक सम सब कोय।अहंकार बस मति फिरी, अब जो होइ सो होय॥"

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