रविवार, 26 अप्रैल 2026

मनुष्य के लिये विवाह की परम्परा क्यों आवश्यक है ? संतानोत्पत्ति और भोग तो जानवर भी करते है।

विवाह संस्कार और उपनयन संस्कार के समय बोला जाने वाला यह मंत्र दो आत्माओं (पति - पत्नी एवं गुरु - शिष्य ) के मिलन और वैचारिक एकता का घोषणापत्र है।
भारतीय संस्कृति में शब्द केवल संवाद के माध्यम नहीं, बल्कि ऊर्जा के संवाहक हैं। विवाह और गुरु-शिष्य परंपरा में प्रयुक्त यह मंत्र इस बात का प्रमाण है कि कैसे दो अलग व्यक्तित्व एक संकल्प (व्रत) के माध्यम से एक रूप हो जाते हैं।
मूल मंत्र
ओ३म् मम व्रते ते हृदयं दधामि, 
मम चित्तमनुचित्तं ते अस्तु।
मम वाचमेकमना जुषस्व, 
प्रजापतिष्ट्वा नियुनक्तु मह्यम्॥

१. संस्कृत व्युत्पत्ति
 व्रते : 'वृ' (वृञ् वरणे) धातु + 'क्त' प्रत्यय। जिसका अर्थ है—वह जिसे चुना गया है (संकल्प या नियम)।
हृदयम् : 'हृ' (हरण) + 'दा' (दान) + 'इ' (गति)। निरुक्त के अनुसार - तदेतद् हृदयं 'हृ' इत्येकमक्षरं, 'दा' इत्येकमक्षरं, 'यम्' इत्येकमक्षरम्*। (जो लेता है, जो देता है और जो निरंतर चेतना में रहता है)।
 चित्तम् : 'चिती' (संज्ञाने) धातु + 'क्त' प्रत्यय। अर्थात् वह संवेद्य ज्ञान या चेतना जो विषय को ग्रहण करती है।
जुषस्व : 'जुष्' (प्रीतिसेवनयोः) धातु, लोट् लकार, आत्मनेपद। इसका अर्थ है—प्रेमपूर्वक सेवन करना या आनंद के साथ स्वीकार करना।
नियुनक्तु : 'नि' उपसर्ग + 'युज्' (योगे) धातु + लोट् लकार। इसका अर्थ है—स्थायी रूप से जोड़ देना या नियुक्त करना।
२. निरुक्तपरक व्याख्या 
 1. मम व्रते ते हृदयं दधामि : "मैं अपने संकल्प (व्रत) के भीतर तुम्हारे हृदय को धारण करता हूँ।" यहाँ 'व्रत' वह नैतिक परिधि है, जिसमें दोनों पक्ष रहने का निश्चय करते हैं। हृदय को व्रत में धारण करने का अर्थ है भावनाओं को अनुशासन और मर्यादा से जोड़ना।
 2. मम चित्तमनुचित्तं ते अस्तु : यहाँ 'अनु' उपसर्ग अनुगमन और अनुकूलता का बोध कराता है। "तुम्हारा चित्त मेरे चित्त के अनुकूल हो।" यह मानसिक सामंजस्य की पराकाष्ठा है, जहाँ दो मति एक दिशा में कार्य करती हैं।
3. मम वाचमेकमना जुषस्व : "मेरी वाणी को तुम एकाग्र मन से स्वीकार करो।" यहाँ 'एकमना' शब्द महत्वपूर्ण है। संवाद तभी सफल है जब सुनने वाला और बोलने वाला एक ही मानसिक धरातल पर हों।
4. प्रजापतिष्ट्वा नियुनक्तु मह्यम् : 'प्रजापति' (ब्रह्मांडीय सृजन शक्ति) का आह्वान है। "प्रजापति तुम्हें मेरे लिए नियुक्त (युक्त) करें।" यह दर्शाता है कि यह मिलन लौकिक ही नहीं, अपितु ईश्वरीय विधान द्वारा संचालित है।
३. संस्कृत व्याख्या
अन्वयः – (अहं) मम व्रते ते हृदयं दधामि, ते चित्तं मम चित्तम् अनु (अनुकूलं) अस्तु। त्वम् एकमना (भूत्वा) मम वाचं जुषस्व, प्रजापतिः त्वा मह्यम् नियुनक्तु।
व्याख्या –
अस्य मन्त्रस्य भावोऽयमस्ति यत् वयं द्वौ मिलित्वा एकं लक्ष्यं प्रति गच्छेव। अहं तव भावनाः (हृदयं) स्वसंकल्पे (व्रते) स्थापयामि। आवयोः विचारधारयोः एकात्मता भवेत्। मम वाणी तव कृते प्रीतिकरी भवतु, भवती च एकाग्रचित्तेन मम वचनं शृणोतु। जगदीश्वरः प्रजापतिः अस्माकं सम्बन्धं दृढं करोतु येन वयं धर्मपालनं कर्तुं समर्थाः भवेम।
निष्कर्ष :-
यह मंत्र हमें सिखाता है कि किसी भी स्थायी संबंध के लिए चार स्तंभ अनिवार्य हैं:
व्रत : साझा आदर्श।
हृदय : भावनाओं का सम्मान।
चित्त : वैचारिक तालमेल।
वाणी : मधुर और एकाग्र संवाद।

जब 'प्रजापति' (ईश्वरीय सत्ता) इन चारों को जोड़ती है, तभी एक सफल और सुखी जीवन का निर्माण होता है।

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