लोक-व्यवहार और सामान्य मुहूर्त संकलनों में अन्ध शुक्र का एक श्लोक अत्यधिक प्रचलित है:
"रेवत्यादिमृगान्ते च यावत्तिष्ठति चन्द्रमाः। तावच्छुक्रो भवेदन्धः सम्मुखे दक्षिणे शुभः॥"
इस स्थूल मत के अनुसार, जब चन्द्रमा रेवती से लेकर मृगशिरा तक (कुल 6 नक्षत्रों में) गोचर करता है, तब शुक्र 'अन्ध' माना जाता है। लेकिन यदि इसे सूक्ष्म दृष्टि से देखा जाए, तो यह नियम खगोलीय सिद्धांतों का पूर्णतः समर्थन नहीं करता।
ज्योतिष के प्रकांड विद्वान आचार्य राम दैवज्ञ ने मुहूर्त चिन्तामणि में इस स्थूल नियम का परिष्कार करते हुए एक अत्यंत सटीक और अकाट्य सूत्र दिया:
"यावच्चन्द्रः पूषभात्कृत्तिकाद्ये पादे शुक्रोऽन्धो न दुष्टोऽग्रदक्षे।"
अर्थात्, पूषा (रेवती का देवता) नक्षत्र से लेकर कृत्तिका नक्षत्र के प्रथम चरण तक ही शुक्र अन्धा होता है और इस अवधि में सम्मुख या दक्षिण होने पर दोषपूर्ण नहीं होता।
आचार्य सोहन वेदपाठी, लुधियाना के विचारों पर आधारित -
स्वराशि बल और गंडांत का वैज्ञानिक तर्क - आचार्य राम दैवज्ञ का मत ज्योतिष के मूल सिद्धांतों के सर्वथा अनुकूल है। इसके दो प्रमुख तार्किक आधार हैं:
- स्वराशि में अन्धत्व असंभव: कृत्तिका का द्वितीय चरण वृषभ राशि में आता है। वृषभ शुक्र की अपनी राशि (स्वराशि) है। कोई भी ग्रह अपनी स्वराशि में सुप्त, हीन या 'अन्धा' नहीं हो सकता; वहाँ उसे पूर्ण 'स्थान बल' प्राप्त होता है। इसलिए मृगशिरा तक शुक्र को अन्धा मानना ग्रहों के षड्बल सिद्धांत का उल्लंघन है। अन्धा शुक्र का प्रभाव केवल मेष राशि (कृत्तिका के प्रथम चरण) की समाप्ति तक ही रहता है।
- रेवती का गंडांत और नीचत्त्व प्रभाव: रेवती मीन राशि का अंतिम भाग (भ-संधि/गंडांत) है, जहाँ जल तत्त्व समाप्त होकर अग्नि तत्त्व (मेष) आरंभ होता है। यह ऊर्जा के संक्रमण का संवेदनशील बिंदु है। इसके अतिरिक्त, मीन राशि में बुध नीच का होता है और रेवती बुध का ही नक्षत्र है। नक्षत्र स्वामी के नीचत्त्व और गंडांत के कारण ही यहाँ शुक्र के प्रभाव में 'दृष्टिहीनता' उत्पन्न होती है, जो मेष राशि के अंत तक बनी रहती है।
सम्मुख शुक्र के विचार में दिशा और उदय का गणित -
शुक्र के उदय की दिशा के आधार पर शुभ-अशुभ यात्रा का निर्धारण इस प्रकार किया जाता है:
- पूर्व में उदय: यदि शुक्र का उदय पूर्व दिशा में हो, तो पश्चिम एवं दक्षिण दिशाओं तथा नैऋत्य और आग्नेय विदिशाओं में यात्रा करना शुभ होता है।
- पश्चिम में उदय: यदि शुक्र पश्चिम में उदित हो, तो पूर्व एवं उत्तर दिशाओं तथा ईशान और वायव्य विदिशाओं की यात्रा शुभ रहती है।
सम्मुख शुक्र के विशेष परिहार एवं गोत्र अपवाद
शास्त्रों ने दैनिक जीवन की व्यावहारिकता को समझते हुए सम्मुख शुक्र के दोष से कुछ विशेष छूट प्रदान की हैं। यदि निम्नलिखित परिस्थितियाँ हों, तो सम्मुख शुक्र का विचार नहीं किया जाता है -
- गोत्र आधारित छूट: भृगु, अंगिरा, वत्स, वशिष्ठ और भारद्वाज गोत्र वाले जातकों को सम्मुख शुक्र का दोष नहीं लगता।
- आपातकालीन व विशेष मुहूर्त: गुरु अथवा शुक्र अस्त हों, गुरु सिंह राशि में (सिंहस्थ) हो, कन्या का रजोदर्शन पिता के घर में होने लगे और कोई शुभ मुहूर्त न मिल रहा हो, तो दीपावली के दिन कन्या पति के घर जा सकती है।
- ग्रह बल: यदि गोचर में गुरु उपचय (3, 6, 10, 11) स्थानों में हो, शुक्र केंद्र में हो, तथा लग्न शुभ ग्रहों से युक्त हो, तो स्त्री अपने पति के घर की यात्रा कर सकती है।
- स्थान व प्रयोजन: एक ही ग्राम या नगर के भीतर, राज्य परिवर्तन के समय, विवाह तथा तीर्थयात्रा के दौरान सम्मुख शुक्र का दोष प्रभावी नहीं होता।
निष्कर्ष: मुहूर्त शास्त्र का अंधानुकरण करने के बजाय, उसकी गणितीय और खगोलीय पृष्ठभूमि को समझना आवश्यक है। समय का अभाव होने पर भी आपातकालीन अपवादों का लाभ उठाते हुए, हमेशा सम्मुख शुक्र का शास्त्र-सम्मत विचार करके ही मांगलिक यात्राएं करनी चाहिए।
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