मंगलवार, 25 अगस्त 2026

महामंत्र का जप कैसे करना चाहिये ? प्रस्तुति - आचार्य सोहन वेदपाठी

हरे राम या हरे कृष्ण: महामंत्र का रहस्य

पहले 'हरे राम' बोलें या 'हरे कृष्ण'? — शास्त्रीय एवं विवेचनात्मक विश्लेषण

जब भी हम भगवान के नाम का संकीर्तन करते हैं, तो अक्सर एक प्रश्न मन में उठता है—और कई बार यह विवाद का विषय भी बन जाता है—कि महामंत्र का सही उच्चारण क्रम क्या है? क्या हमें "हरे राम" से शुरुआत करनी चाहिए या "हरे कृष्ण" से? 

यह व्याख्या केवल भावनाओं पर आधारित नहीं है, बल्कि हमारे सनातन धर्म के ग्रंथों, उपनिषदों और पुराणों के गहरे ज्ञान पर टिकी है। आइए, इस विषय को विस्तार से समझें, ताकि अगली बार जब आप नाम जप करें, तो आपके भीतर संशय नहीं, बल्कि पूर्ण समर्पण हो।

1. कोई तात्विक भेद नहीं: नाम एक, प्रभाव अनेक

सबसे पहले यह समझना आवश्यक है कि भगवान के दोनों नामों—राम और कृष्ण—में कोई तात्विक अंतर नहीं है। भक्त "हरे राम" जपे या "हरे कृष्ण", दोनों ही परम कल्याणकारी हैं। आध्यात्मिक पथ का पहला नियम यही है कि व्यक्ति को अपनी गुरु-परंपरा से जो मंत्र जिस रूप में मिला है, उसे उसी का निरंतर अभ्यास करना चाहिए। ईश्वर के स्वरूपों में पद (छोटा-बड़ा) या काल (समय) खोजना अज्ञानता का प्रतीक है।

2. मंत्र की उत्पत्ति: शास्त्रों के दो अलग-अलग प्रमाण

मुख्य अंतर यह नहीं है कि कौन सा नाम बड़ा है, बल्कि यह है कि मंत्र का उद्गम स्थल (Source) क्या है। यही उद्गम स्थल इसके जपने की विधि और नियमों को तय करता है। यह महामंत्र मुख्य रूप से दो प्राचीन ग्रंथों में प्राप्त होता है:

अ) कलिसन्तरणोपनिषद (वैदिक परंपरा)

कलिसन्तरणोपनिषद (Kalisantaranopanishad) कृष्ण यजुर्वेद से संबंधित एक उपनिषद है। इसमें द्वापर युग के अंत में देवर्षि नारद और ब्रह्मा जी के बीच का संवाद है। जब नारद जी ने कलिकाल (कलियुग) के पापों से मुक्त होने का उपाय पूछा, तो ब्रह्मा जी ने उन्हें यह षोडशाक्षर (16 अक्षरों वाला) मंत्र दिया, जिसका आरंभ "हरे राम" से होता है:

हरे राम हरे राम, राम राम हरे हरे ।
हरे कृष्ण हरे कृष्ण, कृष्ण कृष्ण हरे हरे ॥

— कलिसन्तरणोपनिषद (हरिनामोपनिषद)

ब) ब्रह्मवैवर्त पुराण (पौराणिक परंपरा)

दूसरी ओर, पुराणों में भी नाम महिमा का वर्णन है। विशेषकर ब्रह्मवैवर्त पुराण और अन्य वैष्णव आचार्यों की परंपरा में, इसी मंत्र का क्रम "हरे कृष्ण" से आरंभ होता है:

हरे कृष्ण हरे कृष्ण, कृष्ण कृष्ण हरे हरे ।
हरे राम हरे राम, राम राम हरे हरे ॥

— पौराणिक एवं संकीर्तन परंपरा

3. वैदिक मर्यादा बनाम पौराणिक सुलभता (सबसे महत्वपूर्ण तर्क)

यह केवल शब्दों का हेर-फेर नहीं है, बल्कि विधि-निषेध (Restrictions) का विज्ञान है।

  • वैदिक मंत्र (हरे राम की प्रधानता): उपनिषद, वेदों (श्रुति) का हिस्सा होते हैं। इसलिए, यदि आप कलिसन्तरणोपनिषद के अनुसार "हरे राम" से शुरू होने वाले मंत्र का जाप कर रहे हैं, तो आप एक वेद मंत्र का उच्चारण कर रहे हैं। वेद मंत्रों को बोलने की अपनी मर्यादा होती है—जिसमें पवित्रता, समय, मुहूर्त और यज्ञोपवीत आदि का विचार करना पड़ता है। इसका उपयोग उछल-कूद या 'संकीर्तन' के लिए नहीं किया जा सकता। यह एकांत, ध्यान और अनुष्ठान के लिए है।
  • पौराणिक मंत्र (हरे कृष्ण की प्रधानता): पुराणों की रचना इसीलिए की गई थी ताकि ज्ञान हर वर्ग तक सुगमता से पहुँच सके। पुराण के मंत्रों में कोई कठोर 'विधि-निषेध' नहीं होते। इसलिए, जब आप "हरे कृष्ण" से शुरू होने वाले मंत्र का गान करते हैं, तो आप इसे गा सकते हैं, इस पर नृत्य कर सकते हैं, संकीर्तन कर सकते हैं और इसे दुनिया का कोई भी व्यक्ति जप सकता है।

कलयुग के जीव की व्यावहारिकता: कलयुग में मनुष्य हर समय पवित्र अवस्था में नहीं रह सकता। अशुद्ध अवस्था में वेद मंत्र का जाप दोषपूर्ण हो सकता है। इसीलिए आचार्यों ने "हरे कृष्ण" से संकीर्तन करने की व्यवस्था दी, ताकि वैदिक नियमों के टूटने का कोई दोष न लगे और आम जनमानस बिना किसी भय के भगवान के नाम का आनंद ले सके।

4. समाज में फैली भ्रांतियों का तार्किक खंडन

समाज में अक्सर यह तर्क दिया जाता है कि "राम जी त्रेता युग में पहले आए थे, इसलिए उनका नाम पहले आना चाहिए," या "कृष्ण जी पूर्णावतार हैं, इसलिए वे बड़े हैं।" ऐसे तर्क अज्ञानता को दर्शाते हैं। परमात्मा समय और स्थान (देश-काल) की सीमाओं से परे है।

निष्कर्ष

यह विवेचना इस बात का उत्कृष्ट प्रमाण है कि सनातन धर्म में नियम थोपे नहीं जाते, बल्कि अधिकारी, परिस्थिति और उद्देश्य के अनुसार व्यवस्थित किए जाते हैं। "हरे राम" से शुरू होने वाला मंत्र ध्यान और वैदिक मर्यादा के साथ एकांत साधना के लिए है। जबकि "हरे कृष्ण" से शुरू होने वाला मंत्र प्रेम, संकीर्तन, आनंद और इसके वैश्विक प्रसार के लिए है। दोनों ही मार्ग एक ही परम सत्य की ओर ले जाते हैं!

प्रस्तुति:

गोपथ ज्योतिष पद्धति के प्रणेता - आचार्य सोहन वेदपाठी, लुधियाना
मोबाइल - 9463405098
वेबसाइट - AcharyaG.com

रविवार, 23 अगस्त 2026

शुक्ल यजुर्वेदीय श्रावणी उपाकर्म 2026: तिथि, समय और शास्त्रोक्त पंचांगीय निर्णय आचार्य सोहन वेदपाठी, लुधियाना के द्वारा

शुक्ल यजुर्वेदीय श्रावणी उपाकर्म निर्णय (वर्ष 2026)
धर्मशास्त्र, पंचांग एवं 'गोपथ ज्योतिष पद्धति' पर आधारित विश्लेषण
प्रस्तुति: आचार्य सोहन वेदपाठी (संपर्क: 9463405098)
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श्रावण मास की पूर्णिमा को किया जाने वाला 'श्रावणी उपाकर्म' (वेदारम्भ, देव-ऋषि-पितृ तर्पण, हेमाद्रि संकल्प एवं नूतन यज्ञोपवीत धारण) वैदिक परम्परा का एक अत्यंत महत्त्वपूर्ण कर्म है। वर्ष 2026 (संवत् 2083 वैक्रमाब्द) में पूर्णिमा तिथि के खण्डित होने (खण्डातिथि), भद्रा (विष्टि) की उपस्थिति और चन्द्रग्रहण को लेकर कई संशय उत्पन्न हो सकते हैं।

'गोपथ ज्योतिष पद्धति' और प्रामाणिक धर्मशास्त्रों (निर्णय-सिन्धु/धर्मसिन्धु) के आधार पर समस्त शुक्ल यजुर्वेदीय (माध्यन्दिन शाखा) द्विजों के लिए उपाकर्म का शास्त्रशुद्ध निर्णय यहाँ प्रस्तुत किया जा रहा है।

मुख्य विवरण एवं मुहूर्त (एक दृष्टि में)

उपाकर्म दिनांक: 27 अगस्त 2026 (गुरुवार)
उपाकर्म काल: पूर्वाह्न काल (दिन का तीसरा काल)
पूर्णिमा तिथि प्रारम्भ: 27 अगस्त 2026, प्रातः 09:09 बजे
पूर्णिमा तिथि समाप्ति: 28 अगस्त 2026, प्रातः 09:48 बजे

शास्त्रोक्त प्रमाण एवं संशय निवारण

उपाकर्म की तिथि 27 अगस्त ही क्यों ग्राह्य है, इसके लिए शास्त्रों और पंचांग के तीन मुख्य आधार निम्नलिखित हैं:

1. खण्डातिथि का पंचांगीय नियम
जब पूर्णिमा तिथि दो दिनों को स्पर्श करती है, तो शुक्ल एवं कृष्ण यजुर्वेदियों के लिए काल-भेद उत्पन्न होता है। पंचांग का स्पष्ट वचन है:

"यदि पूर्णिमा पहले दिन 1 मुहूर्त या इससे अधिक काल बाद शुरू होकर दूसरे दिन 3 मुहूर्त से अधिक और 6 मुहूर्त से कम हो, तो कृष्ण यजुर्वेदियों का उपाकर्म दूसरे दिन और शुक्ल यजुर्वेदियों का उपाकर्म पहले दिन होता है।"
ध्यान दें - 28 अगस्त को पूर्णिमा तिथि 3 मुहूर्त से अधिक और 6 मुहूर्त से कम प्राप्त हो रही है। अतः इस गणितीय नियमानुसार शुक्ल यजुर्वेदियों का उपाकर्म 27 अगस्त 2026 को ही पूर्णतः शास्त्रशुद्ध है।

2. भद्रा (विष्टि) दोष का परिहार
कई लोगों में यह भ्रम रहता है कि भद्रा काल में शुभ कार्य नहीं होते, परंतु उपाकर्म के विषय में धर्मसिन्धु का यह स्पष्ट श्लोक भद्रा दोष को समाप्त करता है:

"येषां पौर्णमासीपरकमुख्यकालस्तेषां विष्टिसत्वेऽपिशुक्लयाजुषमास्तम्ब माध्यदिनीतैत्तरीय शाखिनांतदनुषंगेन श्रावणीकर्मकर्तृणामन्येषाञ्चोपाकर्मविधिः।"

विश्लेषण: जिन शाखाओं का मुख्य काल पूर्णिमा तिथि है (जैसे शुक्ल यजुर्वेद), उनके लिए भद्रा (विष्टि) उपस्थित रहने पर भी उपाकर्म निर्दोष व विहित माना गया है। अतः 27 अगस्त को भद्रा होने के बावजूद यह कर्म सर्वथा मान्य है।

3. चन्द्रग्रहण का विचार
विश्लेषण: 27-28 अगस्त 2026 को होने वाला आंशिक चन्द्रग्रहण भारत में अदृश्य है। धर्मशास्त्रों के अनुसार, जो ग्रहण जहाँ दृश्य नहीं होता, वहाँ उसका कोई सूतक, यम-नियम या वेध-दोष मान्य नहीं होता। इसलिए भारतवर्ष में ग्रहण के कारण उपाकर्म में कोई बाधा नहीं है।

निष्कर्ष एवं निर्देश -

समस्त शुक्ल यजुर्वेदीय बंधुओं से आग्रह है कि पंचांग एवं धर्मशास्त्र के उपर्युक्त निर्देशों का पालन करते हुए, बिना किसी संशय के 27 अगस्त 2026 को पूर्वाह्न काल (पांच कालों में विभक्त दिन का तीसरा काल) में वैदिक रीति से अपना श्रावणी उपाकर्म सम्पन्न करें।

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शास्त्र सम्मत विचार एवं प्रस्तुति:
आचार्य सोहन वेदपाठी "प्रणेता - गोपथ ज्योतिष पद्धति" 📞 संपर्क सूत्र: 9463405098 (ज्योतिषीय परामर्श एवं शंका समाधान हेतु संपर्क करें)

सोमवार, 17 अगस्त 2026

एकादशी व्रत पारण समय सहित 2027-28, आचार्य सोहन वेदपाठी 9463405098

एकादशी व्रत एवं पारण तालिका - संवत् 2084
॥ श्री गणेशाय नमः ॥ 卐 ॥ श्री हरि विष्णवे नमः ॥ 卐 ॥ ॐ नमो भगवते वासुदेवाय ॥

॥ श्री एकादशी व्रत एवं पारण तालिका (वि. संवत् २०८४) ॥

अप्रैल 2027 से मार्च 2028 (दृक पंचांग सम्मत समस्त 24 एकादशी व्रत, पारण दिनांक एवं शुभ समय)
क्र.एकादशी का नामव्रत दिनांक व वारपारण दिनांक व वारपारण का शुभ समय
1चैत्र शुक्ल कामदा एकादशी17 अप्रैल, 2027 (शनिवार)18 अप्रैल, 2027 (रविवार)प्रातः 05:38 से 07:34
2वैशाख कृष्ण वरूथिनी एकादशी02 मई, 2027 (रविवार)03 मई, 2027 (सोमवार)प्रातः 05:25 से 07:55
3वैशाख शुक्ल मोहिनी एकादशी16 मई, 2027 (रविवार)17 मई, 2027 (सोमवार)प्रातः 05:16 से 07:46
4ज्येष्ठ कृष्ण अपरा एकादशी01 जून, 2027 (मंगलवार)02 जून, 2027 (बुधवार)प्रातः 05:11 से 08:26
5ज्येष्ठ शुक्ल निर्जला एकादशी14 जून, 2027 (सोमवार)15 जून, 2027 (मंगलवार)प्रातः 08:17 से 10:47
6आषाढ़ कृष्ण योगिनी एकादशी30 जून, 2027 (बुधवार)01 जुलाई, 2027 (गुरुवार)प्रातः 05:15 से 07:45
7आषाढ़ शुक्ल देवशयनी एकादशी14 जुलाई, 2027 (बुधवार)15 जुलाई, 2027 (गुरुवार)प्रातः 05:21 से 07:51
8श्रावण कृष्ण कामिका एकादशी29 जुलाई, 2027 (गुरुवार)30 जुलाई, 2027 (शुक्रवार)प्रातः 10:27 से 12:57
9श्रावण शुक्ल पवित्रा (पुत्रदा)12 अगस्त, 2027 (गुरुवार)13 अगस्त, 2027 (शुक्रवार)प्रातः 09:41 से 12:11
10भाद्रपद कृष्ण अजा एकादशी28 अगस्त, 2027 (शनिवार)29 अगस्त, 2027 (रविवार)प्रातः 05:43 से 09:26
11भाद्रपद शुक्ल पद्मा (परिवर्तिनी)11 सितम्बर, 2027 (शनिवार)12 सितम्बर, 2027 (रविवार)प्रातः 05:49 से 08:19
12आश्विन कृष्ण इन्दिरा एकादशी26 सितम्बर, 2027 (रविवार)27 सितम्बर, 2027 (सोमवार)प्रातः 05:55 से 08:25
13आश्विन शुक्ल पापांकुशा एकादशी11 अक्टूबर, 2027 (सोमवार)12 अक्टूबर, 2027 (मंगलवार)प्रातः 06:03 से 08:33
14कार्तिक कृष्ण रमा एकादशी25 अक्टूबर, 2027 (सोमवार)26 अक्टूबर, 2027 (मंगलवार)प्रातः 08:38 से 11:08
15कार्तिक शुक्ल देवप्रबोधिनी एकादशी10 नवम्बर, 2027 (बुधवार)11 नवम्बर, 2027 (गुरुवार)प्रातः 06:21 से 10:11
16मार्गशीर्ष कृष्ण उत्पन्ना एकादशी24 नवम्बर, 2027 (बुधवार)25 नवम्बर, 2027 (गुरुवार)प्रातः 06:31 से 10:57
17मार्गशीर्ष शुक्ल मोक्षदा (गीता जयंती)09 दिसम्बर, 2027 (गुरुवार)10 दिसम्बर, 2027 (शुक्रवार)प्रातः 09:18 से 11:48
18पौष कृष्ण सफला एकादशी23 दिसम्बर, 2027 (गुरुवार)24 दिसम्बर, 2027 (शुक्रवार)प्रातः 06:48 से 09:18
19पौष शुक्ल पुत्रदा एकादशी08 जनवरी, 2028 (शनिवार)09 जनवरी, 2028 (रविवार)प्रातः 06:52 से 09:22
20माघ कृष्ण षट्तिला एकादशी22 जनवरी, 2028 (शनिवार)23 जनवरी, 2028 (रविवार)प्रातः 06:51 से 09:21
21माघ शुक्ल जया एकादशी07 फरवरी, 2028 (सोमवार)08 फरवरी, 2028 (मंगलवार)प्रातः 06:44 से 09:14
22फाल्गुन कृष्ण विजया एकादशी20 फरवरी, 2028 (रविवार)21 फरवरी, 2028 (सोमवार)दोपहर 12:24 से 14:54
23फाल्गुन शुक्ल आमलकी एकादशी07 मार्च, 2028 (मंगलवार)08 मार्च, 2028 (बुधवार)प्रातः 06:20 से 08:50
24चैत्र कृष्ण पापमोचिनी एकादशी21 मार्च, 2028 (मंगलवार)22 मार्च, 2028 (बुधवार)प्रातः 07:04 से 09:34
विशेष शास्त्र निर्देश: एकादशी व्रत का पारण द्वादशी तिथि समाप्त होने से पूर्व एवं 'हरिवासर' समाप्त होने के उपरांत सूर्योदय के बाद करना अनिवार्य है।
मास अनुसार एकादशी पारण द्रव्य तालिका - आचार्य सोहन वेदपाठी
॥ श्री गणेशाय नमः ॥ 卐 ॥ श्री हरि विष्णवे नमः ॥ 卐 ॥ ॐ नमो भगवते वासुदेवाय ॥

मास अनुसार एकादशी पारण द्रव्य तालिका

शास्त्रसम्मत विधान: किस मास में किस वस्तु (द्रव्य) से एकादशी व्रत का पारण करें?
🌸 चैत्र मास ➔ गोघृत (देसी गाय का घी)
🌿 आश्विन मास ➔ गुड़
🌸 वैशाख मास ➔ कुशोदक (कुश का जल)
🌿 कार्तिक मास ➔ तुलसी दल या विल्वपत्र
🌸 ज्येष्ठ मास ➔ तिल (तिलोदक)
🌿 मार्गशीर्ष मास ➔ गोमूत्र (अर्क / पंचगव्य)
🌸 आषाढ़ मास ➔ जौ का आटा (यव चूर्ण)
🌿 पौष मास ➔ गोमय (गोबर / पंचगव्य)
🌸 श्रावण मास ➔ दूर्वा (दूब घास जल)
🌿 माघ मास ➔ गोदुग्ध (गाय का कच्चा दूध)
🌸 भाद्रपद मास ➔ कूष्माण्ड (बनकोहड़ा/पेठा)
🌿 फाल्गुन मास ➔ सर्वौषधि / चरणामृत
📜 विशेष शास्त्र प्रमाण (पद्म पुराण / हरिभक्ति विलास): एकादशी व्रत के अगले दिन द्वादशी तिथि में सूर्योदय के पश्चात् एवं 'हरिवासर' समाप्त होने पर मास विशेष के निर्धारित पवित्र द्रव्य का प्राशन करके व्रत का पारण करने से कोटि गुना फल प्राप्त होता है।

शनिवार, 15 अगस्त 2026

कुण्डली में जातक का कद निर्धारण कैसे करें (8 सूत्रीय अंक पद्धति) GopathAstro का एक नवीन अनुसंधान

ज्योतिषीय कद निर्धारण प्रणाली

लग्न एवं नवमांश पर आधारित 8-सूत्रीय अंक पद्धति

1. आठ प्रमुख घटक (प्रत्येक = 1 अंक)

लग्न कुण्डली (स्थूल शरीर)

  • 1. लग्न राशि 1 अंक
  • 2. लग्नेश ग्रह 1 अंक
  • 3. लग्न में स्थित ग्रह 1 अंक
  • 4. लग्न पर दृष्टि 1 अंक

नवमांश कुण्डली (सूक्ष्म शरीर)

  • 5. नवमांश लग्न राशि 1 अंक
  • 6. नवमांश लग्नेश ग्रह 1 अंक
  • 7. नवमांश लग्न में स्थित ग्रह 1 अंक
  • 8. नवमांश लग्न पर दृष्टि 1 अंक
 2. राशि, ग्रह एवं कद वर्गीकरण

ह्रस्व (लघु कद)

राशियाँ: मेष, वृषभ, कुम्भ, मीन
ग्रह: मंगल, केतु
5'2" से 5'5"

मध्यम (सम कद)

राशियाँ: मिथुन, कर्क, धनु, मकर
ग्रह: सूर्य, चन्द्र, बुध, शुक्र
5'6" से 5'8"

दीर्घ (ऊँचा कद)

राशियाँ: सिंह, कन्या, तुला, वृश्चिक
ग्रह: गुरु, शनि, राहु
5'9" से 5'11"
📐 3. संधि एवं गणना के नियम
✔ ह्रस्व एवं मध्यम (समान अंक होने पर): आधार मान 5 फीट 6 इंच होगा। यदि दीर्घ के अंक हों तो उतने इंच जोड़ें (+)।
✔ मध्यम एवं दीर्घ (समान अंक होने पर): आधार मान 5 फीट 9 इंच होगा। यदि ह्रस्व के अंक हों तो उतने इंच घटाएं (-)।
✔ स्त्री जातक नियम: प्राप्त मानक कद में से 3 से 4 इंच घटाकर अंतिम कद निर्धारित करें।


2. कद का मानक पैमाना (पुरुष जातक हेतु)

  • ​अतिदीर्घ कद: 6 फीट या उस से अधिक
  • ​दीर्घ (ऊँचा) कद: 5 फीट 9 इंच से 5 फीट 11 इंच तक
  • ​मध्यम कद: 5 फीट 6 इंच से 5 फीट 8 इंच तक
  • ​ह्रस्व (लघु) कद: 5 फीट 2 इंच से 5 फीट 5 इंच तक
  • ​अतिलघु कद: 5 फीट 1 इंच से कम

​ध्यान दें - यह वर्गीकरण औसत कद 5'2" से 5'11" मानकर किया गया है। जिन क्षेत्रों में औसत कद इससे भिन्न हो वहाँ बदलाव करना पड़ेगा।

3. आठ प्रमुख घटक (प्रत्येक का 1 अंक)

​कुण्डली का विश्लेषण करते समय निम्नलिखित 8 घटकों को 1-1 अंक आवंटित करें:

  1. ​लग्न राशि (लग्न में कौन सी राशि उदित है?)
  2. ​लग्नेश (लग्न के स्वामी ग्रह का स्वरूप)
  3. ​लग्न में स्थित ग्रह (लग्न भाव में बैठा ग्रह)
  4. ​लग्न पर दृष्टि (लग्न भाव को पूर्ण दृष्टि से देखने वाला ग्रह)
  5. ​नवमांश लग्न राशि (D9 लग्न की राशि)
  6. ​नवमांश लग्नेश (D9 लग्न के स्वामी ग्रह का स्वरूप)
  7. ​नवमांश लग्न में स्थित ग्रह (D9 लग्न में उपस्थित ग्रह)
  8. ​नवमांश लग्न पर दृष्टि (D9 लग्न को देखने वाला ग्रह)
  9. ​विशेष: यदि किसी भाव में एक से अधिक ग्रह बैठे हों या दृष्टि डाल रहे हों, तो प्रत्येक ग्रह को उसका स्वतंत्र 1 अंक प्रदान करें।

    यदि सभी प्वाइंट ह्रस्व प्राप्त हो तो बौना (4'5" या उससे कम) एवं सभी प्वाइंट दीर्घ प्राप्त हो तो अतिदीर्घ (6' या उससे अधिक) समझें।


    ​4. गणना एवं संधि के गणितीय नियम

    ​प्राप्त अंकों का योग करने के बाद निम्नलिखित नियमों के आधार पर परिणाम निकालें:

    • ​बहुमत नियम: जिस वर्ग (ह्रस्व, मध्यम या दीर्घ) के अंक सर्वाधिक होंगे, जातक का कद सामान्यतः उसी सीमा में रहेगा।
    • ​ह्रस्व एवं मध्यम के अंक बराबर होने पर:
      • ​आधार कद 5 फीट 6 इंच (ह्रस्व-मध्यम संधि) माना जाएगा।
      • ​यदि कुण्डली में दीर्घ वर्ग के भी अंक हैं, तो प्रति दीर्घ अंक +1 इंच जोड़ दें।
    • ​मध्यम एवं दीर्घ के अंक बराबर होने पर:
      • ​आधार कद 5 फीट 9 इंच (मध्यम-दीर्घ संधि) माना जाएगा।
      • ​यदि कुण्डली में ह्रस्व वर्ग के भी अंक हैं, तो प्रति ह्रस्व अंक -1 इंच घटा दें।
    • ​स्त्री जातक के लिए विशेष नियम:
      • ​प्राकृतिक शारीरिक संरचना के अनुसार, प्राप्त मानक पुरुष कद में से 3 से 4 इंच घटाकर स्त्री जातक का अंतिम कद तय करें।

    ​5. व्यावहारिक उदाहरण से समझें

    ​उदाहरण:

    • ​लग्न: धनु (मध्यम) — 1 मध्यम
    • ​लग्नेश: गुरु (दीर्घ) — 1 दीर्घ
    • ​लग्नस्थ ग्रह: बुध (मध्यम) — 1 मध्यम
    • ​लग्न पर दृष्टि: मंगल (ह्रस्व) — 1 ह्रस्व
    • ​नवमांश लग्न: मीन (ह्रस्व) — 1 ह्रस्व
    • ​नवमांश लग्नेश: गुरु (दीर्घ) — 1 दीर्घ
    • ​नवमांश लग्नस्थ ग्रह: केतु (ह्रस्व) — 1 ह्रस्व
    • ​नवमांश लग्न पर दृष्टि: चन्द्रमा (मध्यम) — 1 मध्यम

    ​अंकों का कुल योग:

    • ​ह्रस्व अंक: 3
    • ​मध्यम अंक: 3
    • ​दीर्घ अंक: 2

    ​फलादेश गणना:

     यहाँ ह्रस्व (3) और मध्यम (3) दोनों के अंक बराबर हैं, इसलिए संधि का आधार मान = 5 फीट 6 इंच। तालिका में दीर्घ के 2 अंक शेष हैं, अतः आधार मान में 2 इंच जोड़े जाएंगे। 5 फीट 6 इंच + 2 इंच = 5 फीट 8 इंच होगा। 

    अंतिम परिणाम: पुरुष जातक की लंबाई लगभग 5 फीट 8 इंच होगी। (यदि यह स्त्री जातक की कुण्डली होती, तो 3.5 इंच घटाने पर कद लगभग 5 फीट 4.5 इंच आता)।

    निष्कर्ष : शारीरिक गठन केवल एक ग्रह या एक राशि के अधीन नहीं होता। जब हम स्थूल शरीर (लग्न) और सूक्ष्म स्वभाव (नवमांश) दोनों के घटकों को जोड़कर अंक प्रणाली से परिणाम निकालते हैं, तो कद का अनुमान अत्यंत सटीक और वैज्ञानिक रूप से स्पष्ट बैठता है।

    अनुसंधान एवं लेख : आचार्य सोहन वेदपाठी (गोपथ ज्योतिष पद्धति के प्रणेता) , संपर्क सूत्र 9463405098 

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